विजय दशमी का संदेश


रावण गुणी एवं ज्ञानी था किंतु आततायी एवं अहंकारी था। वह मायावी था। उसके दस सिर थे जो उसकी माया से ही उसे मिले थे। ये दस सिर उसकी दस बुराइयों के प्रतीक थे। रावण की बहन सूर्पणखा ने बलात् राम लक्ष्मण से विवाह की कामना की जिसके कारण उसे नाक गंवानी पड़ी। वह विलाप करती अपने भाई के पास पहुंची, तब गुस्से में रावण ने माया से मारीच को स्वर्ण मृग बना वन में भेजा और भ्रमित कर सीता का हरण किया। ज्ञानी रावण को अपनी मौत का ज्ञान था, फिर भी उसने राम जो देव अवतार थे, उनके हाथों मृत्यु पाकर बैकुंठ लोक जाने के लिए राम से जान बूझ कर बैर ठान लिया। इस सबके बाद भी राम के द्वारा रावण को पराजित करना सरल नहीं था। राम को आक्रमण करना पड़ा। युद्ध लंबा चला। रावण को वरदान प्राप्त था। वह माया से अपने कटे शीश को पुन: प्राप्त कर लेता था। राम ने देवी की पूजा कर शक्ति प्राप्त की और आश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन सर्वकार्य सिद्धिदायक विजय काल (मुहूर्त) में रावण पर निर्णायक वार किया और विजय प्राप्त की। रावण पराजित हुआ। सीता को स्वतंत्रता मिली। इस तिथि एवं समय का विशेष महत्त्व है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इस तिथि के दिन किए जाने वाले सभी काम पूर्ण एवं सफल होते हैं।  देवी ने इस तिथि के दिन शुभ-निशुंभ आदि असुरों का वध किया था। इसी तिथि के दिन इन्द्र ने असुरों को हराया था। पांडवों ने इसी तिथि के दिन अपना राजपाट पुन: पाने के लिए कौरवों पर आक्रमण किया था। इन्हीं कारणों से इस तिथि का आज भी विशेष महत्त्व है। आज भी वर्ष की तीन तिथियां (1) आश्विन शुक्ल दशमी (2) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (3) कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा सबसे शुभ मानी जाती हैं। राम के द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने के कारण यह विजयदशमी, दशहरा एवं विजय पर्व कहलाता है। यह हमें दस पापों का परित्याग की प्रेरणा देता है। हमें भी अपने मन के दस पापों - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसे दस पापों का परित्याग करना चाहिए। रावण के दस सिर इन्हीं पापों के प्रतीक माने जाते हैं।