जो समय के साथ नहीं चलता, वह पिछड़ जाता है
राहुल गांधी ने बवाल मचा रखा है। वो कुछ भी कहते हैं खबर बन जाती है। दक्षिणपंथी उन पर टिड्डी दल की तरह टूट पड़ते हैं। वो कौन सी बात कर रहे हैं जिससे एक तबके को मिर्ची लग रही है? वो कौन सी नस है जो उनकी वजह से दब रही है और एक तबका बिलबिला रहा है? क्यों सोशल मीडिया और खबरों में उन पर इतने हमले होते है? क्या वो कोई ऐसी बात कर रहे हैं जो समाज को तकलीफ द रही है या फिर उनकी बातें इतनी बेवकूफाना हैं कि लोग बेचैन हो उठते हैं? या फिर वो उन लोगों को अखर रहे हैं जिनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है? क्या राहुल इस देश में उस विमर्श को जन्म दे रहे हैं जो समाज के प्रभुत्ववादी तबके को नागवार गुज़रती है?
सवाल राहुल का नहीं है। सवाल ये है कि एआई के ज़माने में पुराने सड़े गले मूल्यों का परित्याग करके आगे बढ़ना है या फिर कुएं के मेंढक बन कर वहीं उछल कूद करनी है? समाज बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। तकनीक ने पूरे विश्वमंडल को सिर से पैर तक बदल दिया है। समाज का एक तबका अभी भी पुरानी दुनिया में सैर कर रहा है। वो ये तो चाहता है कि उसके हाथ में एआई जनित फोन हो, वो सोशल मीडिया पर विश्व से जुड़ा रहे लेकिन उसके सोचने के तरीके न बदलें, ये असंभव है। तकनीकी बदलेंगी तो मूल्य बदलेंगे, मूल्य बदलेंगे तो संस्कृति बदलेंगी, संस्कृति बदलेगी तो सभ्यता में भी बदलाव होगा। हम जिस युग में जी रहे हैं, ये युग सभ्यता बदलाव का युग है। इस युग में जब कुछ बुनियादी बदलाव हो रहे हैं तो पुराने मूल्य टस से मस नहीं होना चाहते। वो अपनी प्रभुता को नहीं छोड़ना चाहते। वो जड़ हो गये हैं। ‘नव चेतना की नव ऊर्जा’ को रोकना चाहते हैं। बदलाव की बयार को किसी युग में नहीं रोका जा सका और न रोका जा सकेगा। भाजपा की राजनीति इस जड़ समाज को न बदलने की राजनीति है। इसीलिये टकराव अवश्यम्भावी है। ये टकराव एक नये समाज का गठन करेगा, नई राजनीति का स्वरूप गढ़ेगा।
राहुल गांधी कोई क्रांतिकारी बात नहीं कर रहे हैं। वो वही कह रहे हैं या कर रहे हैं जो बाबा साहेब आंबेडकर कह गये हैं या जिसकी ओर महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू इशारा कर गये हैं लेकिन बदले संदर्भ की वजह से वो हमें और आपको क्रांतिकारी लग रहे हैं। पुणे में राहुल गांधी ने मनुस्मृति का ज़िक्र कर के महिलाओं की स्वतंत्रता की बात की। उन्होंने बताया कि स्त्री जब बच्ची होती है तो पिता उसका संरक्षक होता है, बड़ी होती है तो पति और बूढ़ी होने पर बेटा। यही बात पुरुषों के बारे में क्यों नहीं कही जाती कि पुरुष बच्चा है तो मां उसकी रक्षा करती है, बड़ा होने पर पत्नी और बूढ़ा होने पर बेटी लेकिन ये बात नहीं कही जाती क्योंकि समाज की संरचना इस तरह से की गई है कि स्त्री गुलाम है, कमज़ोर है इसलिये उसको पुरुषों की सुरक्षा की ज़रूरत है। ये हर सभ्यता का कथ्य है। और इस कथ्य के ज़रिये समाज के आधे हिस्से पर पुरुषों ने अपना आधिपत्य जमा लिया है। ये दरअसल प्रभुत्ववादी तबके की एक सुनियोजित साजिश है। अपने वर्चस्व को बनाये रखने का एक षड्यंत्र। हर समाज और सभ्यता में ये गुण पाये जाते हैं।
भारत में दलितों और पिछड़ों पर अपना आधिपत्य बनाने के लिये जाति प्रथा का आविष्कार किया गया और ये कहा गया कि समाज के उच्च वर्ग सर्वगुण सम्पन्न हैं और उनकी सेवा करना ही निचले तबके का धर्म है। क्या ये तर्क बिल्कुल वैसा ही नहीं है जैसा कि पश्चिम की साम्राज्यवादी ताकतों ने एशिया और अफ्रीका पर कब्ज़ा जमाने के लिये कहा कि वो भारत जैसे देशों को सिविलाइज करने के लिये आये हैं। वो यहां हम पर शासन करने नहीं बल्कि हमें सभ्य बनाने आये हैं। और हमें उनके प्रति अनुग्रहित होना चाहिये। इस तर्क को तीसरी दुनिया के गुलाम देशों ने उठा कर फेंक दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिस ढंग से औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ विद्रोह हुआ उसने दुनिया को एक नई शक्ल दी। दर्जनों देश आज़ाद हुये। गांधी जी इस बगावत के प्रेरणा पुरुष बने। उनको अपना आदर्श मान कर नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में नस्लवादी सत्ता को उखाड़ फेंका, मार्टिन लूथर किंग ने अश्वेत समाज को बराबरी का दर्जा दिलाया और अमरीका सही मायनों में लोकतांत्रिक हुआ। इसका मतलब ये नहीं है कि अमरीका में नस्लवाद नहीं है या फिर महिला विरोधी मूल्य पूरी तरह से खत्म हो गये हैं लेकिन अमरीका या पश्चिमी सभ्यता में आज कोई अश्वेतों के खिलाफ खुल कर नहीं बोल सकता या महिलाओं का महिला के नाम पर विरोध करके नहीं रह सकता।
दुर्भाग्य से भारत में अभी भी चेतना का वो विस्तार नहीं हुआ है जो होना चाहिये। बाबा साहेब आंबेडकर की पूरी लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह थी जो जन्म के आधार पर इन्सानों को गुलाम बनाती है, इन्सान को बराबरी का दर्जा नहीं देती। बाबा साहेब को ‘महाद आंदोलन’ इसलिये करना पड़ा कि दलितों को तालाब से पानी पीने की इजाज़त नहीं थी। बाबा साहेब ने ‘कालाराम मंदिर आंदोलन’ किया ताकि दलितों को मंदिर प्रवेश से वर्जित न किया जाये। इसी तरह पेरियार ने ‘वायकोम आंदोलन’ केरल में किया था कि दलितों पिछड़ों को उस सड़क पर चलने की अनुमति मिले जो सड़क मंदिर की तरफ जाती थी। संविधान बना तो पहली बार भारतीय समाज में सबको बराबरी का दर्जा मिला। ये बात उन लोगों को पसंद नहीं आयी जो हजारों साल से सत्ता के शीर्ष पर कुंडली जमाये बैठे थे, जो धर्म पर अपना आधिपत्य समझते थे। इन शक्तियों ने हिंदू कोड बिल का विरोध किया और नेहरू और आंबेडकर के पुतले जलाये। बाबा साहेब को गालियां दी गईं। आरक्षण का विरोध किया गया। आरक्षण का विरोध आज भी किया जाता है, इस वर्ग के द्वारा। आज भी देश में छुआछूत ज़िंदा है। आज भी ऊंच नीच ज़िंदा है। इसलिये आरक्षण ज़रूरी है।
यही हाल महिलाओं का भी है। आज़ादी के इतने साल बाद भी देश में महिलाओं को आज़ादी नहीं मिली है। महानगरों तक में दहेज के नाम पर महिलाओं को जलाया जा रहा है। वो देर रात घर आती है तो उसके चरित्र पर शक किया जाता है। उस पर गंदी नज़र डाली जाती है। उसको बताया जाता है कि वो कैसे कपड़े पहन सकती है और कौन से कपड़े नहीं। उसे प्रेम करने की इजाज़त नहीं है। उसे मन पसंद व्यक्ति से शादी की अनुमति नहीं है। अगर वो अपनी पसंद से शादी कर लेती है तो उस मार दिया जाता है या पेड़ से लटका दिया जाता है। औरतों से कहा जाता है कि वो नौकरी करेंगी तो घर कैसे चलेगा, घर टूटेगा। और अगर नौकरी कर भी रही हैं तो दफ्तर से आकर पति के लिये खाना बनायें, चाय बनायें। ये भी कहा जाता है कि वो तीन चार बच्चे पैदा करें ताकि समाज बचा रहे जैसे वो बच्चे पैदा करने की कोई मशीन हों। जब कोई इसके खिलाफ बोलता है तो उसे धर्म विरोधी कह कर प्रताड़ित किया जाता है। पिछले दिनों इस सोच को धर्म के नाम पर राजनीति ने और पुष्ट करने का काम किया है। इस राजनीति का इतना असर है कि कुछ महिलाएं भी इस सोच को सही ठहराती हैं और बड़े बड़े पत्रकार और बुद्धिजीवी भी धर्म की रक्षा के लिये सोच को उचित मानते हैं।
धर्म आधारित राजनीति ने देश का काफी नुकसान कर दिया है। लेकिन एक चीज अच्छी हुई है कि कई ऐसे चेहरे भी बेनकाब हुए हैं जो अभी तक महिला हितैषी, दलित हितैषी का चोला ओढ़े हुये थे। राहुल गांधी इस दकियानूसी सोच पर जब चोट करते हैं, दलित मुक्ति की बात करते हैं, मनुस्मृति का हवाला देते हैं, जाति जनगणना की मांग करते हैं, आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से बाहर निकालने का सवाल खड़ा करते हैं तो ज़ाहिर सी बात है प्रभुत्ववादी और वर्चस्ववादी तबके को ये बात पसंद नहीं आयेगी और वो उन्हें पप्पू बताने की कोशिश करेंगे। लेकिन वक्त बड़ी रफ्तार से भाग रहा है, ज़मीन पैरों के नीचे से निकल रही है, जो बदलती तकनीकी के हिसाब से अपने में बदलाव नहीं करेगा, उसका अस्तित्व मिट जायेगा। ये बात नोट कर लेनी चाहिये।



