एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ने बढ़ाया है चीनी का संकट
भारतीय बाज़ार में गन्ने से एथेनॉल के निर्माण ने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इस गंभीर समस्या ने जहां चीनी को उम्मीद से ज्यादा महंगा कर दिया है, वहीं चीनी आयात करने की स्थिति भी पैदा हो गई है। केन्द्र सरकार ने 10 साल में पहली बार चीनी आयात करने का फैसला लिया है। चीनी अब डॉलर देकर विदेश से मंगवाई जाएगी जबकि 2022 तक ईयू और यूएस को तय कोटा निर्यात के बाद यह प्रतिबंध लगाना पड़ता था कि अब और चीनी निर्यात नहीं की जाए। ताकि घरेलू मांग की पूर्ति आसान बनी रहे और चीनी महंगी भी न हो। अब यह स्थिति निर्मित हो गई है कि घर-घर में इस्तेमाल की जाने वाली चीनी का भंडार पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत कम हो गया है। इस कमी का प्रमुख कारण गन्ने का उपयोग एथेनॉल बनाने में किया जाना माना जा रहा है। भारत में अनाज से शराब पूर्व से ही बनाई जा रही है। खाद्य उपज से पेट्रोल और शराब का बड़ी मात्रा में निर्माण नीति नियंताओं की अदूरदर्शिता प्रकट करती है।
बीते दो माह के भीतर ही चीनी की कीमतें उछलकर 40 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। आगे रक्षाबंधन, गणेश महोत्सव और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे बड़े त्यौहार हैं, जिनमें मिठाई और प्रसाद वितरण के लिए शक्कर की बड़ी मांग बनी रहती है। इसके तत्काल बाद नवदुर्गा, विजयादश्मी और दीपावली जैसे बड़े पर्व हैं, जिनमें चीनी की सर्वाधिक खपत होती है। अतएव: समय पर चीनी आयात नहीं हो पाती है तो चीनी के दाम आसमान छूने लग जाएंगे। हालांकि सरकार यह जता रही है कि पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने से चीनी महंगी नहीं हुई है, बल्कि खराब मौसम के चलते गन्ने की फसल की कम पैदावार के कारण देश में चीनी का उत्पादन कम हुआ है। सरकार एक अन्य कारण अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी के दामों में वृद्धि बता रही है। बावजूद सरकार ई-20 एथेनॉल पेट्रोल के उत्पादन पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि सरकार ने ई-10 यानी 10 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल बनाने के सुझावों को सिरे से खारिज कर दिया है।
दरअसल देश में एथेनॉल उत्पादन की क्षमता तेजी से बढ़कर 2000 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष से ज्यादा हो गई है। एथेनॉल का यह उत्पादन महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में लगे संयंत्रों में किया जा रहा है जबकि पेट्रोल वाहनों में एथेनॉल मिला पेट्रोल उपयोग करने से वाहन खराब हो रहे हैं। इस कारण मौजूदा मांग उत्पादन से कम बनी हुई है। इसके बावजूद उद्योगपति एथेनॉल निर्माण के नए संयंत्रों के निर्माण में लगे हैं। इस सेक्टर को बैंकों ने एक लाख करोड़ रुपए का कर्ज दिया हुआ है। अब सरकार की दुविधा यह है कि यदि पेट्रोल में ब्लेडिंग घटाई गई तो हजारों करोड़ के बैंक ऋण और देसी-विदेशी निवेश डूबने का संकट बढ़ जाएगा। ब्लेडिंग उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसके तहत एक तय मात्रा में बायो फ्यूल, यानी ई-20 या ई-10 प्रतिशत पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जाता है। हालांकि यह जीवाश्म ईंधन जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने के लिए पर्यावरण के अनुकूल है। इस जैव ईंधन को नवीकरणीय ऊर्जा माना जाता है। इस कारण दुनिया के देश जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाने में लगे हैं।
केयर एज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष के अंत तक एथेनॉल उत्पादन क्षमता 400 करोड़ लीटर और बढ़ जाएगी। अर्थात कुल उत्पादन क्षमता करीब 2400 करोड़ लीटर तक पहुंच जाने की उम्मीद है जबकि 2014 में एथेनॉल का उत्पादन 421 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष होता था जो अब चार गुना अधिक हो गया है। चालू वित्त वर्ष के दौरान पेट्रोल ब्लेडिंग के लिए ई-20 पेट्रोल के लिए 1200 करोड़ लीटर एथनाल की ज़रूरत पड़ेगी। यही नहीं उद्योगों, फार्मा कंपनियों और रसायन क्षेत्रों में भी अधिकतम 350 लीटर एथनाल की मांग बनी हुई है। 2025 से देशभर में ई-20 पेट्रोल की बिक्री हो रही है। पश्चिम एशिया में चल रहे अमरीका-ईरान, रूस-यूक्रेन और इज़रायल के युद्धों के चलते केन्द्र सरकार ने मजबूरी में अप्रैल-2026 से एथनाल मिश्रित पेट्रोल बाज़ार में देने की शुरुआत की है। इधर एथेनॉल के नए संयंत्र लगाए जाने के कारण उद्योग जगत की मांग है कि ई-30 या उससे अधिक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री देशभर में शुरू की जाए। फिलहाल देश में गन्ना, मक्का और अन्य अनाजों से बने एथेनॉल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए क्योंकि यदि खाद्य सामग्री से बना एथेनॉल निर्यात होने लग जाएगा तो देश में खाने वाले अनाज की आपूर्ति में तो कमी आएगी ही, उम्मीद से ज्यादा अनाज महंगा भी हो जाएगा। हालांकि वर्तमान में कृषि अवशेष और बायोमास से निर्मित एथेनॉल के निर्यात की अनुमति सितंबर 2025 से दे दी गई है किन्तु उद्योग जगत अपना फायदा देखते हुए मांग कर रहा है कि सरकार नेपाल और इंडोनेशिया देशों में निर्यात की संभावनाएं तलाशे।
अनाज, फल और सब्जी आदमी के ज़िंदा रहने की बुनियादी शर्त हैं लेकिन आधुनिक जीवन शैली के लिए ज़रूरी बना दिए गए औद्योगिक उत्पादन और भोग-विलास के उपकरणों को ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए वैकल्पिक स्रोतों में फसलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल दुनिया में हो रहा है। खाद्य संकट के कारणों में यह एक प्रमुख कारण है। यदि जैविक ईंधन के लिए अनाज के प्रयोग को खुली छूट दे दी जाती है तो भारत में भूख का संकट गहराना तय है। वैसे भी वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। यह स्थिति भूख की गंभीरता को दर्शाती है। ऐसे में वाहनों के उत्पादन को बढ़ाना और बैंकों के कर्ज के जरिए उनकी बिक्री आसान करना भूख की स्थिति को और गंभीर बनाएगा। इस सिलसिले में ब्रिटेन की स्वयंसेवी संस्था ऑक्सफेम ने दुनिया में बढ़ रहे खाद्यान्न संकट के सिलसिले में चेतावनी दी है कि यदि अनाज से शराब और एथेनॉल बनाना बंद नहीं किया तो 2030 तक खाद्यान्न की मांग 70 प्रतिशत तक बढ़ सकती है और अनाज की कीमतें भी दुगनी हो सकती हैं। इसके बावजूद देश की गरीब व लाचार आबादी की चिंता की बजाये भारत सरकार वाहनों के लिए एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रही है, तो यह चिंता का विषय है।



