ईरान को तोड़ने के प्रयास में अमरीका स्वयं आर्थिक रूप से टूटा

ईरान-अमरीका पिछले 6 महीनों से जंग लड़ रहे हैं। इस दौरान दोनों ने एक-दूसरे का तो जमकर नुकसान किया ही है लेकिन इसके साथ ही दुनिया भर की तेल सप्लाई को भी नुकसान पहुंचा है। ये जंग कई बार खत्म होते-होते दोबारा शुरू हो गई है। इन सबके बीच अचानक से ईरान की तरफ से वॉर का दी एंड करने का पहला सिग्नल आया है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने खुद ऐलान किया है कि ‘जंग खत्म करने का सही वक्त आ गया है’। पेजेशकियान का ये बयान वॉर में चीन की एंट्री के बाद आया है, जिसमें दोनों देशों को बातचीत से हल निकालने की हिदायत दी गई थी।
  रिपोर्ट्स के अनुसार पेजेशकियान का दावा है कि इस समय ईरान, वाशिंगटन के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत, हावी और सम्मानजनक स्थिति में खड़ा है, इसलिए इसी मोड़ पर युद्ध विराम करना सबसे अक्लमंदी का कदम होगा। अमरीका और इज़रायल ने फरवरी में जो ईरान के खिलाफ जंग शुरू की थी उसके बाद अब तीनों देश एक ऐसी स्थिति में आ पहुंचे हैं, जहां से आगे सिर्फ तबाही ही दिख रही है। एक तरफ तेहरान ने दुनिया की सबसे अहम तेल सप्लाई लाइन ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ ब्लॉक कर रखा है तो दूसरी तरफ अमरीकी नौसेना ईरान की नाकाबंदी करने में जुटी है। हालांकि, अब चीन की सीधी एंट्री ने इस पूरे खेल का रुख ही बदलकर रख दिया है। ईरान में एक इवेंट के दौरान राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने इशारा किया है कि अब ईरान जंग खत्म करने के बारे में सोच रहा है। उनके अनुसार ‘ये बेहतर होगा कि हम इस जंग को इसी मोड़ पर रोक दें, क्योंकि आज हम पूरी तरह ताकत और सम्मान की स्थिति में हैं। पूरी दुनिया हमारी जीत का लोहा मान रही है। सब देख रहे हैं कि कैसे अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए हमारे स्कूलों, अस्पतालों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया। इसी वजह से आज पूरी दुनिया में अमरीका के खिलाफ भारी गुस्सा और नफरत पैदा हो चुकी है’।
पेजेशकियान ने इसके साथ ही जून में अमरीका के साथ हुए उस विवादित एमओयू को भी खुलकर डिफेंड किया, जिसको लेकर ईरान के कट्टरपंथी सांसद अपनी ही सरकार पर भड़के हुए थे। कट्टरपंथियों का आरोप था कि सरकार ने अमरीका के आगे घुटने टेक दिए हैं और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने के लिए अमरीका को बड़ी रियायतें दे डाली हैं। इस पर पलटवार करते हुए राष्ट्रपति ने साफ कहा कि इस समझौते में ऐसा एक भी शब्द या क्लॉज नहीं है जो ईरान के सरेंडर का संकेत देता हो। इसमें जितनी भी शर्तें और पाबंदियां हैं, वो सब दूसरे पक्ष यानी अमरीका पर लागू होती हैं। बताया जाता है कुछ ही सप्ताह पहले ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने भी कुछ मतभेदों के बावजूद इस डील को अपनी मंजूरी दे दी थी।
एक तरफ जहां तेहरान खुद को बढ़त में बता रहा है, वहीं अमरीकी मीडिया रिपोर्ट्स में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमरीकी नौसेना होर्मुज जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से से तेल टैंकरों के सीक्रेट काफिलों को अपनी सिक्योरिटी देकर में गुपचुप तरीके से निकाल रही है। इसके जरिए रोज़ाना करीब 5 से 10 मिलियन बैरल कच्चा तेल निकाला जा रहा है ताकि वैश्विक बाज़ार में तेल संकट न गहराए। जानकारों के अनुसार जब अमरीका को समझ आ गया कि सीधे मिलिट्री एक्शन से ईरान को झुकाना नामुमकिन है, तो ट्रम्प ने रणनीति बदलते हुए आर्थिक मोर्चे पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। अमरीका के इस रुख पर भड़कते हुए ईरानी विदेश मंत्रालय ने इसे सीधे तौर पर ‘आर्थिक आतंकवाद’ और ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ करार दिया है। तेहरान का कहना है कि ऐसे गैर-कानूनी प्रतिबंध थोपने वाले अमरीकी अधिकारी अंतर्राष्ट्रीय अदालतों में सजा के हकदार हैं। अमरीकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में दावा किया था कि युद्ध के छह महीने पूरे होने पर वाशिंगटन अब एक ऐसा आर्थिक अभियान शुरू करने जा रहा है, जो ईरानी हुकूमत को अंदर से तबाह कर देगा। अमरीकी वित्त मंत्री ने इस मास्टर प्लान को ‘इकोनॉमिक डी-डे’ का नाम दिया है।
इस संबंध में एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रम्प ने ये कदम मज़बूरी में उठाया गया फैसला है। अमरीका के भीतर ही इस युद्ध का भारी विरोध हो रहा है और अमरीकी जनता अब अपने सैनिकों को दूसरे देश की आग में नहीं झोंकना चाहती। इसी वजह से ट्रम्प प्रशासन अपनी सेना को मैदान से पीछे खींचकर आर्थिक प्रतिबंधों की आड़ ले रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया पर ट्रम्प प्रशासन के इस प्लान का जमकर मजाक उड़ाया। उन्होंने लिखा कि तथाकथित ‘इकोनॉमिक डी-डे’ कुछ और नहीं, बल्कि अमरीका के अपने घरेलू आर्थिक संकट, बढ़ते कर्ज और आसमान छूती ब्याज दरों से दुनिया का ध्यान भटकाने का एक घटिया पैंतरा मात्र है। जानकारी के अनुसार इस पूरे ड्रामे के बीच सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब चीन ने मैदान में एंट्री मारी। अमरीका लगातार बीजिंग पर दबाव बना रहा था कि वो ईरान को अलग-थलग करने और उसकी अर्थव्यवस्था को तोड़ने में वाशिंगटन का साथ दे। चीन ने अमरीका के इस प्रस्ताव को सीधे मुंह खारिज करते हुए वाशिंगटन को करारा झटका दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने अमरीकी दबाव की नीति को लताड़ते हुए साफ शब्दों में कहा कि केवल एकतरफा प्रतिबंधों और दादागिरी से पश्चिम एशिया का मुद्दा कभी हल नहीं हो सकता।
चीन का ये स्टैंड अमरीका के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। 24 सितम्बर को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग व्हाइट हाउस का दौरा करने वाले हैं, जहां ट्रम्प के साथ उनकी सीधी मुलाकात होनी है। बताया जाता है इस बैठक में ईरान का मुद्दा सबसे ऊपर रहने वाला है। चीन का तेहरान के साथ मजबूती से खड़े होना इस बात का सबूत है कि अब अमरीका अकेले अपनी मर्जी पूरी दुनिया पर नहीं थोप सकता। फिर चीन भी अपने लाभ के अनुसार ही कदम उठाता है। ऐसे में वह कभी नहीं चाहेगा कि अमरीका उससे एक कदम भी आगे खड़ा हो। चीन का हमेशा यही प्रयास रहता है कि जमीन मिले ना मिले लेकिन बाजार में उसका ही दबदबा हो। यही कारण है कि उसने अमरीकी प्रस्ताव को ठुकरा दिया है।

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