ईरान बनाम अफगानिस्तान : शरिया में महिलाओं की तुलनात्मक स्थिति

इस्लामी जीवन पद्धति और कानूनी व्यवस्था को ‘शरिया’ कहते हैं। शरिया में इबादत, खान-पान, पहनावा, व्यापार, विवाह, तलाक, विरासत, अपराध और सज़ा जैसे जीवन के तमाम पहलू शामिल हैं। इसके द्वारा कुरान , सुन्नत, हदीस, इज्मा व कयास जैसे पुराने स्थापित नियमों के आधार पर नए ज़माने की समस्याओं का हल निकालने का दावा किया जाता है। परन्तु मौजूदा आधुनिक दौर में सऊदी अरब, अफगानिस्तान व ईरान जैसे देशों में जहां शरिया को देश के मुख्य संविधान और आपराधिक कानून के रूप में लागू किया गया है, वहीं भारत, पाकिस्तान, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में शरिया केवल ‘पर्सनल लॉ’, विवाह, तलाक, संपत्ति तक ही सीमित है, जबकि इन्हीं देशों में आपराधिक मामलों के लिए देश का धर्मनिरपेक्ष कानून लागू होता है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार व संगठन शरिया के नाम पर अत्यंत रूढ़िवादी और कबीलाई व्याख्या लागू करते हैं जबकि पाकिस्तान में भी शरिया कानून पूरी तरह लागू नहीं है, बल्कि वहां एक ‘हाइब्रिड’ या मिश्रित कानूनी प्रणाली काम करती है जिसमें ब्रिटिश काल के धर्मनिरपेक्ष सामान्य कानून और इस्लामी शरिया कानून दोनों का मिश्रण है। सवाल यह है कि जब इस्लाम धर्म का कलमा एक, कुरआन एक, रसूल एक, नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात सब एक है, तो इस्लामी देशों में ही शरिया कानून की व्याख्या अलग-अलग क्यों? और यदि अलग है तो इसमें सही कौन और गलत कौन और दुनिया किस शरिया व्यवस्था को सही व इस्लामी शरिया के रूप में देखे? इसी सन्दर्भ में केवल ईरान व अफगानिस्तान में लागू शरिया कानून व इसके अंतर्गत दोनों देशों में महिलाओं की स्थिति व उन पर पढ़ने वाले प्रभाव का जायज़ा लेने की कोशिश करते हैं। 
अफगानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान गत पांच वर्षों में वहां की महिलाओं की स्थिति को लेकर जो रिपोर्ट्स संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न वैश्विक मानवाधिकार संगठनों द्वारा तैयार की गयी है, उसके मुताबिक वहां महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है जहां लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित है। वहां कक्षा 6 से आगे लड़कियों के स्कूल जाने और महिलाओं के विश्वविद्यालय जाने पर पूरी तरह रोक है। महिलाओं द्वारा लिखी गई लगभग 140 किताबों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। केवल 7 प्रतिशत महिलाएं ही रोज़गार में बची हैं। यहां महिलाओं को गैर-सरकारी संगठनों, सरकारी मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्रों में काम करने से रोक दिया गया है। ब्यूटी पार्लर्स को भी पूरी तरह बंद कर दिया गया है। महिलाओं की स्थिति को दासों जैसा बना दिया गया है। नए कानून के तहत पति को अपनी पत्नी या बेटी को शारीरिक सज़ा देने यानी उसे पीटने की अनुमति है।  अफगानिस्तान में यदि कोई महिला अदालत जाना चाहती है तो उसे पूरी तरह ढके होकर अपने उसी पुरुष अभिभावक, पति या भाई के साथ आना होगा, जिसने उस पर अत्याचार किया है। महिलाओं से तलाक का अधिकार छीन लिया गया है जबकि बाल विवाह को बढ़ावा देने वाले नियमों को कड़ा किया गया है। महिलाएं बिना किसी पुरुष रिश्तेदार के घर से बाहर लंबी दूरी की यात्रा व सार्वजनिक परिवहन का उपयोग नहीं कर सकतीं। सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के ऊंची आवाज़ में बोलने पर भी पाबंदी लगा दी गई है। लड़कियों की मेडिकल शिक्षा बंद होने के कारण भविष्य में देश में महिला डॉक्टरों की कमी हो सकती है। अफगान संस्कृति में महिलाएं पुरुष डॉक्टरों से इलाज नहीं करवा सकतीं। इस तालिबानी दमनकारी माहौल के कारण अफगान महिलाओं में मानसिक अवसाद, अकेलेपन और आत्महत्या की प्रवृत्तियों में भारी उछाल आया है। वहां की 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य बेहद खराब है। वास्तव में अफगानिस्तान में शरिया का कम, वहां की स्थानीय ‘पश्तून कबीलाई संस्कृति’ का अधिक प्रभाव है।
उधर ईरान के शरिया मॉडल व इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों व हदीस के अनुसार ‘ज्ञान प्राप्त करना हर मुस्लिम पुरुष और महिला का कर्त्तव्य है।’ वहां महिलाओं को पीएचडी और चिकित्सा सहित उच्च शिक्षा प्राप्थ करने की पूरी अनुमति है। ईरान में महिलाओं की शिक्षा पर कोई प्रतिबंध न होने की वजह से ही वहां महिला साक्षरता दर 85 प्रतिशत से अधिक है। इसके अलावा ईरान के विश्वविद्यालयों में 50 से 60 प्रतिशत छात्र महिलाएं हैं, जो विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। अधिकांश वैश्विक इस्लामी विद्वान ईरान के इस कदम को शरिया के अनुकूल मानते हैं। ईरान के शरिया मॉडल में महिलाओं को सम्पत्ति रखने, व्यापार करने और अपनी कमाई पर पूरा अधिकार रखने की स्वतंत्रता दी गई है। 
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