कुदरत के स़फाई कर्मचारी-2


(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक पढ़ें)
इस समय गिद्धों की प्रजाति घोर संकट में है। समय है तथा हमारा कर्त्तव्य भी है कि हम इस ‘की स्टोन स्पीसिज़’ को बचाएं। एक रसायन ‘डाइक्लोफिनैक’ के इस्तेमाल से कैसे एक प्रजाति कुछ ही दशकों में खत्म हो गई, यह हम सभी के समक्ष है, परन्तु दुख की बात यह है कि आज भी डाइक्लोफिनैक हिन्दोस्तान में उपलब्ध है तथा यह इस्तेमाल भी होता है।  कुछ पक्षी वैज्ञानिक इस प्रजाति के अलोप होने से दुखी होने के अतिरिक्त इनके पूरी तरह से खत्म होने से हमारे पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव एवं मनुष्य की अनेक कठिनाइयों, समस्याओं एवं बीमारियों से लड़ने की कम हो रही शक्ति के विचार से अत्यधिक चिंतित हैं।  डा. विभु प्रकाश डिप्टी डायरैक्टर-कम-मुख्य वैज्ञानिक  बॉम्बे नैशनल हिस्ट्री सोसायटी, मुंबई ने सबसे पहले गिद्धों की संख्या में निरन्तर तेज़ी से हो रही कमी को गम्भीरता से लिया। वर्ष 2005 में डाइक्लोफिनैक के उत्पादन एवं इसके प्रयोग पर पाबंदी लगवाने में भी डा. विभु प्रकाश ने अहम भूमिका निभाई। उनकी सतत मेहनत एवं लगन देखकर बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी एवं हरियाणा के वन विभाग ने 2004 में मिल कर गिद्धों के प्रजनन एवं उनकी सार-संभाल
के लिए भारत के सबसे पहले जटायू कंज़र्वेशन ब्रीडिंग सैंटर (जे.सी.बी.सी.) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य गिद्धों की तीन प्रजातियों ओरिएंटल व्हाईट बैकड, लौंग बिल्ड एवं सिलंडर बिल्ड को बढ़ाना एवं फिर इन्हें दोबारा खुला छोड़ना है। इसके अतिरिक्त पशुपालकों एवं वैटर्नरी डाक्टरों को डाइक्लोफिनैक के हानिकारक परिणामों के संबंध में जानकारी देना तथा उसका प्रयोग बंद करवाना एवं इसके स्थान पर नई आविष्कृत की गई मेलाक्सिकेम दवा का इस्तेमाल करने के लिए प्रचार करना है। इस बड़े कार्य के लिए उनकी पत्नी नितिका प्रकाश जो स्वयं भी एक पक्षी वैज्ञानिक हैं, के सहयोग से इस समय यह सैंटर सफलतापूर्वक गिद्धों की प्रजातियों के प्रजनन एवं इनकी सम्भाल का कार्य कर रहा है।  इस प्रयास में भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटैक्शन ऑफ बर्ड्स (यू.के.), इंटरनैशनल सैंटर फॉर बर्ड्स ऑफ परे (यू.के.) ज़ुआलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन एवं डार्विन इनीशिएटिव फॉर सर्वाइवल ऑफ स्पीसिज़ जैसे अहम संस्थानों ने भी इस सैंटर के खुलने में तकनीकी जानकारी एवं वित्तीय योगदान डाला। जटायू कंज़र्वेशन ब्रीडिंग सैंटर पिंजौर शहर से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर मोरनी पहाड़ों के निकट स्थित है, एवं  बीड़ शिकारगढ़ वाईल्ड लाईफ सैंचुरी के निकट पांच एकड़ में फैला हुआ है। यह पड़ोसी राज्यों एवं स्वास्थ्य विभाग की सहायता के साथ भिन्न-भिन्न जानवरों एवं इन्सानों पर  डाइक्लोफिनैक के हानिकारक प्रभावों के संबंध में भी जन-साधारण को जागरूक करता है। इस समय गिद्धों को बचाने के लिए तीन अन्य केन्द्र राणी (आसाम) में, बकसा (पश्चिम
बंगाल) में एवं भोपाल (मध्य प्रदेश) में खोले गए हैं।  इनके अतिरिक्त जूनागढ़ (गुजरात), नंदन कानन (उड़ीसा), हैदराबाद (तेलंगाना) एवं मुट्टा (झारखंड)में भी गिद्धों की सार-संभाल के लिए केन्द्र खोले गए हैं। जटायू केन्द्र पिंजौर में बनाए गए पांच ‘पक्षी घरों’ में गिद्धों को प्राकृतिक वातावरण प्रदान किया गया है, जहां वे प्राय: झुण्डों के रूप में ही रहते हैं। गिद्धों की औसत आयु लगभग 40-45 वर्ष होती है।  भिन्न-भिन्न आयु समूह के गिद्धों को रखने के लिए भिन्न-भिन्न ‘पक्षी घर’ बनाए गए हैं तथा विशेष बात यह है कि इन पक्षी घरों में सी.सी.टी.वी. कैमरे स्थापित किए गए हैं, जिससे गिद्धों को बिना किसी हिलजुल के उनकी प्रत्येक गतिविधि पर नज़र रखी जाती है। गिद्धों की खुराक में बकरी का मांस परोसा जाता है तथा प्रत्येक गिद्ध सप्ताह में लगभग 3-4 किलो मांस खा जाता है। काबिल-ए-गौर है कि जिन बकरियों का मांस इन्हें परोसा जाता है, उन पर डाइक्लोफिनैक दवा के इस्तेमाल का पता लगाने के लिए उन्हें लगभग एक सप्ताह पहले केन्द्र में लाकर उनकी पूरी तरह से जांच की जाती है। जटायू कंज़र्वेशन  ब्रीडिंग सैंटर में वर्तमान में 8 गिद्ध उड़ान भरने के लिए तैयार हैं, जिन्हें दिसम्बर
मास में खुले आसमान में छोड़ा जायेगा। उल्लेखनीय बात यह है कि इन सब पर ट्रांसमीटर लगाए गए हैं, जिससे इन पर उड़ान भरने के बाद भी पूरी निगरानी रखी जायेगी।  यह हमारे लिए बहुत ही लज्जाजनक बात होगी यदि ये विलक्षण पक्षी हमारी धरती से पूर्णतया अलोप हो जायेंगे। सदियों से ये न केवल इस धरती का अपितु इस आकाश का भी एक बड़ा हिस्सा रहे हैं। आओ, हम सभी मिलकर इन्हें अलोप होने से बचाएं।  (समाप्त)