ए.आई. के उपयोग की सीमा तय होनी चाहिए

अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रसिद्ध कथन के अनुसार कल्पना ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) ज्ञान और सूचना उपलब्ध कराने में हमारी सहायता कर सकती है, लेकिन कल्पना की अग्नि मनुष्य के भीतर ही प्रज्वलित होनी चाहिये। हमें एआई से डरने की नहीं, उसके उपयोग की मर्यादा और सीमा तय करने की आवश्यकता है। मशीन को सहयोगी बनाइए, रचनाकार नहीं। उससे तथ्य पूछिए, लेकिन भाव स्वयं खोजिए। भाषा सुधारिए, लेकिन अनुभव अपना रखिए। जानकारी लीजिए, लेकिन दृष्टि अपनी बनाइए, क्योंकि आने वाले समय में शायद सबसे दुर्लभ चीज शब्द नहीं होगी, मौलिक अनुभूति होगी। आज इंटरनेट और ए.आई. ने ज्ञान और सूचना की दुनिया को अभूतपूर्व गति दी है। यह मानव सभ्यता की बड़ी उपलब्धि है। ए.आई. कठिन कामों को सरल बना सकती है, भाषा को व्यवस्थित कर सकती है, अनुवाद में सहायता कर सकती है, शोध के रास्ते खोल सकती है और रचनाकार को अनेक स्तरों पर सहयोग दे सकती है, किंतु चिंता तब उत्पन्न होती है, जब तकनीक सृजन की सहायक होने के बजाय सृजन का विकल्प बनने लगती है। आज कोई व्यक्ति जिसने साहित्य पढ़ा नहीं, कविता की बुनियादी समझ विकसित नहीं की, जीवन को साहित्यिक दृष्टि से देखने का अभ्यास नहीं किया और शब्दों के साथ वर्षों का रिश्ता नहीं बनाया, वह कुछ क्षणों में इंटरनेट या ए.आई. की सहायता से कविता, कहानी, गज़ल अथवा आलेख तैयार कर सकता है। रचना सामने आ जाती है, शब्द सुंदर दिखाई देते हैं, वाक्य आकर्षक होते हैं और भाव भी दिखाई देते हैं लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उनमें लेखक का अपना जीवन धड़कता है?
यहीं से साहित्यिक संवेदना का मूल प्रश्न पैदा होता है। साहित्य शब्दों का नहीं, अनुभूति का संसार है। महादेवी वर्मा ने साहित्य को मनुष्य की संवेदना से जोड़ते हुए रचना को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना। प्रेमचंद का साहित्य भी इसी का प्रमाण है कि साहित्य समाज के जीवन-संघर्षों से अलग होकर जीवित नहीं रह सकता। संत कबीर ने जो कहा, वह पढ़कर नहीं, जीकर कहा। तुलसीदास ने लोकजीवन को जिस गहराई से देखा, वह केवल शब्द-कौशल का परिणाम नहीं था। समस्या तकनीक में नहीं, उसके उपयोग के तरीके में है।  अनुभूति साहित्य की आत्मा होती है। एक सच्ची कविता को जन्म देने में कवि को कभी-कभी लंबा समय लग जाता है। हरिशंकर परसाई की व्यंग्य.दृष्टि केवल शब्दों का खेल नहीं थी। उसके पीछे समाज की विसंगतियों को देखने वाली तीक्ष्ण दृष्टि थी। मुक्तिबोध की कविता केवल कठिन शब्दों का संयोजन नहीं, उसके पीछे एक बेचैन आत्मा थी। प्रेमचंद की कहानियों के पीछे भारतीय समाज का गहरा अनुभव था। साहित्य का मूल्य उसकी उत्पादन-क्षमता से नहीं, उसकी अनुभूति की प्रामाणिकता से तय होता है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम युवाओं में कल्पना और सृजनशीलता को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे। कल्पना मनुष्य की मौलिक शक्ति है। यदि हर कल्पना के स्थान पर मशीन से तैयार उत्तर ले लिया जाए तो धीरे-धीरे मनुष्य स्वयं कल्पना करने की क्षमता का अभ्यास खो सकता है।
ए.आई. मनुष्य की बुद्धि की अद्भुत उपलब्धि है, लेकिन साहित्य मनुष्य के हृदय की उपलब्धि है। मशीन बारिश पर हज़ारों सुंदर पंक्तियां लिख सकती है, लेकिन बरसात में छप्पर टपकने की चिंता को उसी तरह महसूस नहीं कर सकती, जैसे एक गरीब परिवार महसूस करता है। इसलिए साहित्य को तकनीक से नहीं, तकनीक के अंधे और निर्भर उपयोग से बचाना होगा। साहित्य तब तक जीवित है, जब तक शब्दों के भीतर मनुष्य की धड़कन जीवित है। जिस दिन कविता केवल सुंदर शब्दों का उत्पादन बन जाएगी, उस दिन कविता तो हमारे पास होगी, लेकिन कवि शायद हमारे बीच नहीं होगा।
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