रंगों और उत्सवों का महासंगम है केरल का महापर्व ओणम
26 अगस्त पर विशेष
यदि उत्तर भारत की होली रंगों का उत्सव है, पश्चिम भारत में गुजरात का नवरात्रि लोकनृत्यों का उत्सव है और पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा आस्था का विराट आयोजन है, तो समझ लीजिए ओणम इन सभी रंगों और उत्सवों का महासंगम है। दस दिनों तक पूरा केरल मानो एक विशाल सांस्कृतिक रंगमंच में बदल जाता है- जहां फूलों की रंगोलियां (पुक्कलम), सर्प नौकाओं की रोमांच दौड़, कथकली और पुलिकली जैसे लोकनृत्य, पारंपरिक संगीत, सामूहिक भोज (ओणसद्या) तथा महाबलि की लोकगाथा। ये सब मिलकर ऐसा उत्सवी वातावरण रचते हैं, जिसे सचमुच दस दिनों की सांस्कृतिक होली कहा जा सकता है। ओणम केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है बल्कि यह केरल की लोककला, सामाजिक समरसता, पारिवारिक एकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का महाउत्सव है। शायद यही कारण है कि ओणम आज केरल की सीमाओं से निकलकर भारतीय संस्कृति की इस जीवंत पहचान का हिस्सा हो चुका है, जहां उत्सव केवल मनाया नहीं जाता बल्कि जीया जाता है।
ओणम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक धर्म या एक समुदाय का पर्व नहीं है। केरल में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य समुदाय के लोग भी इसे पूरे सम्मान और उत्साह से मनाते हैं। इसलिए यह केरल की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक केरल पर राजा महाबलि का शासन था। महाबलि बेहद न्यायप्रिय, दयालु और प्रजावत्सल शासक थे। कहा जाता है कि उनके राज्य में कोई गरीब नहीं था। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होता था और सभी लोग सुखी थे। देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर महाबलि की दयालुता और दानवीरता की परीक्षा लेने हेतु तीन पग भूमि मांगी। जब महाबलि ने कहा आप नाप लें, तो वामन के अवतार में भगवान विष्णु ने दो पगों में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया और अब तीसरे पग के लिए कहीं कोई जगह नहीं थी, तो महाबलि ने अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। इस पर भगवान विष्णु ने महाबलि की भक्ति और त्याग से प्रसन्न होकर उन्हें एक वरदान दिया कि वह हर साल एक बार अपनी प्रजा से मिलने स्वर्ग से आया करेंगे। वास्तव में ओणम का उत्सव महाबलि के आगमन की खुशी का उत्सव है।
यह कथा केवल धार्मिक आस्था की नहीं बल्कि आदर्श शासन, समानता, न्यायप्रियता, त्याग और जनकल्याण के मूल्यों का संदेश देती है। ओणम दस दिनों तक मनाया जाता है। इसलिए ओणम का अंतिम उत्सव दिन तो इस साल 26 अगस्त होगा, लेकिन इसकी शुरुआत दस दिन पहले 16 अगस्त से ही हो जायेगी। ओणम की शुरुआत में सबसे पहले घरों के आंगन में फूलों की रंगोलियां बनायी जाती हैं। प्रत्येक दिन रंगबिरंगे फूलों से सजने वाली यह रंगोली प्रकृति के प्रति प्रेम और सौंदर्यबोध का प्रतीक है। फूलों की इन रंगोलियों को यहां की स्थानीय भाषा में पुक्कलम कहा जाता है। इसी दौरान पारंपरिक नृत्य तिरुवातिराकली, कुम्माट्टिकली, पुलिकली (बाघ नृत्य) और कथकली की प्रस्तुतियां पूरे राज्य में आकर्षण का केंद्र बनती हैं। लोकगीतों की मधुर धुनें और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज से इस दौरान केरल के गांव और शहर झूम उठते हैं। इसी समय केरल की प्रसिद्ध वल्लमकली (सर्प नौका दौड़) ओणम की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। इन लंबी-लंबी नौकाओं में जिनके अगले सिरे सांप के फल जैसे होते हैं, में सैकड़ों नाविक एक साथ पूरे तालमेल के साथ चप्पू चलाते हैं। यह केवल प्रतियोगिता नहीं है बल्कि सामूहिकता, अनुशासन और टीम भावना का प्रदर्शन है।
ओणम का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष यह है कि यह वर्ग, जाति और धर्म की सीमाओं को पीछे छोड़कर लोगाें को एक सूत्र में बांधता है। ओणम के समय केरल में परिवार के सभी सदस्य चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों, अपने घर लौटने का प्रयास करते हैं। इस दस दिनों के उत्सव में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, मिलकर सामूहिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं और सामूहिक भोज का आनंद उठाते हैं। यही कारण है कि ओणम को सामाजिक समरसता और पारिवारिक एकता का भी महापर्व कहा जाता है। आज की तारीख में विभिन्न खाड़ी देशों, यूरोप, अमरीका और अन्य देशों में बसे मलयाली समुदाय भी अलग-अलग जगहों में केरल की ही तरह पूरे उत्साह से अपना यह पर्व मनाते हैं, जिसके प्रति दुनिया के हर देश के लोग आकर्षित होते हैं और यह भी इसका हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं।
ओणम का जिक्र ओणसद्या के बिना अधूरा है। केले के पत्ते पर परोसा जाने वाला यह पारंपरिक भोज केवल भोजन नहीं है, यह केरल की पाक संस्कृति का भी उत्सव है। इसमें अनेक प्रकार की सब्जियां, सांभर, अलियल, ओणम, थोरण, अचार, पापड़ और अंत में पायसम परोसा जाता है। इस भोजन की विशेषता यह होती है कि इसमें स्वाद के साथ संतुलित पोषण और सामूहिक भोजन की भावना भी शामिल होती है। परिवार व मित्र एक साथ बैठकर भोजन करते हैं,जिससे आपसी संबंध और मजबूत होते हैं। ओणम चूंकि वर्षा ऋतु के बाद अच्छी फसल आने की खुशी का पर्व है, इसलिए इसका गहरा संबंध कृषि और प्रकृति से भी है। फूलों की सजावट, हरियाली, नई फसल और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान इस पर्व की प्रमुख विशेषता है। आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया की चिंता बन चुका है, तब ओणम हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





