त्योहारों से पहले फीकी पड़ी चीनी की मिठास

त्योहारों की दस्तक के साथ ही रसोई की मिठास पर महंगाई का ग्रहण लग गया है। चीनी की कीमतों में आया उछाल केवल बाज़ार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि नीति, मौसम और वैश्विक हालात के जटिल गठजोड़ का परिणाम है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों की दस्तक के साथ ही देशभर के परिवारों की रसोई में इस्तेमाल होने वाली चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है। मिल स्तर पर दाम लगभग साढ़े पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल के आसपास पहुंच गए हैं, जबकि खुदरा बाज़ार में पिछले साल की तुलना में करीब 13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी वजहें हैं जिनके चलते इस बार त्योहारों से पहले ही चीनी आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगी है और क्यों सरकार को आयात तक का रास्ता तलाशना पड़ रहा है?
इस संकट की जड़ में सबसे बड़ा कारण गन्ने की फसल का एक बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जाना बताया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है, जिसके तहत गन्ने के रस, सिरप और मोलासेस से बड़े पैमाने पर एथेनॉल तैयार किया जा रहा है। इस मौजूदा सीजन में गन्ने से जितनी चीनी बननी थी, उसमें से एक बड़ा हिस्सा एथेनॉल संयंत्रों में चला गया, जिससे बाज़ार में उपलब्ध चीनी की मात्रा घट गई। विपक्षी दलों का आरोप है कि यही एथेनॉल नीति चीनी की मौजूदा किल्लत और महंगाई की असली वजह है, जबकि सरकार का कहना है कि संकट के पीछे केवल एथेनॉल डायवर्जन नहीं बल्कि कई और कारक भी जिम्मेदार हैं। इन अतिरिक्त कारकों में सबसे अहम है मौसम की मार। पिछले साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की देरी से वापसी के चलते महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में फसल को भारी नुकसान पहुंचा। अत्यधिक बारिश और उसके बाद जलभराव वाले खेतों में धूप और हवा की कमी के कारण गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई। नतीजा यह हुआ कि पहले जो अनुमान लगाए गए थे, उत्पादन उनसे काफी कम रहा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य में भी हालात कुछ बेहतर नहीं रहे और वहां भी उत्पादन पूर्व अनुमानों से पीछे छूट गया। इस तरह प्राकृतिक आपदा और नीतिगत फैसले दोनों मिलकर चीनी की उपलब्धता कम करने में भूमिका निभा रहे हैं।
आंकड़ों को देखें तो चालू सीजन के शुरुआती अनुमान में गन्ना उत्पादक राज्यों ने करीब 343 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्पादन का लक्ष्य रखा था लेकिन इसमें से करीब चौंतीस लाख टन गन्ना एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने का अनुमान लगाया गया, जिससे शुद्ध चीनी उत्पादन घटकर करीब तीन सौ नौ लाख टन रह गया। बाद में उद्योग जगत के ताजा आकलन में यह आंकड़ा और नीचे खिसकता नज़र आया, जिसमें एथेनॉल की ओर मुड़ने वाली मात्रा तीस लाख टन के आसपास आंकी गई और शुद्ध उत्पादन लगभग दो सौ उन्यासी लाख टन तक सिमट गया। जाहिर है, मांग और आपूर्ति के इस अंतर ने बाज़ार में दाम बढ़ने की जमीन तैयार कर दी। यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया में सबसे ज्यादा गन्ना उगाने वाला देश ब्राजील भी इसी तरह की चुनौती से जूझ रहा है। वहां भी सरकार और उद्योग गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ रहे हैं, जिससे चीनी उत्पादन में करीब तीन प्रतिशत तक की कमी आने की आशका जताई जा रही है। यह गिरावट लाखों टन में आंकी जा रही है। ब्राजील के मध्य और दक्षिणी हिस्सों में देर से हुई बरसात और तापमान में असामान्य बढ़ोतरी ने भी गन्ने की उपज पर बुरा असर डाला है। चूंकि ब्राजील वैश्विक चीनी बाजार में सबसे बड़ा खिलाड़ी माना जाता है, इसलिए वहां की सप्लाई घटने का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर भी पड़ रहा है।
इसी वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए भारत सरकार कच्ची चीनी के आयात पर विचार कर रही है, ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति बहाल की जा सके और त्योहारी मांग के दौरान कीमतों पर लगाम लगाई जा सके। साथ ही यह संभावना भी जताई जा रही है कि आगामी 2026-27 सीजन में सरकार चीनी मिलों को गन्ने के रस और बी.हैवी मोलासेस से सीधे एथेनॉल न बनाने का निर्देश दे सकती है, ताकि पहले घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित हो और उसके बाद ही एथेनॉल उत्पादन को प्राथमिकता दी जाए।  एक ओर देश पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर उसी गन्ने पर आधारित यह नीति घरेलू रसोई की ज़रूरतों से टकरा रही है। यही वजह है कि नीति निर्माताओं के सामने चुनौती केवल आंकड़ों की नहीं बल्कि प्राथमिकताओं के संतुलन की भी है कि किस हद तक गन्ने का इस्तेमाल ईंधन के लिए हो और किस हद तक भोजन के लिए। आने वाले महीनों में चीनी की कीमतें त्योहारी मांग, मानसून की स्थिति, वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव और सरकार की एथेनॉल नीति में संभावित बदलावों पर निर्भर करेंगी। आम उपभोक्ता के लिए राहत तभी संभव होगी जब घरेलू उत्पादन में सुधार आए, आयात समय पर हो और नीतिगत स्तर पर खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के बीच बेहतर तालमेल बैठाया जाए। तब तक के लिए मिठास की यह महंगाई आम रसोई के बजट को कड़वा अनुभव कराती रहेगी।

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