दुनिया के लिए चिंता का कारण बना अल-नीनो 

धरती का बदलता मिज़ाज अब केवल वैज्ञानिकों के शोध और मौसम विशेषज्ञों की रिपोर्ट तक सीमित विषय नहीं रह गया है। इसका असर आम आदमी के जीवन से लेकर कृषि, जल संसाधन, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कहीं आसमान से बरसती आग लोगों को बेहाल कर रही है, तो कहीं कुछ ही घंटों में होने वाली मूसलाधार बारिश शहरों को जलमग्न कर रही है। कहीं किसान बारिश का इंतजार करते-करते परेशान हैं, तो कहीं अत्यधिक वर्षा उनकी महीनों की मेहनत को बहा ले जा रही है। मौसम के इस बदलते और असामान्य स्वरूप के बीच अल नीनो एक बार फिर दुनिया के लिए चिंता का विषय बनकर सामने आता है।
अल-नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसका प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में तापमान, वर्षा और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। यह घटना प्राकृतिक जलवायु चक्र का हिस्सा है और हज़ारों वर्षों से पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में इसका अस्तित्व रहा है, लेकिन आज परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अल-नीनो और बढ़ते वैश्विक तापमान का मेल मौसम की चरम स्थितियों को और अधिक गंभीर बना सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अल-नीनो को लेकर इतनी चिंता क्यों है? इसका उत्तर इसके व्यापक प्रभावों में छिपा है। अल-नीनो के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक बढ़ सकता है जबकि कुछ क्षेत्रों में वर्षा के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है और आज भी खेती का एक बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर आधारित है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है या उसका वितरण असमान रहता है, तो इसका सीधा असर खरीफ  फसलों पर पड़ सकता है। धान, मक्का, दालें, तिलहन और अन्य फसलों की पैदावार प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। उत्पादन में कमी का असर केवल किसान तक सीमित नहीं रहता। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और महंगाई पर दबाव पैदा हो सकता है। पहले से ही महंगाई और रोज़गार जैसी चुनौतियों से जूझ रहे आम परिवारों के लिए खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी अतिरिक्त बोझ बन सकती है।
भारत के लिए यह खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश की भौगोलिक विविधता बहुत अधिक है। हिमालयी क्षेत्र में भारी बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएं नुकसान पहुंचा सकती हैं। मैदानी इलाकों में नदियों का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। वहीं महानगरों में कुछ घंटों की तेज बारिश ही यातायातए बिजलीए सीवर और जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में यह समझना होगा कि केवल बारिश की कुल मात्रा देखना पर्याप्त नहीं है, अपितु बारिश कब, कितनी तेजी से और किस क्षेत्र में होती है,  यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अल-नीनो का असर समुद्री और स्थलीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है। समुद्र का तापमान बढऩे से समुद्री जीव-जंतुओं और मछली उत्पादन पर असर पड़ सकता है। समुद्र दुनिया की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण नियामक है। इसलिए समुद्र के तापमान में होने वाला बदलाव लंबे समय तक वातावरण और मौसम को प्रभावित कर सकता है। यदि समुद्रों का तापमान लगातार बढ़ता रहा तो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव और बढ़ेगा।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बदलता मौसम बड़ी चुनौती बन रहा है। अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। कमज़ोर वर्ग, बुज़ुर्ग, बच्चे और खुले में काम करने वाले श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर बाढ़ के बाद जल-जनित बीमारियों और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो का प्रभाव केवल मौसम विभाग के आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी विषय है।
अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कृषि उत्पादन में कमी, बिजली की मांग में वृद्धि, जल संकट, बाढ़ से बुनियादी ढांचे को नुकसान और स्वास्थ्य संबंधी खर्च आदि इन सभी का आर्थिक बोझ  सरकार और जनता दोनों को उठाना पड़ता है।  (एजेंसी)

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