एक लेखक का पुनर्जन्म
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
उनकी यह बात वीरेन्द्र के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसने अब तक लेखन को एक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति या छोटी-मोटी प्रशंसा का माध्यम माना था, लेकिन उस बुजुर्ग ने उसे एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी का अहसास करा दिया था लेकिन इसी जिम्मेदारी के साथ एक नया डर भी जाग उठा। किताब छपना एक सुखद कल्पना तो थी, पर क्या वह इस भारी बोझ को उठाने के लिए तैयार था? क्या उसकी कहानियां इतनी सामर्थ्यवान थीं कि वे आने वाली पीढ़ियों के सामने उसके समय का प्रतिनिधित्व कर सकें?
घर लौटकर उसने अपने पुराने लेखन को समेटना शुरू किया। कम्प्यूटर की वर्ड फाइलों में बिखरी कहानियां, पुरानी नोटबुक्स के पीले पड़ चुके पन्ने के पीछे लिखे हुए आधे-अधूरे विचार-सब धीरे-धीरे एक पांडुलिपि की शक्ल लेने लगे।
हर कहानी उसे अपने एक बच्चे की तरह लगती थी, जिसे वह अब दुनिया के क्रूर और आलोचनात्मक बाज़ारों में छोड़ने जा रहा था। किसी कहानी में उसके गांव की कच्ची सड़कों की धूल उड़ने लगती, तो किसी में शहर की तन्हाई का दम घोंटू अहसास था। कहीं खेतों में लहलहाती फसल की महक थी, तो कहीं बस अड्डों पर खड़ी बसों के पीछे छूटती उदासी। जब उसने आखिरकार वह पांडुलिपि एक प्रतिष्ठित प्रकाशक को भेजी, तो उसका मन दो विपरीत दिशाओं में खिंचने लगा। एक तरफ एक उजली उम्मीद थी कि अब उसके शब्द एक जिल्द के भीतर सुरक्षित हो जाएंगे, उन्हें एक घर मिल जाएगा। दूसरी तरफ एक डरावना संदेह था कि कहीं यह किताब बाजारवाद की भेंट न चढ़ जाए, कहीं यह किसी अंधेरे गोदाम के कोने में धूल फांकती न रह जाए।
प्रकाशक के साथ होने वाली ईमेल वार्ता, फोन कॉल उसे किसी अग्नि-परीक्षा की तरह लगते। कुछ महीनों बाद जब पहली बार ‘प्रूफ’ की कॉपी उसके पास आई, तो वीरेन्द्र को एक विचित्र अनुभव हुआ। उसे अपनी ही लिखी रचनाओं में हजारों कमियां नज़र आने लगीं। कहीं शब्द गलत लगा, तो कहीं अंत कमजोर लगा। किसी कहानी का शीर्षक उसे अचानक बेतुका लगने लगा। उसे लगा कि एक शब्द गलत इस्तेमाल हुआ है, जो पूरी संवेदना को ही बदल रहा है। वह घंटों बैठकर हर पंक्ति को सुधारता। वह शब्दों की काट-छांट ऐसे करता जैसे कोई मां अपने बच्चे के फटे हुए कपड़ों को बड़े जतन से रफू कर रही हो। उसे डर था कि उसकी एक छोटी सी लापरवाही उन लोगों के साथ अन्याय होगी जिनके जीवन पर उसने यह कहानियां लिखी हैं।
फिर वह दिन आया जब किताब अंतिम रूप से प्रेस में चली गई। और यहीं से शुरू हुआ इंतजार का वह लंबा दौर। उन दिनों वीरेन्द्र की आंखों से नींद जैसे कोसों दूर चली गई थी। वह अक्सर रात के दो-तीन बजे उठकर खिड़की के पास बैठ जाता और बाहर पसरी सुनसान सड़क को देखता। उसे महसूस होता जैसे उसके पात्र वे बूढ़े किसान, वे झुलसी पीठ वाली औरतें, वे उदास बच्चे उस अंधेरी सड़क पर भटक रहे हैं और अपनी मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। उसे डर लगता कि कहीं यह किताब उन्हें कागज के पन्नों के बीच कैद न कर दे। क्या उन्हें सचमुच वह जीवन दे पाएगा जिसका वादा उसने अपनी कलम से किया था? या वह भी एक और सफल लेकिन खोखला लेखक बनकर रह जाएगा?
एक सुबह, जब ओस की बूंदें अभी पत्तों पर सोई ही थीं, उसके दरवाजे पर एक जोरदार दस्तक हुई। वीरेन्द्र ने दरवाजा खोला तो देखा कि डाकिया एक आयताकार पैकेट लिए खड़ा था। पैकेट पर प्रकाशक का नाम देखते ही वीरेन्द्र के हाथ कांपने लगे। उसने बहुत ही सावधानी से पैकेट को खोला, जैसे उसके भीतर कोई बहुत नाजुक चीज रखी हो। पैकेट खुलते ही ताजे कागज, स्याही और गोंद की वह विशिष्ट महक कमरे में तैर गई जो केवल नई किताबों से आती है। पहली बार उसकी किताब उसके हाथों में थी।
मुखपृष्ठ पर अपना नाम लेखक के रूप में देखकर वीरेन्द्र की आंखों के सामने अमर उजाला की वह पहली कविता कौंध गई। उसने कांपते हाथों से किताब के पन्नो को पलटने लगा। उसने पहली कहानी पढ़ी, फिर दूसरी। उसे लगा जैसे उसके शब्द अब उसके नहीं रहे, वे अपनी स्वतंत्र सत्ता पा चुके हैं। उसकी आंखों के कोरों में नमी उतर आई। वह फूट-फूटकर रोया नहीं, लेकिन उसके भीतर जो एक बेचौनी थी, जो एक द्वंद्व था, वह अचानक शांत हो गया। उसे लगा कि उसने एक बहुत लंबी और थका देने वाली दौड़ का पहला पड़ाव पार कर लिया है। अब वह केवल एक लेखक नहीं था, वह एक आवाज था।
उस शाम जब पूरे घर में एक गरिमामय सन्नाटा पसरा था, वीरेन्द्र ने उस किताब को अपनी मेज के ठीक बीचों-बीच रखा और घंटों उसे देखता रहा। चांद की दूधिया रोशनी खिड़की से भीतर आकर किताब के कवर पर लिखे उसके नाम को चमका रही थी। तभी उसे एक बिल्कुल नए और मौलिक सत्य का अहसास हुआ। उसने महसूस किया कि किताब का छपना मंजिल नहीं है। यह तो केवल उस यात्रा का एक नया मोड़ है। लेखक होने का असली अर्थ केवल पन्नों पर नाम छपवाना नहीं है, बल्कि उस निरंतर जिम्मेदारी को ढोना है जो उन लोगों के प्रति है जो खुद नहीं बोल सकते। उसने अपनी वह पुरानी, फटी हुई नोटबुक दोबारा खोली और एक नया पन्ना पलटा। उसने फिर से लिखना शुरू किया लेकिन इस बार उसके शब्दों में कोई दिखावा नहीं था, कोई कृत्रिम सौंदर्य नहीं था। इस बार वह उन लोगों के बारे में लिख रहा था जिनकी कहानियां उसने किताब में कह दी थीं, लेकिन जिनका जीवन अभी भी उसी संघर्ष में फंसा था। उसे समझ में आ गया था कि लेखक का असली पुरस्कार उसकी किताब की ‘रॉयल्टी’ या ‘प्रशंसा’ नहीं है, बल्कि वह ईमानदारी है जिससे वह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की आंखों में झांक सके।
उस रात वीरेन्द्र का वह छोटा सा कमरा एक पाठशाला बन गया था। एक ऐसी जगह जहां वह अपनी पिछली गलतियों से सीख रहा था और एक नई, अधिक मानवीय दुनिया की नींव रख रहा था। उसने जान लिया था कि शब्द कभी मरते नहीं हैं। वे केवल समय की चादर ओढ़कर सो जाते हैं और जब कोई सच्चा रचनाकार उन्हें अपनी संवेदना की गर्मी देता है, तो वे फिर से जी उठते हैं। लेखक की मृत्यु तब नहीं होती जब उसकी सांसें रुकती हैं, बल्कि तब होती है जब वह सच लिखना छोड़ देता है। वीरेन्द्र ने अपनी कलम उठाई और उस अनंत यात्रा की ओर चल पड़ा जहां शब्द केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्यता का बचा हुआ हिस्सा थे। उसे अहसास हुआ कि इसी बदलते रूप और निरंतर संघर्ष में एक लेखक का बार-बार पुनर्जन्म होता है। (समाप्त) (सुमन सागर)

