क्या रामलीला मैदान एक बार फिर ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा ?

रामलीला मैदान क्या एक बार फिर से ऐतिहासिक भूमिका निभाने जा रहा है? क्या विपक्ष की रैली ने भारत भूमि पर एक बार फिर से सत्ता परिवर्तन की लहर को पैदा कर दिया है? क्या राहुल के नेतृत्व में दिल्ली आई भीड़ ने ये ऐलान कर दिया है कि नरेन्द्र मोदी सरकार के लिये अब जाने का वक्त आ गया है? क्या वाकई में मोदी और शाह चुनावों में हेराफेरी कर के चुनाव जीत रहे थे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब देश पूछ रहा है। 
रामलीला मैदान इस देश में बदलाव का प्रतीक रहा है। चाहे वो 1975 की जेपी की रैली हो जिसने इंदिरा गांधी की सरकार को उखाड़ फेंका था या फिर अन्ना का आंदोलन रहा हो जिसने मनमोहन सिंह की सरकार के जाने का रास्ता तैयार किया। अब समूचा विपक्ष इसी रामलीला मैदान में मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद हुआ है। ऐसे में ऊपर पूछे गये सवाल महत्वपूर्ण हैं और राहुल गांधी की इस बात में दम है कि इन दिनों मोदी और शाह को रात में ठीक से नींद नहीं आती होगी। 
रामलीला मैदान की रैली ने तीन चीज़ों पर अपनी मुहर लगा दी है। एक, कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार हो गया है। वो कांग्रेस जिसके बारे में कहा जा रहा था कि वो मृतप्राय हो गई है, उसके पैरों में स्प्रिंग लग गई है। उसका कैडर नये सिरे से ऊर्जस्वित हो गया है। वो जो सड़क पर उतरना भूल गया था, वो फिर पार्टी और नेता के लिये लड़ने को तैयार हो गया है। वो लाठी डंडा खा रहा है। जेल का डर उसके मन से निकल गया है। किसी भी पार्टी के लिये कैडर की ऊर्जा उसके लिये प्राणवायु होती है। वो ठंडा हुआ तो पार्टी ठंडी। पिछले एक महीने में कांग्रेस का कार्यकर्ता दो बार सड़कों पर उतरा। पहले 12 अक्तूबर को जब उसने बाराखंभा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया था और अब रामलीला मैदान पर। दोनों ही बार भारी भीड़ जुटी और सरकार की नींद उड़ी। 
दो, रामलीला मैदान ने अब ये साबित कर दिया है कि राहुल गांधी ही विपक्ष का एकमात्र नेता है और उनको फिलहाल कहीं से कोई चुनौती नहीं है। राहुल ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद से जो गति पकड़ी है अब वो धीर-धीरे अपनी तार्किक परिणति को पहुंच रही है। राहुल एक नेता के तौर पर न उभर पायें, ये सुनिश्चित करने का प्रयास मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के पहले दिन से ही किया। वो काफी हद तक कामयाब भी हुये जब देश में राहुल की छवि को पप्पू बना दिया गया और लोग राहुल का नाम लेने पर नाक-भौ सिकोड़ते थे लेकिन अब उन्हीं राहुल में समूचे विपक्ष को भविष्य दिखाई पड़ता है। ये मामूली बात नहीं है। 
भारत के इतिहास में किसी भी राजनेता को इतना अपमान नहीं झेलना पड़ा होगा जितना राहुल ने झेला है। उनके बारे में ये कहा जाता था कि वो कांग्रेस को ले डूबेंगे और कांग्रेस को खत्म कर के ही मानेंगे। तमाम विपक्षी नेता राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं थे लेकिन वही राहुल विपक्ष के नेता बन गये हैं और सभी नेताओं को उनको अपना नेता स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वो अकेले नेता हैं जिन्होंने सरकार की आंख में आंख डाल कर बात की। लगातार अपने हमलों से सरकार को विचलित किया। यही कारण है राहुल का नाम आते ही सत्ता पक्ष की भृकुटी तन जाती है। मोदी सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उसे ये समझ नहीं आ रहा है कि वो राहुल से कैसे निपटे। 
राहुल की ये यात्रा ‘भारत जोड़ो अभियान’ से शुरू हुई थी। चंद्रशेखर के बाद वो अकेले नेता हैं जिन्होंने कन्या कुमारी से कश्मीर तक की यात्रा पैदल की। इस यात्रा के बाद उन्होंने गुवाहाटी से गुजरात की भी यात्रा की। उनको ये समझ में आ गया कि देश में मोदी सरकार को लेकर एक बेचैनी है। जनता के मुद्दों को उठाने की ज़रूरत है। जनता को अगर नेता की ईमानदारी पर भरोसा हो जाये तो लोग अपने आप जुटने लगते हैं। राहुल ने यात्रा के बाद जो आक्रामकता दिखाई और संविधान और लोकतंत्र बचाने की जो लड़ाई उन्होंने शुरू की, उस पर जनता को भरोसा हुआ। 2024 के चुनाव नतीजे इसका प्रमाण हैं। भाजपा, सरकार और संघ परिवार को लग गया कि समय रहते भूलसुधार नहीं की गई तो फिर आगे का रास्ता बहुत मुश्किल होगा। राहुल की नज़र में चुनाव आयुक्त की रक्षा के लिये कानून में बदलाव करना और ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति सरकार में येन केन प्रकारेण बने रहने का एक उपक्रम है। राहुल ने जब शुरू में वोट चोरी का सवाल खड़ा किया तो लोगों को विश्वास नहीं हुआ लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद अब विपक्ष के मन में कोई संदेह नहीं रह गया। अब विपक्षी नेताओं को राहुल की बात पर यकीन हो गया है। ये राहुल की जीत है। 
तीन, मोदी सरकार 2014 के बाद पहली बार भारी दबाव में आई है। मोदी पहली बार परेशान दिख रहे हैं। उनके लिये 2014 से लेकर 2024 की राजनीतिक यात्रा बहुत सुगम रही। वो अपराजेय माने जाते थे। उनको लगता था कि उनके सामने कोई चुनौती नहीं है। 2024 के चुनाव ने उनका भ्रम तोड़ दिया। उसके बाद वो संभल नहीं पाये। मोदी के बारे में ये मशहूर था कि वो नैरेटिव गढ़ने में तेज़ हैं, उनका कोई सानी नहीं है लेकिन अब वो इस विधा में लगातार फेल हो रहे हैं और इस काम में उनका मित्र मीडिया भी मदद नहीं कर पा रहा है। ये मोदी सरकार की सबसे बड़ी असफलता हैं। यही कारण है कि वो और उनकी पार्टी लगातार बचाव की मुद्रा में है। रामलीला मैदान ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि विपक्ष के आंदोलन को विदेशी साजिश बताने का टोटका बहुत कमजोर है और एक नवम्बर की रैली को सिख दंगों से जोड़ने से काम भी नहीं चलेगा। पूरी सरकार जिसने कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को भारी पुलिस व्यवस्था लगा कर कुचलने का काम किया, वो पूरी तरह से रामलीला मैदान की भीड़ को रोकने में असमर्थ रही, असहाय दिखी। ये मोदी-शाह की निजी हार है। इस बीच चौथा काम ये हुआ कि विपक्षी एकता को लेकर जो सवाल खड़े किये जा रहे थे, मोदी का मित्र मीडिया जो काम बड़ी कुशलता से करता रहा है, वो अब ध्वस्त हो गया है। अखिलेश और राहुल के बीच मतभेद को जानबूझ कर उभारा जाता रहा है, उस पर राहुल और अखिलेश की एक साथ एक ट्रक पर बैठी तस्वीर ने पानी फेर दिया। विपक्ष एकजुट है। वो समझ गया है कि ‘बटेंगे तो कटेंगे’। उसके लिये ‘संघे शक्ति’ के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। 
यहां से लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुंच रही है। अब देखना ये होगा कि ज्ञानेश कुमार कब इस्तीफा देते हैं या हटाये जाते हैं। उनका पद पर बने रहना मोदी सरकार के हित में नहीं है। लोगों के मन में ये सवाल गहरे बैठता जा रहा है कि क्या मजबूरी है कि मोदी सरकार उनको डिफेंड कर रही है? गाहे बगाहे ये सवाल मजबूत होता जा रहा है कि चुनाव में धांधली की जा रही है। अखबारों में एसआईआर को लेकर रोज़ छपने वाली खबरें उनके मन के शक को और पुष्ट कर रही हैं। ऐसे में ज्ञानेश का कुर्सी पर बने रहना मोदी सरकार के लिये खतरनाक है लेकिन वो ये भी जानते हैं कि अगर ज्ञानेश गये तो फिर राहुल के निशाने पर सीधे मोदी और शाह होंगे। क्या मोदी सरकार और संघ परिवार ये स्थिति झेल पायेंगे?

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