आधी रात को मिली आज़ादी की भावुक तरंगें

मनुष्य अपने स्वभाव अनुसार स्वाभाविक रूप से ही किसी नाटक या फिल्म को पर्दे पर देखते हुए इसके पात्रों को नायक या खलनायक की श्रेणी में बांट लेता है। शायद ही कोई दर्शक उन पात्रों के मनोविज्ञान तक पहुंचने का यत्न करता हो। वास्तव में अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता। गहराई से सोचा जाए तो अल्बर्ट आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत केवल भौतिक विज्ञान तक सीमित न रह कर समूची मानव जाति के मनोविज्ञान को भी अपने कलावे में लपेट लेता है। अभिप्राय यह कि हर मानव मन का किसी स्थिति को समझने और उसकी प्रतिक्रिया देने का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है। 
बचपन से ही भारत की आज़ादी का संघर्ष मेरी निजी दिलचस्पी का विषय रहा है। मेरे लिए यह संघर्ष 20वीं शताब्दी की पहली अर्ध शताब्दी के देशकाल दौरान खेला गया एक महानाटक है परन्तु मेरे मन का कैनवस इन पात्रों को नायक या खलनायक के बिम्बों द्वारा उकेरे जाने से मुनकर होते हमेशा किसी निष्पक्ष रचना को पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है। इसी अनुसंधान के दौरान पिछले दिनों मेरे हाथ दो गैर भारतीय लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तक स्नह्म्द्गद्गस्रशद्व ड्डह्ल रूद्बस्रठ्ठद्बद्दद्धह्ल (1975) का पंजाबी अनुवाद ‘अद्धी रात नूं आज़ादी’ लगा। दिलचस्प बात यह है कि इस किताब के लेखक लैरी कालंस अमरीका के प्रसिद्ध पत्रकार और दामीनिक लैपरीयर फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक हैं जिनके पास किसी भी पक्ष (हिन्दू/मुस्लिम/सिख) का पक्षपात करने का कोई आधार ही नहीं था। इस बहुत चर्चित किताब का पंजाबी अनुवाद ‘पीपल्ज़ फर्म बरगाड़ी, पंजाब’ द्वारा छापा गया है। अनुवाद भूपिंदरपाल सिंह जैतो जी ने किया है। तथ्यों पर आधारित इस वृहद्-आकार किताब को लिखने के लिए न सिर्फ ऐतिहासिक दस्तावेजों को बल्कि समय के बहुत सारे चश्मदीद गवाहों के साथ निजी और रिकार्ड की हुई मुलाकातों को भी अनुसंधान में शामिल किया गया है। आओ! इस महानाटक के अहम किरदारों और उस समय की स्थिति को समझने की कोशिश करें।
यह बात 1947 के पहले दिन से शुरू होती है। इंग्लैंड की लेबर पार्टी का नेता कलीमैंट एटली देश का प्रमुख चुना जा चुका होता है। वह उपनिवेशवाद का हिमायती न होने के कारण ब्रिटिश साम्राज्य को भारत की बागी हो चुकी धरती से समेट लेना चाहता था। यह ऐतिहासिक कार्य किस विधि विधान के साथ पूरा करना है, यह काम उस समय के भारत के वायसराय वेवल की नेक नीति के बावजूद उसके बस से बाहर होता जा रहा था। इसलिए एटली ने माउंटबेटन को जो कि दक्षिण पूर्व एशिया के सुप्रीम कमांडर के पद पर काम कर चुका था, इस मकसद के लिए चुना। माउंटबेटन भारत की राजनीतिक स्थिति से अवगत थे और समुद्री युद्धों के अनुभव ने उनको ऐसी सूझ-बूझ दी थी जिससे वह बड़े से बड़े फैसले भी तुरंत ले सकते थे।
माउंटबेटन बिल्कुल इस पद को संभालना नहीं चाहते थे। इसका मतलब यह नहीं था कि वह भारत छोड़ने की ब्रिटिश सोच से सहमत नहीं थे परन्तु राज समेटने का जोखिम भरा काम माउंटबेटन ही क्यों करे, इसलिए एटली को टालने के इरादे से माउंटबेटन ने तरह-तरह की शर्तें उनके सामने रखीं। परन्तु एटली ने उसकी हर मुश्किल से मुश्किल शर्त मंज़ूर कर ली। अंतत: 46 वर्ष के माउंटबेटन अपनी पत्नी एडविना, पुत्री पामेला और अन्य लाव लश्कर के साथ भारत के लिए रवाना हो जाते हैं। (मार्च 1947)
दूसरी तरफ भारत में बंगाल की खाड़ी के किनारे पर मोहन दास करम चंद गांधी नामक एक अदना सा आदमी क्रांति की एक अलग विधि की अलख जलाए बैठा था। धरातल पर सो रहा वह आदमी उस समय बहुत कमजोर और छोटा सा लगता था। 77 वर्ष का वह बुजुर्ग आदमी, जिसका झुर्रियों से भरा चेहरा आत्म विश्वास से चमक रहा था, इतना शक्तिशाली था कि ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें जितनी उसने खोदी थीं उतनी और किसी ने नहीं। उन्हीं दिनों में जब हिंसा की स्थिति अपनी चरम सीमा पर थी तो गांधी जी ने अहिंसा का सिद्धांत सामने रखा। हथियार से नहीं, मनोबल से लड़ो। उन्होंने भूख (हड़ताल) को एक हथियार के रूप में सफलतापूर्वक प्रयोग किया। मानवीय मेहनत के वह इतने कद्रदान थे कि उनका मत था कि पैंसिल मनुष्य की मेहनत का प्रतीक है। यदि उसको ठीक तरह से प्रयोग किए बिना फैंक दिया गया तो इससे किसी मनुष्य की मेहनत की बेइज्जती होगी। इसलिए पत्र लिखने के लिए पैंसिल को वह अंतिम सिरे तक प्रयोग करते। गांधी जी का मानना था कि किसी का सिर काट कर आप उन विचारों को नहीं बदल सकते जो उस सिर में पैदा होते हैं। यदि किसी का मन बदलना है तो इसका तरीका यह नहीं कि आप उसके दिमाग के आर-पार गोली मार दें। उनकी ऐसी क्रांतिकारी विचारधारा रस्किन, थोडो और टालस्टाय के विचारों से प्रभावित थी। गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर उनके ऐसे गुणों से इतने प्रभावित हुए कि गांधी जी को उन्होंने ही पहली बार महात्मा की उपाधि दी थी।
24 मार्च, 1947 को भारत के अंतिम वायसराय के सिंहासन पर पर बैठते ही माउंटबेटन जोड़ी ने यहां से लोगों पर शासन करने के लिए धक्केशाही के विपरीत उदारता, सहचार और मिलनसारता का तरीका अपनाया। पहले शासकों के उलट वह यहां से समागमों में आम मेहमानों की तरह शरीक होते और सभी के साथ हाथ मिलाते और हाल चाल पूछते। वायसराय हाऊस में भी वैष्णो भारतीय मेहमानों के लिए खास शाकाहारी भोजन पकाया जाने लगा और उनको छुरी कांटे के स्थान पर हाथ से खाने की छूट भी दी जाने लगी। सद्भावना की इस नीति को कायम रखते हुए माउंटबेटन ने प्रमुख भारतीय नेताओं के साथ अलग-अलग मिलने का फैसला किया... दोस्ताना माहौल में ताकि उनका आज़ादी की रूप रेखा के प्रति दृष्टिकोण जाना जा सके।
जो नेता माउंट बेटन के सामने सबसे पहले पेश हुए, वह भारत के प्रसिद्ध और लोकप्रिय नेताओं में से एक थे। गंजे होते जा रहे सिर पर खादी की टोपी रखते थे। जैकेट के तीसरे काज में ताज़ा गुलाब रखते थे। जवाहर लाल नेहरू सुंदरता से जड़ा व्यक्तित्व भारत के नये वायसराय के मुकाबले किसी तरह भी कम नहीं बैठता था। नेहरू जी ने मन ही मन वह सांचा तैयार कर लिया हुआ था जिसमें वह नये भारत को ढालना चाहते थे। नये भारत के दो बुनियादी स्तम्भ जो जवाहर लाल ने सोच रखे थे— इंग्लैंड का संसदीय लोकतंत्र और कार्क्स मार्क्स का आर्थिक समाजवाद। वह देश को उद्योगिक क्रांति के रास्ते पर चलाना चाहते थे।
बातों ही बातों में माउंटबेटन ने टटोल लिया कि गांधी जी का बहुत सम्मान करते होने के बावजूद नेहरू के उनके साथ कुछ वैचारिक मतभेद थे। वह गांधी जी को तर्क के स्थान पर भावुकतावश भारत की अखंडता की बात करने वाला क्रांतिकारी समझते थे। माउंटबेटन ने नेहरू को विश्वास दिलाया कि उनका पहला यत्न यही होगा कि भारत देश के दो टुकड़े होने से बच जाएं। परन्तु  यदि ऐसा नहीं होता तो एक दूसरे के सिर फोड़ने से अच्छा होगा कि अलग हो जाएं और ज़िंदगी को अपने ढंग से जीएं।
दूसरी मुलाकात। वायसराय बनाम गांधी जी। ़फकीर और वायसराय की जोड़ी अजब लग रही थी। एक था पक्का समुद्री सैन्य अधिकारी जो अपनी शानदार पोशाक को छोटा सा भी द़ाग मंज़ूर नहीं कर सकता था। दूसरा था एक बुजुर्ग हिन्दुस्तानी जो खादी की धोती और शाल के अलावा तीसरी किसी भी पोशाक को फालतू समझता था। एक वह जो मन से हिंसा का पुजारी था, दूसरा वह जो धर्म और अहिंसा का भक्त था। एक वह जिसको अपने रौब के प्रदर्शन का खास शौक था, दूसरा वह जिसने खुद अपनी इच्छा से बहुत गरीबी मंज़ूर की थी।
बटवारे को रोकने के लिए गांधी जी इस हद तक बेचैन थे कि उन्होंने यही सोच रखा था जो कभी राजा सोलोमन ने सोचा था। बच्चे को काट कर आधा आधा न बांटो। पूरा बच्चा ही मुसलमानों को दे दो। जिन्नाह अपनी मुस्लिम लीग के साथ सामने आएं, सरकार बनाएं और देश के 30 करोड़ हिंदुओं पर शासन करें। भारत का सिर्फ एक टुकड़ा जिन्नाह को क्यों दिया जाए, क्यों न पूरा भारत ही दे दिया जाए!
परन्तु यह प्रस्ताव माउंटबेटन को बेहद हवाई लगा था। दूसरी तरफ किसी भी प्रस्ताव को वह ताबड़तोड़ खारिज़ भी नहीं कर सकते थे, जिस में से भारत को संयुक्त रखने की कोई तरकीब निकलने की सम्भावना हो। वह बोले, यदि आप इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की औपचारिक मंज़ूरी लाकर दे सकते हो तो मैं भी विचार करने के लिए राज़ी हूं। (क्रमश:)

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