अरब पार्टियों के सहयोग से ही बनेगी इज़रायल में नई सरकार

इज़रायल में 27 अक्तूबर 2026 को हुए आम चुनावों ने एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया है। इन चुनावों के नतीजों ने जहां प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता के लिए एक बड़ी चुनौती पेश की है, वहीं देश की अरब पार्टियों को भी ऐसी अहम स्थिति में ला खड़ा किया है जहां अगली सरकार बनाने में उनकी भूमिका बेहद अहम होने की संभावना है। वास्तव में किसी भी राजनीतिक पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण इज़राइल की संसद में अस्थिरता की स्थिति पैदा हो गई है।
इज़रायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सदस्य हैं। वहां प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन पर आधारित चुनाव सिस्टम लागू है। सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 संसद सदस्यों की ज़रूरत होती है। सेंट्रल इलेक्शन कमेटी की तरफ से 30 अक्तूबर को जारी वोटों की गिनती के आखिरी नतीजों के मुताबिक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लीडरशिप वाले गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं। उनकी लिकुड पार्टी के अलावा, इस गठबंधन में शास, यूनाइटेड तोराह जूडाइज़्म, ओत्ज़मा येहुदित और रिलीजियस ज़ायोनिज़्म जैसी पार्टियां शामिल हैं। दूसरी ओर गादी आइज़ेनकोट की लीडरशिप वाला विपक्षी गुट 48 सीटें जीतने में कामयाब रहा है। इसमें याशर, बीयाचद, द डेमोक्रेट्स और यसराइल बेइटेनु जैसी पार्टियां शामिल हैं। इन दो गुटों के अलावा अरब की लीडरशिप वाली दो मुख्य पॉलिटिकल पार्टियों जॉइंट लिस्ट और राआम ने मिलकर 19 सीटें जीती हैं। इनमें से जॉइंट लिस्ट ने 11 और राष्आम ने 8 सीटें जीती हैं। इन चुनावों की एक और ज़रूरी बात वोटिंग परसेंटेज है। करीब 77.9 परसेंट वोटरों ने अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल किया, जो 1999 के बाद सबसे ज्यादा है। 
अगर अरब पार्टियों की बात करें तो इस बार उन्हें ज़रूर ऐतिहासिक कामयाबी मिली है। इसीलिए इन चुनावों की सबसे दिलचस्प और दूरगामी बात अरब पार्टियों का उभरना है। इज़रायल में रहने वाले फिलिस्तीनी मूल के अरब नागरिकों की पॉलिटिकल हिस्सेदारी पहले भी रही है लेकिन इस बार इन पार्टियों ने 19 सीटें जीतकर नया रिकॉर्ड बनाया है। पिछली पार्लियामेंट में उनके पास कुल 10 सीटें थीं। इन दोनों पार्टियों की 19 सीटों ने उन्हें सरकार बनाने के समीकरण में अहम जगह दी है। अगर विपक्षी गुट उनका समर्थन पाने में कामयाब हो जाता है, तो मैथमेटिकली उसके लिए बहुमत का आंकड़ा पार करना संभव हो सकता है। यह समझना भी ज़रूरी है कि ये दोनों दो अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां हैं। उनकी सभी नीतियां और राजनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। इसलिए उनकी 19 सीटों को एक ही आम गठबंधन की सीटें मानना सही नहीं होगा।
आंकड़ों के हिसाब से विपक्ष की 48 सीटें और अरब पार्टियों की 19 सीटें मिलकर 67 होती हैं, जो बहुमत के लिए ज़रूरी 61 सीटों से ज्यादा हैं लेकिन राजनीति में सिर्फ नंबर ही सब कुछ नहीं होते। इसलिए राजनीतिक विचारधारा, आपसी भरोसा, नीतियां और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे भी बहुत ज़रूरी हैं। इस मामले में एक बड़ी रुकावट विपक्ष के कुछ नेताओं का अरब पार्टियों के साथ अलायंस बनाने से इन्कार करना है। खासतौर पर इसराइल बेइटेनु के नेता एविगडोर लिबरमैन ने अरब पार्टियों के साथ अलायंस की संभावना से इन्कार कर दिया है। 
दूसरी तरफ गादी आइज़ेनकोट एक बड़ी, ज़ायोनिस्ट और नेशनल एकता वाली सरकार बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने सरकार में शामिल होने वाली पार्टियों के लिए कुछ पॉलिटिकल सिद्धांत और शर्तें भी तय की हैं। इनमें नेशनल सर्विस ऑब्लिगेशन का मुद्दा और गाज़ा में हमास की मिलिट्री और एडमिनिस्ट्रेटिव क्षमता को खत्म करना शामिल है। आइज़ेनकोट और याइर लैपिड के बीच 1 नवम्बर को हुई मीटिंग भी लेटेस्ट पॉलिटिकल एक्टिविटीज़ में अहम है। दोनों नेताओं ने इलेक्शन रिज़ल्ट के बाद अगले पॉलिटिकल स्टेप्स पर चर्चा की है। इससे पता चलता है कि अपोज़िशन सरकार बनाने के लिए एक कॉमन स्ट्रैटेजी तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
दूसरी तरफ विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा इलेक्शन रिज़ल्ट के आधार पर इज़राइल में सरकार बनाने की तीन मुख्य सम्भावनाएं दिख रही हैं। इनमें से पहली सम्भावना यह है कि आइज़ेनकोट की लीडरशिप में सरकार बन सकती है, जिसके तहत अपोज़िशन अरब पार्टियों के साथ एग्रीमेंट करके सरकार बनाने की कोशिश कर सकता है। इसमें राम पार्टी सरकार का हिस्सा बन सकती है, जबकि जॉइंट लिस्ट बाहर से सपोर्ट दे सकती है लेकिन इसके लिए दोनों पार्टियों के बीच पॉलिसी कंसेंसस और आपसी भरोसा बनाना ज़रूरी होगा। इसके अलावा अरब पार्टियों के साथ सहयोग के मुद्दे पर भी विपक्ष में आम सहमति बनेगी।
दूसरी संभावना है नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट बनाने की, यानी अगर विपक्ष अरब पार्टियों के साथ सहयोग करने से मना कर देता है और नेतन्याहू भी अपने मौजूदा गठबंधन के ज़रिए बहुमत हासिल नहीं कर पाते हैं तो एक बड़ी नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट बनाने का रास्ता खुल सकता है। इसमें विपक्ष के कुछ सेंट्रिस्ट या राइटविंग नेता भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि नेतन्याहू के साथ सरकार बनाने के मुद्दे पर विपक्ष में गंभीर मतभेद हैं।
तीसरी और आखिरी संभावना दोबारा चुनाव के विकल्प के रूप में मौजूद है, यानी अगर कोई भी पार्टी सरकार बनाने के लिए ज़रूरी समर्थन जुटाने में नाकाम रहती है, तो देश को एक बार फिर आम चुनाव कराने पड़ सकते हैं। ऐसे में, मौजूदा नेतन्याहू सरकार अगली सरकार बनने तक केयरटेकर सरकार के तौर पर काम करती रहेगी। हालांकि चुनाव से जुड़ी शिकायतों और टेक्निकल जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ऑफिशियल नतीजे 4 नवम्बर को प्रेसिडेंट आइजैक हजऱ्ोग को सौंपे जाने हैं। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करेंगे और उस संसद सदस्यों को सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे, जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वह बहुमत हासिल कर सकता है। नॉमिनेटेड लीडर को शुरू में सरकार बनाने के लिए 28 दिन दिए जाएंगे, जिसे ज़रूरत पड़ने पर 14 दिन और बढ़ाया जा सकता है। नई पार्लियामेंट का शपथ ग्रहण समारोह 10 नवंबर को होना है। अगर ऊपर दिए गए नतीजों के असर की बात करें, तो इसमें कोई शक नहीं है कि इज़रायली चुनाव के ये नतीजे सिर्फ वहां की घरेलू राजनीति तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इनका असर पूरे मिडिल ईस्ट और दुनिया की राजनीति पर भी पड़ने की बहुत संभावना है।
अगर नेतन्याहू सत्ता से बाहर होते हैं तो इज़रायल की फिलिस्तीन पॉलिसी, गाज़ा के भविष्य, वेस्ट बैंक की स्थिति और ईरान के साथ संबंधों को लेकर नई सरकार के नज़रिए में बदलाव हो सकता है। इन चुनावों का एक और ज़रूरी पहलू इज़रायल के अरब नागरिकों की पॉलिटिकल हिस्सेदारी है। 19 सीटों की जीत दिखाती है कि अरब वोटरों की पॉलिटिकल ताकत को अब नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा। अब यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इज़राइली पॉलिटिक्स में नेतन्याहू की ताकत बनी रहती है या आइज़ेनकोट के नेतृत्व में नई सरकार बनती है, या देश को नए चुनावों का सामना करना पड़ता है। 
मालेरकोटला।
मो. 98552-59650

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