बच्चों के मन में क्यों पनप रही है हिंसा और बदले की भावना ?

बच्चों की दुनिया खेल, जिज्ञासा, दोस्ती और सीखने की सहज दुनिया मानी जाती है। छोटी-छोटी बातों पर रूठना और फिर कुछ देर में साथ खेलना बचपन की पहचान थी लेकिन हाल की घटनाएं इस तस्वीर को बेचैन करने लगी हैं। पंचकूला के सरकारी स्कूल में तीसरी कक्षा के आठ वर्षीय छात्र पर आरोप है कि उसने केजी में पढ़ने वाली बच्ची को खाली कक्षा में ले जाकर बुरी तरह पीटा। नोएडा के एक स्कूल में सात वर्षीय छात्र को उसके पंद्रह से अधिक सहपाठियों ने कथित तौर पर फर्श पर गिराकर पीटा। आंध्र प्रदेश में प्रेम प्रस्ताव ठुकराने पर दसवीं की छात्रा पर कक्षा में हमला किए जाने की घटना भी सामने आई। ये घटनाएं बच्चों की सुरक्षा, व्यवहार और सामाजिक वातावरण पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि हिंसक व्यवहार अब बहुत कम उम्र में दिखाई देने लगा है। आठ साल का बच्चा दूसरे बच्चे को चोट पहुंचाने की स्थिति तक कैसे पहुंचा? सात साल के छात्र के साथियों को समूह बनाकर उसे पीटने की प्रेरणा कहां से मिली? क्या बच्चों के मन में संवेदनाएं कम हो रही हैं या गुस्सा और बदले की भावना बढ़ रही है? इन सवालों का जवाब केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि आजकल के बच्चे बिगड़ गए हैं या कलयुग का प्रभाव है। इसके पीछे पारिवारिक वातावरण, सामाजिक बदलाव, मानसिक दबाव और बच्चों को मिलने वाले संस्कार जैसे अनेक कारण हो सकते हैं।
बचपन में भावनाओं को पहचानने और संभालने की क्षमता धीरे-धीरे विकसित होती है। कई बच्चे निराशा, ईर्ष्या, अपमान और असुरक्षा को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। वे अपनी परेशानी को चिल्लाने, मारपीट करने या दूसरों को परेशान करने के रूप में दिखाते हैं। इसका अर्थ है कि बच्चों को केवल अनुशासन सिखाना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें गुस्से पर नियंत्रण, सहनशीलता और विवाद को बातचीत से सुलझाने की शिक्षा भी देनी होगी। कभी-कभी आक्रामक व्यवहार तनाव, डर, उपेक्षा या किसी अप्रिय अनुभव का संकेत भी हो सकता है। परिवार बच्चे की पहली पाठशाला है। घर में माता-पिता के बीच लगातार झगड़े, अपमानजनक भाषा, गृह क्लेश और तनावपूर्ण वातावरण का असर बच्चों की मनोदशा पर पड़ सकता है। बच्चा बड़ों की बातें ही नहीं, उनका व्यवहार भी देखकर सीखता है। यदि घर में मतभेद का समाधान बातचीत के बजाय चिल्लाकर किया जाता है तो बच्चा भी यही तरीका अपना सकता है। हालांकि बच्चों के व्यवहार के लिए परिवार को अकेले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। आर्थिक दबाव, माता-पिता की व्यस्तता, स्कूल का वातावरण और साथियों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आज भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं लेकिन बच्चों के साथ बैठकर बातचीत करने का समय कम होता जा रहा है। मोबाइल और इंटरनेट ने मनोरंजन के अनेक रास्ते खोले हैं लेकिन उम्र के अनुरूप निगरानी नहीं होने पर बच्चे हिंसा, गाली-गलौज और बदले की भावना को सामान्य दिखाने वाली सामग्री से प्रभावित हो सकते हैं। कई बार मोबाइल बच्चों को व्यस्त रखने का साधन बन जाता है और माता-पिता यह जानने का प्रयास ही नहीं करते कि बच्चा क्या देख रहा है। बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के साथ खेलकूद, किताबों, संगीत और रचनात्मक गतिविधियों की ओर भी प्रेरित करना होगा। बच्चों की मनोदशा समझने के लिए माता-पिता को उनसे प्रतिदिन बातचीत करनी चाहिए। केवल पढ़ाई, परीक्षा और अंकों के बारे में पूछना पर्याप्त नहीं है। यह भी जानना ज़रूरी है कि बच्चा किस बात से खुश है, किस बात से परेशान है और स्कूल में उसके मित्रों के साथ कैसा व्यवहार होता है। बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करना, सबके सामने अपमानित करना और हर गलती पर कठोर दंड देना उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। प्यार का अर्थ हर मांग पूरी करना नहीं है। उचित अनुशासन, स्पष्ट नियम और जिम्मेदारी का एहसास भी अच्छी परवरिश का हिस्सा हैं।
स्कूलों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि बच्चों के व्यवहार में बदलाव पहचानने वाले मार्गदर्शक भी हैं। कक्षा में पर्याप्त निगरानी, सुरक्षित वातावरण और बच्चों के बीच सहयोग की भावना विकसित करना ज़रूरी है। किसी बच्चे को लगातार चिढ़ाना, अलग-थलग करना या समूह में निशाना बनाना मामूली शरारत समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। स्कूल प्रबंधन को ऐसी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। आवश्यकता होने पर अभिभावकों के साथ बाल मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता की सहायता भी लेनी चाहिए। बच्चे के स्वभाव में अचानक बदलाव, बार-बार गुस्सा, अत्यधिक चुप्पी, डर, दूसरों को परेशान करने की प्रवृत्ति या दोस्तों से दूरी दिखाई दे तो उसे केवल जिद समझकर टालना ठीक नहीं है। माता-पिता को धैर्यपूर्वक उसकी बात सुननी चाहिए। ज़रूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। 
बच्चे समाज का भविष्य ही नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी भी हैं। उन्हें केवल अच्छे अंक और प्रतिस्पर्धा मंर आगे रहने की सीख देना पर्याप्त नहीं है। संवेदना, संयम, सहनशीलता, मित्रता और दूसरों के सम्मान का महत्व भी समझाना होगा। पंचकूला और नोएडा जैसी घटनाएं चेतावनी हैं कि घर, स्कूल और समाज को मिलकर बच्चों के मन की बात सुननी होगी। आखिर बच्चों को अच्छे संस्कार देने और उनका भविष्य सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की है। बचपन को भय, बदले और हिंसा से मुक्त रखना हम सबका सामूहिक दायित्व है।
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