कनाडा गए विद्यार्थियों का हाथ थामे पंजाब सरकार 

साहिल के तमाशायी हर डूबने वाले पर,
अ़फसोस तो करते हैं, इमदाद नहीं करते।

़फना निज़ामी का यह शे’अर उस समय मेरे दिमाग में बिजली की भांति कौंध गया, जब मुझे कनाडा के अल्बर्टा प्रांत के कैलगरी में दर-ब-दर परेशान होते भारतीयों जिनमें अधिकतर पंजाबी विद्यार्थी हैं, के संबंध में लिखने का ख्याल आया। इन विद्यार्थियों के साथ सरासर धक्का एवं धोखा हुआ है, परन्तु उनका हाथ थामने वाला कोई नहीं। 
ये बच्चे किसी ‘ना-करदा’ गुनाह की सज़ा भुगत रहे प्रतीत होते हैं, क्योंकि उन्होंने जिन कोर्सों तथा कालेजों में दाखिला 2023 तथा 2024 में लिया था, उस समय उन्होंने यह दाखिला बाकायदा आधिकारिक ‘डेज़ीगनेटिड लर्निंग इंस्टीच्यूट’ के ज़रिये ही लिया था। उनके साथ कालेजों और सलाहकारों ने वायदा किया था कि डिप्लोमा पूरा होने पर उन्हें 3 वर्ष का वर्क परमिट मिलेगा, परन्तु अ़फसोस की बात है कि अब जून 2026 में जाकर जब उनकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, ‘इमीग्रेशन, रिफ्यूज़िज़ तथा सिटीज़नशिप कनाडा’ ने एक स्पष्टीकरण डाल दिया है कि इन विद्यार्थियों द्वारा की गई पढ़ाई ‘नान क्रैडिट कार्यक्रम’ है और यह वर्क परमिट के योग्य नहीं है। कुछ विद्यार्थियों को वर्क परमिट दे भी दिया गया और अधिकतर को इन्कार कर दिया गया। मेरी सूचना के अनुसार विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें न्याय देने की बजाय उनके वर्क परमिट भी रद्द कर दिए गए, जिन्हें पहले से दिए गए थे जबकि दोषी तो वे कालेज प्रबन्धक हैं या वे एडवाइज़र (सलाहकार) हैं, जिन्होंने वर्क परमिट के वायदे करके दाखिले दिए, फीसें लीं या फिर स्वयं कनाडा सरकार जिसने ऐसे कालेजों को दाखिले की अनुमति दी और उसके आधार पर स्टडी परमिट पर वीज़े जारी किए। फिर यदि कोई कानूनी व्याख्या जून 2026 में बदलती है तो वह 2024 में दाखिल हुए विद्यार्थियों पर लागू करना कैसे उचित है? प्रत्येक विद्यार्थी ने लगभग 20 लाख रुपये फीस भरी तथा अन्य खर्च सहित उसने 40 से 50 लाख रुपये ही बर्बाद नहीं किए, अपितु अपनी ज़िन्दगी के कीमती 2-3 वर्ष भी बर्बाद कर लिए हैं, परन्तु अ़फसोस कि न तो भारतीय मूल के कैनेडियन राजनीतिज्ञ, सांसद, विधायक तथा न ही सम्पन्न भारतीय एवं पंजाबी इन बच्चों की कोई ठोस मदद कर रहे हैं। इन बच्चों का करियर और भविष्य तबाह हो रहा है। हमारी भारत सरकार के विनती है कि वह इस बारे कनाडा सरकार से सीधी बातचीत करे और इन विद्यार्थियों को वर्क परमिट देने के बारे में दबाव बनाए, परन्तु क्योंकि यह मामला अल्बर्टा प्रांत की सरकार भी हल कर सकती है, तथा इनमें अधिकतर विद्यार्थी भी पंजाबी ही हैं, इसलिए उनकी समकक्ष पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को स्वयं अल्बर्टा एक प्रतिनिधिमंडल भेज कर इस संबंध में बात करनी चाहिए और इस प्रतिनिधिमंडल में इमीग्रेशन विशेषज्ञों के अतिरिक्त मुख्य सचिव या कोई अन्य योग्य आईएएस अधिकारी तथा पंजाब के एडवोकेट जनरल को भेजना चाहिए तथा यह स्टैंड स्पष्ट करना चाहिए कि जब इन विद्यार्थियों ने दाखिला लिया था, उस समय कानून क्या था, यदि ज़रूरत पड़े तो कैनेडियन अदालत में मामला भी दर्ज करना चाहिए। पहले ही बर्बाद हो चुके बच्चे स्वयं तो इसके लिए समर्थ ही नहीं हैं। नि:संदेह मेरे मन में तौखला है कि हमारी किसी ने नहीं सुननी, क्योंकि हमारी हालत तो अहमद ़फराज़ के इस शे’अर जैसी है :
वो जो मौजूद नहीं उसकी मदद चाहते हैं,
वो जो सुनता ही नहीं उसको पुकारे जाएं।
भाजपा की पंजाब राजनीति?
उस को हम पूछ थोड़ी सकते हैं,
उसकी मज़र्ी जहां रखे जिसको। 
—अज़हर ़फऱाग
एक तरफ यह चर्चा है कि अकाली दल तथा भाजपा में चुनावी समझौता लगभग हो चुका है और दूसरी तरफ भाजपा पंजाब के नेता 117 सीटों पर ही चुनाव लड़ने की बात भी कर रहे हैं। 
पहले यह साफ प्रभाव था कि भाजपा पंजाब में किसी भी कीमत पर कांग्रेस को जीतने से रोकना चाहती है और वह ऐसा माहौल बना सकती है कि ‘आप’ जीत जाए, क्योंकि जब ‘आप’ दिल्ली में हारी थी तो बहुत गर्म समाचार थे कि ‘आप’ प्रमुख अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन तथा अन्य  ‘आप’ नेता फिर जेल भेजे जाएंगे, परन्तु ये समाचार अचानक ही गायब हो गए, चुप्पी छा गई। इसे तत्कालीन उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की केजरीवाल तथा चन्द्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश से हुए मुलाकातों तथा उनके बीच हुई बातचीत के लीक होने से जोड़ कर देखा गया था। इसके बाद धनखड़ को इस्तीफा भी देना पड़ा था।
परन्तु अब अचानक फिर एक ‘आप’ नेता सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी ने स्थिति बदल दी है। दूसरी तरफ सुखबीर सिंह बादल तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुलाकात के बाद अकाली दल द्वारा हदबंदी विधेयक पर भाजपा के समर्थन के फैसला भी बिल्कुल ऐसा है जिसने पंजाब की राजनीति के चौराहे के केन्द्र में भाजपा को खड़ा कर दिया है। 
नि:संदेह अभी भी यह स्पष्ट नहीं कि भाजपा अकाली दल के साथ चुनाव समझौता करती है या नहीं, परन्तु यह बात स्पष्ट हो रही है कि अब भाजपा पंजाब के प्रति लापरवाह नहीं है। हालांकि कुछ लोग यह कह रहे हैं कि अकाली दल तथा भाजपा में चुनाव समझौते का मार्ग प्रशस्त हो चुका है, परन्तु घोषणा अक्तूबर-नवम्बर में जाकर होगा।
हम समझते हैं कि अब भाजपा पंजाब में कांग्रेस को तो हराना चाहती ही है, परन्तु ‘आप’ को भी चाहे पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहती, परन्तु कमज़ोर अवश्य करना चाहती है, क्योंकि अब ‘आप’ इंडिया गुट से पूरी तरह बाहर है। इसलिए वह अब कांग्रेस की जगह कुछ स्थानों पर भाजपा के वोट भी खराब कर सकती है। 
भाजपा पंजाब के प्रति कितनी गम्भीर है, इसके संकेत सतीश पूनिया को पंजाब भाजपा का प्रभारी बनाने, पंजाब के मनप्रीत सिंह बादल तथा तरुण चुघ की नियुक्यिं से मिलता है, परन्तु सबसे बड़ा समाचार तथा संकेत यह है कि पंजाब भाजपा के समूचे चुनाव अभियान का प्रभारी प्रधानमंत्री के अति विश्वासपात्र गुजरात भाजपा के अध्यक्ष रहे केन्द्रीय मंत्री चन्द्रकांत रघुनाथ पाटिल को नियुक्त किया जा रहा है। वह प्रधानमंत्री के अपने चुनाव अभियान के भी प्रभारी रहे हैं। सो, अब अकेले अमित शाह ही पंजाब को नहीं देखेंगे, अपितु प्रधानमंत्री स्वयं पंजाब की देख-रेख करेंगे और अकाली दल के साथ चुनाव समझौता करने या न करने का फैसला लेंगे, परन्तु अ़फसोस की बात है कि प्रत्येक पार्टी तथा लोग सिर्फ इस बात की ही चर्चा कर रहे हैं कि पंजाब में अगली सरकार किसकी बनेगी, परन्तु किसी को चिन्ता नहीं कि डूब रहे पंजाब का क्या बनेगा।  
बात कुर्सी की बहुत गर्म है चौराहों पर,
डूबते गांव की करता नहीं चर्चा कोई।
—ओंकार गुलशन
वंदे मातरम् गीत तथा कांग्रेस 
कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के फैसला लिया है कि 1937 की कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक जिसमें रबीन्द्र नाथ टैगोर की सलाह से महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस तथा अन्य प्रमुख नेताओं ने फैसला लिया था कि वंदे मातरम् गीत के सिर्फ पहले दो अंतरे भी गाए जाया करेंगे, उस पर अभी भी क्रियान्वयन किया जाएगा। इसका कारण यही था कि पहले दो अंतरे मातृ-भूमि, नदियों, फसलों तथा खुशहाली की प्रशंसा में थे और शेष अंतरे हिन्दू देवियों की पूजा के लिए थे। हमें हिन्दू देवी-देवताओं की प्रशंसा पर कोई आपत्ति नहीं, और न ही किसी अन्य को आपत्ति होनी चाहिए, परन्तु किसी दूसरे धर्म के लोगों को किसी अन्य धर्म के महापुरुषों की प्रसंशा करने के लिए मजबूर करना लोकतंत्र के अनुकूल नहीं है। भाजपा ने ‘प्रीवैंशन ऑफ इन्सल्ट टू नैशनल ऑनर (अमैंडमैंट) एक्ट-2026’ बना कर इस गीत को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की भांति कानूनी सुरक्षा दे दी है, जिसके तहत इसके गायन में विघ्न डालने पर 3 वर्ष कैद तथा जुर्माना हो सकता है।
इसे भाजपा का हिन्दू राष्ट्र की ओर झुका एक कदम माना जा रहा है। संविधान की धारा 25 धार्मिक आज़ादी को जो महत्व देती है, यह कानून उससे सीधे टकराता है। मुसलमान पहले दो अंतरों को छोड़ कर शेष अंतरों का विरोध सिर्फ एक खुदा की प्रशंसा के आधार पर करते हैं, परन्तु अकेले मुस्लिम ही नहीं, अपितु नागालैंड बैपटिस्ट चर्च कौंसिल तथा आंध्र ईसाई फोरम ने भी इसका विरोध किया है। इस समय सिख नेतृत्व अभी चाहे इस संबंध में पूरी तरह चुप है, परन्तु 2006 में शिरोमणि कमेटी तथा दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी ने अपने स्कूलों में इसे गाने से इन्कार कर दिया था, क्योंकि सिख एक ओंकार की ही पूजा करते हैं। इससे बहुत पहले बाबा खड़क सिंह तथा मास्टर तारा सिंह भी इस पर आपत्ति जता चुके हैं।
़खैर, अब जब भाजपा बहुसंख्यक वोट की राजनीति कर रही है, उस समय कांग्रेस द्वारा यह फैसला लेना एक बड़ा कदम है जो कांग्रेस तथा सरकार में सीधा टकराव पैदा करेगा और यह देश की राजनीति ही नहीं, अपितु समूचे देश को प्रभावित करेगा। काश, हम बीते समय से कोई सबक लेते तथा राजनीतिक एवं धार्मिक हितों को अधिमान देने की बजाय धार्मिक समानता का मार्ग अपनाते हुए ‘सरबत दा भला’ की बात करते ।
इन्सान जहां भी पाते हैं,
हम दिल से उसे अपनाते हैं।
ये मज़हब-ओ-मिल्लत के झगड़े,
हम अहल-ए-मुहब्बत क्या जानें।
—सयदा ़फरहत


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