राजनीतिक दलों की नज़र अब जेन-ज़ी वोट बैंक पर

अक्सर शिकायत रहती है कि सरकारों और संस्थाओं को असुविधाजनक सवाल पसंद नहीं आते। भाजपा के विभिन्न आनुषंगिक संगठन जेन-ज़ी से सम्पर्क बढ़ाने में जुट गए हैं। वे उनके मुद्दों को संवेदनशीलता से सुनने और समाधान के प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दावा किया है कि वह हर महीने दस हज़ार युवाओं को अपने ऐप से जोड़ रहा है। किशोर गण, तरुण गण की शाखाओं के माध्यम से वह इन पर खास ध्यान दे रहा है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्कूल-कॉलेज के अलावा कोचिंग सेंटर, कॉलेज क्लब तक पहुंच रहा है, तो कांग्रेस एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के ज़रिये युवाओं के लिए नए कार्यक्रम ला रही है। राहुल गांधी उन्हें लेकर अलग अभियान छेड़े हुए हैं। 
समाजवादी पार्टी युवजन सभा और समाजवादी छात्र सभा के ज़रिये अभियान चलाने की तैयारी में है। वह कैंपस कनेक्ट कार्यक्रम करेगी, जिसके लिए डिम्पल यादव ने कमर कस ली है। तमिलनाडु में विजय की पार्टी टीवीके ने युवाओं को चुनावी राजनीति के केंद्र में रखते हुए नौकरी की गारंटी, स्टार्टअप और शिक्षा ऋण, सरकारी कॉलेज के विद्यार्थियों को लैपटॉप तथा छात्रवृत्ति का वादा करके सियासी समर जीत लिया है, तो डीएमके और एआईडीएमके ने महिलाओं, किसानों और बुजुर्गों पर अधिक जोर दिया और हार गए। 
साफ है कि चुनावी समीकरण में महिला, पिछड़ा, किसान और दलित जैसे वर्गों के साथ अब जेन-ज़ी भी एक अहम वोटर ग्रुप बनता जा रहा है। इसकी उपेक्षा चुनावी वैतरणी में नौका डुबो सकती है। सो. डीएमके ने युवाओं से जुड़ने के लिए अपनी भाषा और संवाद शैली में बदलाव कर लिया है और युवा मतदाताओं से फीडबैक लेने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक भाजपा ने 18-25 वर्ष के मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अलग ‘तरुण मोर्चा’ की योजना बनाई है। भारत की 234 लोकसभा सीटों पर जेन-ज़ी मतदाता कुल वोट बैंक का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, हरियाणा, मध्य प्रदेश में जेन-ज़ी, युवा मतदाताओं का प्रतिशत तीस के करीब पहुंच रहा है। ज़ाहिर है, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों को अपनी चुनावी रणनीति को पूरी तरह बदलने का समय आ गया है और इसके मद्देनज़र पूरे देश में युवा मतदाताओं को लुभाने की कवायद स्वाभाविक ही है। 2027 में सात राज्यों में चुनाव हैं। उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा के विधानसभा चुनावों में जेन-ज़ी मतदाता अहम भूमिका निभाएंगे। उत्तर प्रदेश में यह हिस्सा लगभग 22 प्रतिशत, गुजरात में चौबीस के आसपास, पंजाब में 22, उत्तराखंड में 23 के करीब और हिमाचल प्रदेश में 22 प्रतिशत है। चुनाव वाले सात राज्यों में पिछले विधानसभा चुनाव की कुल 940 सीटों में 257 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर 5 प्रतिशत या उससे कम था। पिछली बार उत्तर प्रदेश की 403 में से 131 सीटें ऐसी थीं, जहां जीत का अंतर 5 प्रतिशत से कम था। गुजरात की 182 में से 27, पंजाब की 117 में से 24, उत्तराखंड की 70 में से 15 और हिमाचल की 68 में से 14 सीटें इसी श्रेणी में हैं। 
पार्टियां जान रही हैं कि जेन-ज़ी के वोटरों का 5 फीसदी इधर-उधर हुआ तो बहुमत का आंकड़ा बदल सकता है, जिसकी तरफ  जेन-ज़ी, उसके वारे-न्यारे हो सकते हैं। युवा शक्ति पर ध्यान देना एक सकारात्मक सियासी सरोकार है, मगर राजनीतिक दलों द्वारा युवाओं को लुभाने वाली हालिया कोशिशें रणनीतिक और राजनीतिक स्तर पर कुछ सवाल भी खड़े करती हैं। पहला प्रश्न यह कि विभिन्न दलों की मौजूदा कोशिशें क्या पर्याप्त सुविचारित और सटीक हैं? क्या देशभर के युवा या जेन-ज़ी के लिए कोई समान रणनीति सफल हो सकती है? इस पीढ़ी का किसी खास विचारधारा या सियासी शैली में अत्यधिक समर्पण नहीं दिखता। न वह किसी दल का बंधुआ होना चाहता है। 
जेन-ज़ी का उभार देश में राजनीति विज्ञान की कामकाज के आधार पर वैधता (परफॉर्मेंस लेजिटिमेसी) की अवधारणा को मज़बूत करता दिखता है यानी अब सरकार की वैधता किसी विचारधारा के प्रतिनिधित्व की बजाय इस बात से भी होगी कि उसने प्रणाली को कितना विश्वसनीय बनाया, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और बेहतर जीवन के अवसर कितने बढ़ाए, संस्थाओं को कितना जवाबदेह बनाया तथा नागरिक को शासन कितना पारदर्शी दिखाई दिया?
 क्या सरकारें इस चुनौती को स्वीकार कर पाएंगी? इस नए वर्ग पर ज्यादा ध्यान देने से महिला, किसान, दलित और पिछड़े मतदाताओं की राजनीति उपेक्षित तो नहीं होगी? जब एक महिला मतदाता दलित किसान परिवार का युवा भी होगा तो पार्टियां इस समीकरण को कैसे हल करेंगी? पार्टियां इन पहचान के अंतर्संबंधों को कैसे समझेंगी? क्या सियासी दल यह स्वीकारेंगे कि महिला मतदाताओं की तरह युवा मतदाता कोई एक रूप वोट-बैंक नहीं बनेगा।  आने वाले वर्षों में सफल वही दल होगा, जो युवा को प्रभावित करने से आगे बढ़कर उसे यह विश्वास दिला सके कि उसके वोट का सम्मान उसके पांच साल के प्रदर्शन में दिखाई देगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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