कूड़ा घर बनाम स्मार्ट शहर
आजकल हमें जगदम्बा प्रसाद दीक्षित का उपन्यास मुर्दा घर बहुत याद आ रहा है। विस्तारित नेत्रों से हमें न देखिये। जानते हैं आजकल किताब विताब तो कोई पढ़ता नहीं है। फिर दो दशक पहले छपी किताब जिसने हिन्दी जगत में हंगामा पैदा कर दिया था, उसे भला कोई क्या याद करेगा? आजकल तो पी.डी.एफ. छोड़िये, किंडल भी पढ़ने का कष्ट कोई नहीं करता। बस एक ही इसरार रहता है, ‘जनाब, संक्षेप में बात कीजिये, हम बड़े मसरूफ हैं।’
जी हां, थोड़ा बोलिये। आदर्श और नैतिकता पर प्रवचन करना है, तो और भी कम बोलिये। लोग एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से निकाल देते हैं। फिर अपनी मारामारी में लग जाते हैं। मारामारी क्या? जी यही संक्षिप्त रास्ते से अपनी मंज़िल तक पहुंचने की कोशिश। पहुंचने की कोशिश क्या, मंज़िल को अपने घर से ही शुरू कर लो। आजकल अध्यवसाय को कौन पूछता है, पेपर लीक का ज़माना है। एक बार पेपर रद्द हो गया, जन्तर-मंतर में नौजवानों ने इतना रोना-धोना इस बात पर कर लिया। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी दिलवा दिया, लेकिन इससे क्या? पेपर लीक के ठेकेदार अपना काम करते रहेंगे। केवल देश की राजधानी ही क्यों, हर राज्य से ऐसे समाचार आते रहते हैं। कहीं पेपर लीक हो रहा है, कहीं पेपर चीट हो रहा है और ज़िन्दगी यूं ही शार्टकट में उलझी हुई है। देश को डिजिटल करो, कृत्रिम मेधा का गुणगान करो, तो सबसे प्रसन्न डीप फेक वाले होते हैं। चुनाव नज़दीक हो तो विरोधी नेता के चरित्र हनन की ज़िम्मेदारी भी इसके ठेकेदारों को मिल जाती है। मौलिकता की तलाश में निकले हैं। अरे, कलाकारों के घरों में क्यों झांकते हो? देश डिजिटल हो गया है। ग्रामीण देश की इस ग्रामीण सभ्यता में तो उसके पद-चिन्ह नज़र नहीं आते, लेकिन फिर भी हम डिजिटल हो गये। कृत्रिम मेधा के नारे लगाते हो, लेकिन तरीका वही है लूट-खसूट का पुराना। बयान दो कि मैं भ्रष्टाचार को शून्य स्तर पर भी नहीं सहूंगा। हां, करोड़ों रुपये की बात हो तो थोड़ा बहुत सहा भी जा सकता है।
बन्दे और बन्दे में फर्क है भई! सब बराबर हैं, इसलिये सबको एक जैसा आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए, लेकिन अपने नाती-पौत्र की कुर्सियां सुरक्षित करने के बाद।
हम चाहते हैं, त्याग और बलिदान की बातें होती रहें, लेकिन उदाहरण हमारे घर के नहीं, दूसरे के घर के दिए जाएं। ज़रूरत है आज घर-घर में भगत सिंह पैदा करने की, जो सिंह गर्जना के साथ वंदे मातरम् कहते हुए फांसी का फन्दा चूम ले, लेकिन उसकी पैदाइश पड़ोसी के घर में होनी चाहिए, हमारे घर में नहीं क्योंकि कोई इसकी प्रशंसा कर-कर इस बलिदान की कहानी कहने और इसके बदले में इसका प्रतिदान प्राप्त करने वाला भी तो चाहिये।बहुत दिन से यही चल रहा है। अब तो इस वास्तविकता को स्वीकार करके कोई चिहुंकता भी नहीं। फिर आपने कैसे कह दिया कि आजकल यहां त्याग और बलिदान की बातें नहीं होतीं। होती हैं जनाब, घर-घर तिरंगा लहरा कर होती हैं, वंदे मातरम् के छ: छंद गाकर होती हैं। आवाज़ को मधुरता के साथ-साथ उत्साह की आब भी दीजिये, राष्ट्रीयता आपके ललाट पर चमकने लगेगी। लेकिन आप चमकता हुआ भाल नहीं देखते, पैरों के नीचे बढ़ता हुआ कूड़ा देखते हैं। कल अजब नज़ारा हमने देखा। चले थे भारत मां का उजला ललाट देखने, नीचे सड़कों का कूड़ा अपने ढेरों को और भी ऊंचा करके हमारा अभिषेक करने लगा। यह न तो पहले मुर्दाघर था और न कूड़ा घर बल्कि अच्छे खासे स्मार्ट शहर को कूड़ा घर में तबदील किया जा रहा था। ठेला गाड़ी चलाने वाले लोग अपने ठेलों में कूड़ा भर कर लाते और सिलसिलेवार इस लकदक सड़कों पर फैंक रहे थे। सड़कें सड़कें न रहें, बस कूड़े की कतार बन जाएं। आपको बात समझ नहीं आई। जनाब यह नई ज़िन्दगी में अपनी बात मनवाने का नया तरीका था। पहले बात मनवानी होती थी तो लोग टॉवर पर चढ़ जाते थे, कि या तो हमारी मांग स्वीकार करो, नहीं तो हम टॉवर पर से नहीं उतरेंगे। बात नहीं मानेंगे तो हमारी बला से। इसके बाद शुरू हो गया बन्द और धरना-प्रदर्शन, जिससे सड़कों से लेकर रेलगाड़ियां तक बन्द कर दी जातीं, कि हमारी बात मानो, नहीं तो किसी को काम नहीं करने देंगे। देश की ज़िन्दगी को खड़ा कर देंगे और अब यह नया तरीका निकाला है। बड़े समृद्ध बने फिरते हो। तुम्हारी कोठियों के बाहर से निकलती सड़कों पर इतना कूड़ा फैंक देंगे कि तुम्हारी ज़िन्दगी दूभर हो जाए। सांस भी न ले सको। हमने उनसे पूछने की हिम्मत की कि भाई जान, यह क्यों कर रहे हो? उत्तर मिला कि काम नहीं करेंगे और बढ़ता हुआ दाम लेंगे। हमें लगा ऐसा तो पूरा देश कर रहा था। काम नहीं कर रहा था, बटती हुई मुफ्त की रेवड़ियां मांग रहा था। यही तो नया युग है प्यारे!



