आत्म-निर्भरता अब विकल्प नहीं, रणनीतिक ज़रूरत
दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें आर्थिक वैश्वीकरण की चमक के पीछे एक नई वास्तविकता तेज़ी से उभर रही है। युद्ध, व्यापार प्रतिबंध, प्रतिबंधात्मक शुल्क, समुद्री मार्गों पर संकट, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति शृंखलाओं के हथियारीकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश की आर्थिक ताकत केवल उसके विदेशी व्यापार के आकार से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि संकट के समय वह अपनी आवश्यकताओं के लिए कितना दूसरे देशों पर निर्भर है। ऐसे समय में भारत के लिए ‘स्वदेशी’ और ‘आत्म-निर्भरता’ का अर्थ पुराने ज़माने की बंद अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक ऐसी आधुनिक रणनीति है जिसमें देश वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा भी रहे और अपनी महत्वपूर्ण ज़रूरतों के लिए दूसरों का बंधक भी न बने। अमरीका और ईरान के बीच जारी युद्ध ने इस चुनौती को और स्पष्ट कर दिया है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही पर अनिश्चितता ने अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ार को प्रभावित किया है।
भारत के लिए यह केवल पेट्रोल और डीज़ल महंगा होने का सवाल नहीं है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर परिवहन, उर्वरक, बिजली, रसायन, प्लास्टिक, विमानन और लगभग पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने लगभग 245.77 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया। इसलिए पश्चिम एशिया का कोई भी बड़ा संकट भारत के आयात बिल, रुपये की विनिमय दर, महंगाई और चालू खाते के संतुलन पर सीधा असर डाल सकता है। यही वह बिंदु है जहां ‘स्वदेशी’ की नई अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत दुनिया से कट जाए और हर वस्तु देश में ही बनाए। ऐसा करना न तो व्यावहारिक है और न आर्थिक रूप से लाभदायक। आधुनिक आत्म-निर्भरता का अर्थ है—जहां रणनीतिक निर्भरता खतरनाक है, वहां घरेलू क्षमता विकसित करना, जहां वैश्विक सहयोग लाभकारी है, वहां विविध स्रोतों से जुड़ना और जहां तकनीक महत्वपूर्ण है, वहां अपनी तकनीकी क्षमता मज़बूत करना।
ऊर्जा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी पेट्रोलियम और गैस के आयात पर काफी निर्भर है। ऐसे में वास्तविक ऊर्जा आत्म-निर्भरता का पहला लक्ष्य घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना होना चाहिए, लेकिन केवल इसी से समस्या का समाधान नहीं होगा। भारत के लिए दीर्घकालीन रास्ता सौर, पवन, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण और विद्युत् परिवहन का व्यापक विस्तार है। इस दिशा में भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार मई 2026 तक देश में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 162.15 गीगावाट तक पहुंच चुकी थी। फिर भी पेट्रोल और गैस की ज़रूरत अचानक समाप्त नहीं हो सकती। इसलिए संक्रमण काल में भारत को तीन स्तरों पर काम करना होगा। पहला, घरेलू तेल और गैस उत्पादन में निवेश बढ़ाना। दूसरा, आयात के स्रोतों और समुद्री मार्गों में अधिक विविधता लाना। तीसरा, रणनीतिक भंडार बढ़ाना। भारत की मौजूदा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण क्षमता 5.33 मिलियन टन है और इसे और बढ़ाने की योजनाएं आगे बढ़ रही हैं।
भारत ने संकट के बीच आपूर्ति स्रोतों में विविधता बढ़ाने की क्षमता भी दिखाई है। मार्च 2026 में सरकार के अनुसार भारत करीब 40 देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा था और लगभग 70 प्रतिशत आयात ऐसे मार्गों से आ रहा था जो होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर नहीं थे। इसका अर्थ यह है कि आत्म-निर्भरता का मतलब केवल ‘अपने देश में उत्पादन’ नहीं, बल्कि किसी एक देश या मार्ग पर निर्भर न रहना भी है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का सशत्रीकरण केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। सेमीकंडक्टर, दवाइयां, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, दुर्लभ खनिज, खाद्य तेल और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक बाहरी निर्भरता किसी भी समय आर्थिक कमज़ोरी बन सकती है। कोविड-19 महामारी ने दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति का संकट दिखाया था। रूस-यूक्रेन युद्ध ने खाद्य और ऊर्जा बाज़ारों की कमज़ोरियां सामने रखीं। अब पश्चिम एशिया का संकट समुद्री व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा की संवेदनशीलता बता रहा है।
इसलिए भारत की नई स्वदेशी नीति का अगला चरण ‘महत्वपूर्ण क्षेत्रों की आत्म-निर्भरता’ होना चाहिए। सेमीकंडक्टर से लेकर बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दूरसंचार उपकरण और महत्वपूर्ण खनिजों तक घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी। लेकिन इसके साथ गुणवत्ता, लागत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी ध्यान में रखना होगा। यदि आत्म-निर्भरता केवल ऊंची लागत पर महंगा घरेलू उत्पादन करने का माध्यम बन गई तो वह अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय कमज़ोर कर सकती है।
भारत के लिए सही मॉडल ‘स्वदेशी और वैश्विक’ का संतुलन है। दुनिया से तकनीक लीजिए, लेकिन अपनी तकनीकी क्षमता भी विकसित कीजिए। विदेशों से कच्चा माल खरीदिए, लेकिन अनेक स्रोत विकसित कीजिए। वैश्विक बाज़ार में बेचिए, लेकिन घरेलू आपूर्ति शृंखला को मज़बूत रखिए। विदेशी निवेश स्वीकार कीजिए, लेकिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रणनीतिक नियंत्रण और तकनीकी क्षमता देश में विकसित कीजिए।
ईरान-अमरीका युद्ध का सबसे बड़ा सबक यही है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल कंपनियों या पेट्रोलियम मंत्रालय का विषय नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है। यदि भारत भविष्य में पेट्रोलियम उत्पादों के बड़े हिस्से का विकल्प बिजली, हरित हाइड्रोजन और अन्य स्वदेशी ऊर्जा स्रोतों से तैयार कर लेता है तो किसी विदेशी युद्ध, समुद्री नाकाबंदी या तेल उत्पादक देशों के राजनीतिक फैसले का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफी कम हो जाएगा। ‘आत्म-निर्भरत भारत’ की वास्तविक सफलता तब होगी जब भारत संकट के समय दुनिया से व्यापार करने के लिए स्वतंत्र हो, लेकिन अपनी मूलभूत ज़रूरतों के लिए किसी एक देश की ओर देखने को मजबूर न हो।
आज वैश्विक अनिश्चितता भारत के लिए चुनौती अवश्य है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक अवसर भी है। यदि भारत ऊर्जा, तकनीक रक्षा, खाद्य, स्वास्थ्य और महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करता है, तो आने वाले दशकों में उसकी आर्थिक संप्रभुता कहीं अधिक मजबूत होगी। अमरीका-ईरान संघर्ष ने एक बार फिर बता दिया है कि वैश्विक बाज़ार में सबसे सुरक्षित वही देश है जो दुनिया के साथ जुड़ा हो, लेकिन संकट के समय अपने पैरों पर खड़ा रहने की क्षमता भी रखता हो। ‘स्वदेशी’ अब भविष्य की रणनीति है। भारत के लिए यह रणनीति अब आर्थिक विकल्प से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता का आधार बन चुकी है। (युवराज फीचर्स)



