कश्मीर पर बदला अमरीकी नज़रिया भारत के लिए अहम
जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट व अभिन्न अंग है, इस तथ्य के लिए भारत को किसी भी देश या व्यक्ति से पुष्टि की मोहर की आवश्यकता नहीं है, लेकिन भारत में अमरीकी राजदूत सर्जियो गोर के इस संदर्भ में दिये गये बयान के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता, विशेषकर इसलिए कि वह न सिर्फ दुर्लभ है बल्कि ऐसे समय में आया है, जब ईरान युद्ध को लेकर अमरीका का झुकाव पाकिस्तान की ओर अधिक प्रतीत होने लगा था। यही नहीं वाशिंगटन ने मक्का समझौते पर भी अपनी सहमति व्यक्त की है, जिसमें पाकिस्तान के अतिरिक्त सऊदी अरब व तुर्की शामिल हैं तथा बांग्लादेश आदि ने भी इसका हिस्सा बनने में अपनी इच्छा व्यक्त की है।
गौरतलब है कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद अमरीकी राजदूत की पहली स्वयं संचालित (स्टैंड अलोन) जम्मू-कश्मीर यात्रा के दौरान गोर ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के साथ श्रीनगर में संयुक्त प्रैस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि केंद्र शासित प्रदेश भारत का ‘महत्वपूर्ण हिस्सा है।’ गोर ने यह भी कहा कि वाशिंगटन अपनी ‘जम्मू-कश्मीर की यात्रा न करें’ संबंधी उच्च चेतावनी को कम करने पर भी विचार करेगा। गोर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के बहुत करीबी हैं और इसलिए ही उन्हें भारत में राजदूत बनाकर भेजा गया था। वह अगस्त 2025 से अमरीका के दक्षिण व मध्य एशिया के मामलों के विशेष दूत भी हैं। इससे पहले वह जनवरी से अक्तूबर 2025 तक वाइट हाउस के राष्ट्रपति कार्मिक कार्यालय के निदेशक थे।
नई दिल्ली का मानना है कि गोर के बयान से न केवल भारत की प्रभुसत्ता व क्षेत्रीय अखंडता की पुष्टि होती है बल्कि 2018 के बाद भारत ने जो आतंक-रोधी योजना व प्रशासनिक सुधार लागू किये हैं, उनको भी मंज़ूरी मिलती है। लद्दाख की यात्रा करते हुए गोर ने कहा, ‘अमरीका (अशांत क्षेत्रों के संदर्भ में अपने नागरिकों को) अक्सर यात्रा चेतावनी जारी करता है, जिनका पुन: मूल्यांकन भी किया जाता है। मैं यहां कोई बड़ी घोषणा नहीं कर सकता, लेकिन इस विषय का संज्ञान हम अवश्य लेंगे।
नई दिल्ली, यहां के मुख्यमंत्री, यहां की सरकार ने, हमारा मानना है कि कुछ अविश्वसनीय कदम इस क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए उठाये हैं।’ गोर की यह टिप्पणी निश्चित रूप से अन्य पश्चिमी देशों को प्रेरित कर सकती है कि वह अपनी ‘ट्रेवल एडवाइज़री’ का पुन: मूल्यांकन करें। अगर ऐसा होता है तो जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में विदेशी पर्यटकों की आमद में वृद्धि हो सकती है, गोर के शब्दों में ‘वह यहां की सुंदरता और जो अवसर उपलब्ध हैं, उन्हें देख सकते हैं’। गोर ने इस बात के संकेत दिये हैं कि वाशिंगटन अपनी ‘यात्रा चेतावनी’ को डाउनग्रेड करने पर विचार कर सकता है।
अमरीका की फिलहाल जम्मू-कश्मीर के लिए लेवल-4 यात्रा चेतावनी है। इस ट्रेवल एडवाइज़री को कम करने के लिए अमरीकी प्रशासन कुछ चीज़़ों को देखता है, जैसे आतंक की घटनाओं में निरंतर कमी आना, दीर्घकालीन राजनीतिक स्थिरता, विदेशी नागरिकों के लिए घूमने-फिरने में आसानी और आपातस्थिति में दूतावास तक भरोसेमंद पहुंच। बहरहाल, श्रीनगर में गोर और उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर पर विशिष्ट फोकस रखते हुए नई दिल्ली व वाशिंगटन के बीच संबंधों पर चर्चा की। इसके बाद ही गोर ने ‘जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा’ बताया। इस बयान के महत्व को अनदेखा करना भारी भूल होगी। भारत लम्बे समय से कहता आ रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका अटूट हिस्सा है। गोर का बयान न सिर्फ भारत के इस दृष्टिकोण की पुष्टि करता है बल्कि इस संदर्भ में वाशिंगटन के बदले हुए नज़रिये को भी ज़ाहिर करता है। कहने का अर्थ यह है कि अमरीका जम्मू-कश्मीर पर अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्ता के पक्ष में था और ट्रम्प ने स्वयं बीच में पड़कर इस मुद्दे को सुलझाने की बात कही थी। लेकिन अब वाशिंगटन ज़मीनी हकीकत को देखते हुए एक तरह से ‘स्वीकार’ कर रहा है कि मध्यस्ता की कोई आवश्यकता नहीं है, ‘जम्मू-कश्मीर भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है’।
ज़ाहिर है अमरीका के बदलते दृष्टिकोण के कारण इस्लामाबाद व वाशिंगटन के रिश्तों में गहरी दरारें दिखायी देने लगी हैं, जो अभी तक तेहरान-वाशिंगटन वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका व मक्का समझौते के कारण मज़बूत दिखायी दे रही थी। इसलिए इस्लामाबाद ने गोर के बयान व उनकी जम्मू-कश्मीर यात्रा पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की है और गोर के बयान को ‘गैर-ज़िम्मेदाराना व तथ्यों के विपरीत’ बताते हुए औपचारिक शिकायत दर्ज की है। इसमें कोई दो राय नहीं कि गोर द्वारा ‘जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा’ बताने से पाकिस्तान की इस विषय पर अंतर्राष्ट्रीय वकालत की हवा निकल गई है। इस मामले में उसका दृष्टिकोण व पक्ष बहुत कमज़ोर हुआ है, जोकि होना भी चाहिए था क्योंकि जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा है और जो पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) है, वह भी भारत का ही हिस्सा है। इसलिए बात तो यह होनी चाहिए कि पाकिस्तान व चीन ने जो अवैध रूप से कश्मीर के हिस्से कब्जाये हुए हैं, वह भारत को अविलम्ब वापस किये जाएं।
हालांकि जम्मू-कश्मीर के स्थानीय राजनीतिक दलों ने गोर के बयान का स्वागत यह कहते हुए किया है कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता को बल मिलेगा और अलगाववादी नज़रिये की हवा निकल जायेगी, लेकिन एक दृष्टिकोण यह भी है कि जम्मू-कश्मीर पर किसी विदेशी राजदूत की पुष्टि की मोहर की आवश्यकता है ही नहीं, यह केंद्र शासित प्रदेश भारत का अटूट हिस्सा था, है और रहेगा। इस नज़रिये को रखने वाले लोगों का कहना है कि गोर की टिप्पणी को अधिक गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है। बहरहाल, अगर गौर से देखा जाये तो गोर का बयान वाशिंगटन व इस्लामाबाद के बीच उत्पन्न हो रहे तनाव को अधिक उजागर करता है। ट्रम्प को उम्मीद थी कि इस्लामाबाद तेहरान से ऐसा समझौता कराने में सहयोग करेगा जो वाशिंगटन के पक्ष में हो और जिसे ट्रम्प नवम्बर के चुनावों में अपनी जीत के तौर पर प्रचारित कर सकें। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। हर मामले में ट्रम्प को ही अभी तक असफलता मिली है। इसलिए ट्रम्प पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ व सेना प्रमुख आसिम मुनीर से खासे नाराज़ दिखायी दे रहे हैं। गोर के बयान को पाकिस्तान पर दबाव डालने की दृष्टि से भी देखा जा सकता है।
वैसे कूटनीति शब्दों का खेल है और कश्मीर के किसी भी ऑब्जेक्टिव छात्र से यह बात छुपी नहीं रह सकती कि अमरीका का कश्मीर को लेकर नज़रिया बदल रहा है, जोकि भारत के लिए अच्छी बात है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

