डायलॉग के दम पर चली थी प्रेम चोपड़ा की खलनायकी

अपनी सहेली को बस इतना बता दो कि उससे कोई प्यार करने लगा है’। फिल्म ‘समाज को बदल डालो’ (1970) के मोहम्मद रफी के इस मशहूर गीत को पर्दे पर, आपको सुनकर हैरत होगी, प्रेम चोपड़ा ने गाया था जो अपनी खलनायकी के लिए 60 व 70 के दशकों में प्रसिद्ध थे। प्रेम चोपड़ा अन्य खलनायकों की तरह पर्दे पर बुराई को प्रदर्शित करने के लिए भयानक दिखाई देने वाले मेकअप का सहारा नहीं लेते थे, न ही ‘बुरा काम’ कराने के लिए वह चमचों का सहारा लेते थे और न ही उन्हें नफरत प्रकट करने वाले नामों की ज़रूरत थी। वह तो अपने डायलॉग और उनकी अदायगी से ही पर्दे पर आग लगा दिया करते थे। इसलिए उनके बोले डायलॉग आज भी चर्चा का विषय हैं, जैसे- ‘प्रेम नाम है मेरा...प्रेम चोपड़ा’ (बॉबी, 1974) आज भी लोगों की ज़बान पर है। इसके अतिरिक्त ‘मैं वो बला हूं जो शीशे से पत्थर को तोड़ती है’ (सौतन), ‘शराफत और ईमानदारी का सर्टिफिकेट यह दुनिया सिर्फ उन्हें देती है जिनके पास दौलत होती है’ (आग का गोला, 1989), ‘भैंस पूंछ उठायेगी तो गाना तो नहीं गायेगी, गोबर ही देगी’ (आज का अर्जुन, 1990), ‘तू माधुरी से थोड़ी कम और मंदाकिनी से थोड़ी ज्यादा है’ (आज का गुंडा राज, 1992), ‘राजनीति की भैंस के लिए दौलत की लाठी की ज़रुरत होती है’ (खिलाड़ी, 1992) आदि।
प्रेम चोपड़ा का जन्म 23 सितम्बर 1935 को लाहौर में पंजाबी हिन्दू परिवार में हुआ था। वह रणबीर लाल व रूपरानी चोपड़ा के 6 बच्चों में से तीसरी संतान हैं। देश विभाजन के बाद जब उनका परिवार शिमला आ गया, जहां उन्होंने स्कूल व कॉलेज शिक्षा पूर्ण की, तो अटॉर्नी जनरल के कार्यालय में सेवारत उनके पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर या आईएएस अधिकारी बनें। पिता के ज़ोर देने पर वह पंजाब विश्वविद्यालय से कला में स्नातक तो हो गए लेकिन कॉलेज के दिनों में उत्साह से नाटकों में हिस्सा लेने वाले प्रेम चोपड़ा का दिल तो अभिनय में था। इसलिए वह घर से बगावत करके मुंबई आ गए। प्रेम चोपड़ा मुंबई आकर कोलाबा के एक गेस्टहाउस में रहने लगे और अपने पोर्टफोलियो के साथ स्टूडियोज के चक्कर लगाने लगे, लेकिन प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक नहीं मिली। लिहाज़ा ज़िंदा रहने के लिए ‘द टाइम्स ऑ़फ इंडिया’ अखबार के सर्कुलेशन विभाग में नौकरी कर ली, जहां उनके लिए ज़रूरी था कि माह में 20 दिन बंगाल, बिहार व ओडिशा की यात्रा करें। अपनी यात्रा समय कम करने के लिए वह एजेंटों को स्टेशन पर ही बुला लिया करते थे, जिससे वह 12 दिन में अपना काम पूरा करके बाकी समय एक से दूसरे स्टूडियो के चक्कर लगाते रहते। 
एक दिन सब-अर्बन ट्रेन से यात्रा करते हुए प्रेम चोपड़ा की मुलाकात एक अजनबी से हुई, जिसने उनसे मालूम किया कि क्या वह फिल्मों में काम करना पसंद करेंगे? प्रेम चोपड़ा ने जब हां में सिर हिलाया तो अजनबी उन्हें रंजीत स्टूडियो लेकर गया, जहां पंजाबी फिल्म ‘चौधरी करनैल सिंह’ के निर्माता जगजीत सेठी ने उन्हें हीरो की भूमिका दे दी। देश विभाजन की पृष्ठभूमि में बनी इस प्रेम कथा को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया और यह आर्थिक दृष्टि से भी सफल रही। इस फिल्म में काम करने के लिए प्रेम चोपड़ा को न सिर्फ 2500 रूपये मिले बल्कि ‘वो कौन थी’, ‘शहीद’, ‘तीसरी मंज़िल’ जैसी फिल्मों में काम भी मिला। लेकिन इसके बावजूद वह अभिनय को अपना फुल-टाइम प्रोफेशन बनाने के लिए तैयार नहीं थे, खासकर इसलिए कि उनकी शुरुआती 6 फिल्मों में से चार फ्लॉप हो गई थीं। इसलिए उन्होंने अखबार में अपनी नौकरी जारी रखी, जिसे उन्होंने 1967 में फिल्म ‘उपकार’ के आने के बाद छोड़ा जब उनके पास विलेन की बहुत अधिक भूमिकाएं आने लगी थीं। 
बहरहाल, प्रेम चोपड़ा की पहली फिल्म बनकर तैयार ही हुई थी कि उनकी मां का मुख कैंसर के कारण निधन हो गया, जिससे उनकी 9 साल की बहन अंजू की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी उनके पिता व चार अन्य भाइयों पर आ गई। भाइयों ने अपनी अपनी पत्नियों को चेतावनी दी कि अगर उनकी बहन खुश होगी तो ही वह प्रसन्न रहेंगे। प्रेम चोपड़ा अपनी बहन को अपनी सबसे ‘बड़ी बेटी’ मानते हैं।  विख्यात लेखक निर्देशक लेख टंडन प्रेम चोपड़ा के लिए कृष्णा कपूर (राज कपूर की पत्नी), प्रेमनाथ व राजेंदर नाथ की सबसे छोटी बहन उमा का रिश्ता लेकर आए थे। प्रेम चोपड़ा व उमा के तीन बेटियां हैं। सबसे बड़ी बेटी रकिता की शादी फिल्म पब्लिसिटी डिज़ाइनर राहुल नंदा (उपन्यासकार गुलशन नंदा के पुत्र) से हुई है। दूसरी बेटी पुनीता बांद्रा (मुंबई) में विंड चाईम्स नामक प्री-स्कूल की मालकिन हैं और उनका विवाह गायक व टीवी एक्टर विकास भल्ला से हुआ है। तीसरी बेटी प्रेरणा फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के चर्चित अभिनेता शरमन जोशी की पत्नी हैं। 
हालांकि फिल्मों में स्थापित होने के बाद प्रेम चोपड़ा ने अपने भाइयों का बहुत ख्याल रखा और उनकी भरपूर मदद भी की, लेकिन 80 के दशक में उनके चार में से दो भाइयों से रिश्ते बहुत खराब हो गए। हुआ यूं कि 1980 में प्रेम चोपड़ा ने दिल्ली में एक बंगला खरीदा था जो उनके व उनके पिता के नाम में था। इसमें उनके पिता व एक भाई, जिसे उन्होंने दिल्ली में जॉब दिलाया था, रहते थे लेकिन पिता के निधन से एक दिन पहले उनके भाई ने पिता से ऐसी वसीयत पर दस्तख्त करा लिए जिसमें प्रेम चोपड़ा को बंगले के मालिकाना हक़ से निकाल दिया गया था। बाद में उसी बंगले में आयकर विभाग का छापा पड़ा और वहां रह रहे भाई ने कहा कि प्रेम चोपड़ा ने उसे बंगला दिया था, जो प्रेम चोपड़ा के ही नाम पर है। प्रेम चोपड़ा के मुंबई में दो अन्य मकान थे, जिन्हें उनके भाइयों ने उन्हें बिना बताए, पैसे के लालच में, सस्ते में बेच दिया था। यह बातें उनकी बेटी रकिता नंदा द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी ‘प्रेम नाम है मेरा... प्रेम चोपड़ा’ में लिखी हुई हैं, जो अप्रैल 2014 में रिलीज़ हुई थी। 
प्रेम चोपड़ा का करियर 1969 से 1994 तक अपने चरम पर था, जिस दौरान उन्होंने राजेश खन्ना के साथ 19 फिल्में कीं जिनमें से 15 सुपरहिट रहीं। इन दोनों की जोड़ी इतनी हिट थी कि वितरक यह नहीं मालूम करते थे कि फिल्म में राजेश खन्ना की हीरोइन कौन है बल्कि यह जानना चाहते थे कि प्रेम चोपड़ा विलेन के रूप में हैं या नहीं। बरहाल, अपने लगभग छह दशक लम्बे करियर के दौरान प्रेम चोपड़ा ने लगभग 380 फिल्मों में काम किया जिनमें से अधिकतर में वह विलेन थे और कुछ में हीरो व चरित्र अभिनेता भी लेकिन 2005 के बाद से वह पर्दे पर कम ही दिखाई देते हैं, रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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