साहित्य भाषाई दीवारों में नहीं बंधा करता : सुरेश सेठ


जालन्धर, 20 अक्तूबर (अ.स.) : देश की एक प्रमुख साहित्यिक/सामाजिक संस्था पंजाब कला साहित्य अकादमी (रजि.) की ओर से बाद-ए-सबा के सहयोग से आयोजित समारोह में श्री हिमकर श्याम एवं अब्बास सुल्तानपुरी द्वारा सम्पादित देश के विभिन्न राज्यों की लगभग दो दर्जन कवयित्रियों की ़गज़लों एवं नज़्मों के मजमूआ ‘बाद-ए-सबा’ चतुर्थ का विमोचन किया गया। पुस्तक पर विशद विमर्श के बाद बहस का शुभारम्भ करते हुए हिन्दी के प्रकांड विद्वान, समीक्षक एवं समालोचक डा. अनिल पांडेय ने कहा कि देश के काव्य इतिहास के पृष्ठों पर यह संग्रह एक नई तहरीर लिखेगा। उन्होंने कहा कि इस मजमूआ में ज़ेर-ज़बर एवं नुक्ता-नज़र का बड़े सलीके से निबाह किया गया है। अध्यक्ष पद पर आसीन प्रिंसीपल सुरेश सेठ ने कहा कि नारी आज ज़िन्दगी के हर मुकाम पर अपनी हस्ती को सिद्ध कर रही है। प्रस्तुत शायरी का मजमूआ इसी बात को सिद्ध करता है। उन्होंने कहा कि उर्दू शायरी के द्वार पर महिलाओं की यह दस्तक स्वागत योग्य है। लायन्स क्लब के अध्यक्ष लायन कुलविन्द्र फुल ने भी मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए कहा कि उर्दू शायरी तहज़ीब और तमीज़ की ज़ामिन होती है। उन्होंने कहा कि उर्दू शायरी का आनंद ही कुछ और होता है। जनाब दीपक जालन्धरी ने भी इस किताब को एक नायाब संग्रह करार दिया। इस समारोह का मंच संचालन बाद-ए-सबा के युवा एवं प्रतिभाशाली सदस्य अमृतसर के शायर अर्जुन गुप्ता ने किया। पंकस अकादमी के अध्यक्ष सिमर सदोष ने कहा कि बाद-ए-सबा की अध्यक्ष श्रीमती निर्मला कपिला ने उर्दू अदब की शालीनता को हर मुकाम पर बनाये रखा है। यह इस संग्रह की खास बात है। उन्होंने कहा कि मैंने सैकड़ों पुस्तकों की समीक्षा की है, लेकिन इस संग्रह में जिस अन्दाज़ को ज़ाहिर किया गया है, वह अद्भुत है। ‘बाद-ए-सबा’ की प्रधान और सम्पादक श्रीमती निर्मला कपिला ने इस संग्रह के प्रकाशन और बाद-ए-सबा के चार पायदानों को सर करने के दौरान रू-ब-रू हुए जज़्बातों को ज़ाहिर किया। रिलीज़ समारोह के दौरान, डा. विनोद कुमार, डा. अजय शर्मा, समाज धर्म के सम्पादक श्री भोलानाथ कश्यप, डा. कुलविन्दर कौर, श्रीमती वीणा विज, पूजा सुक्रांत, डा. नीलम जुलका, श्री विजय शायर, डा. कीर्ति केसर, डा. कमलेश आहूजा, प्रो. सोमनाथ, प्रो. संदीप चाहल, डा. राज शर्मा, श्री हरदयाल सागर, श्रीमति अमिता सागर, श्री बलविन्द्र अत्री एवं पत्रकार सुक्रांत स़फरी भी तशऱीफ-फरमा रहे।