आईसिस आखिर इतना ख़ौफनाक कैसे बना ?


दोसाल पहले यूरोप के करीब नौ देशों में और अमरीका में एक सर्वे हुआ था कि आम लोग दुनिया के किस आतंकवादी संगठन से सबसे ज्यादा डरते हैं? इस पर 45 फीसदी से ज्यादा लोगों ने खूंखार ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ  इराक एंड सीरिया’ (आईएसआईएस या आइसिस) का नाम लिया था, बाकी संगठनों से डरने वाले लोगों का प्रतिशत 2 से 15 के बीच था। इससे अंदाजा लगया जा सकता है कि आइसिस कितना खौफनाक संगठन था। ऐसा नहीं है कि आइसिस बगदादी की मौत के साथ ही हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया हो, लेकिन फिलहाल तो यह पस्त होकर एक तरह से जमींदोज़ हो गया है। फिर भी दुनिया यह जानना चाहती है कि आखिर आइसिस इतना खूंखार संगठन बना तो कैसे? दरअसल एक लंबी लड़ाई के बाद अमरीका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था। मगर इस आजादी को हासिल करने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। एक तरफ  जहां इराक, अमरीकी सेनाओं के बूटों तले रौंदे जाने से तहस नहस हो चुका था, वहीं दूसरी तरफ  अमरीकी सेनाएं भी युद्ध लड़ते-लड़ते पस्त हो चुकी थीं। जब अमरीकी सेनाओं ने साल 2011 में इराक छोड़ा, तब वो इतनी जर्जर थीं कि उनके सामने ही धीरे-धीरे सिर उठा रही फिदायीन ताकतों की अमरीकी फौजों ने एक तरह से अनदेखी कर दी। हालांकि सद्दाम हुसैन मारा जा चुका था। लेकिन इराक में आतंक का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी मौजूद था।  शायद यह सोचकर अमरीकी सेनाओं ने इन फिदायीन ताकतों की अनदेखी की कि संसाधनों की कमी के चलते ये कुछ नहीं कर सकते। लेकिन बगदादी के संदर्भ में अमरीका की इसी गलतफहमी ने बड़ी भूमिका अदा की। बगदादी ने अब तक अपने संगठन का नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ  इराक रख लिया था। बरबाद बगदाद में बड़े पैमाने पर ऐसे सद्दाम हुसैन की सेना के पुराने सैनिक मौजूद थे, जिनके अंदर गहरे तक ग्लानि और अवसाद था कि वो अमरीकी सैनाओं को हरा नहीं पाए। अब वैसे तो अमरीकी सेना जा चुकी थीं, लेकिन उनकी नुमाइंदगी कर रहीं मौजूदा इराकी सेनाओं को भी ये पुराने सिपाही देश के गद्दारों में गिनती कर रहे थे। यही कारण था कि वो इनके खिलाफ  लड़ने के लिए बगदादी के आह्वान पर उसके संगठन आईएसआई से जुड़ गए। बगदादी ने बड़ी ही चतुराई से सद्दाम हुसैन की सेना के इन कमांडरों और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया। इसके बाद उसने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चेक प्वाइंट्स और भर्ती दफ्तरों को बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उसे सफलताएं मिलने लगीं। उसके लड़ाकों की संख्या कई हजार हो गई। मगर अब भी बगदादी को इराक में वो कामयाबी नहीं मिल रही थी, जो उसके जेहन में थी। उसे लगा शायद जर्जर इराक में यह कामयाबी उसे मिलेगी भी नहीं, इसलिए वह थोड़ी निराशा और बड़ी-सी चतुराई लेकर इराक छोड़ सीरिया पहुंच गया, जो इराक का पड़ोसी मुल्क  है। सीरिया उन दिनों जबरदस्त गृह युद्ध की चपेट में था। अल-कायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के दो सबसे बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति असद के विरूद्ध मोर्चा बांधे थे। लेकिन बगदादी को सीरिया में भी घुसते ही कामयाबी नहीं मिल गई। कई सालों तक सीरिया में बगदादी का कोई नामलेवा नहीं था। अलबत्ता उसने अब तक अपने संगठन का नाम एक बार फिर बदल लिया था और अब की यह आईएसआईएस हो चुका था, जिसका मतलब था, ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ  इराक एंड सीरिया’। एक तरफ  जहां बगदादी बड़े मंसूबे बाधकर यहां आया था, वहीं दूसरी तरफ असद की सेनाओं से दो-दो हाथ कर रही फ्री सीरियन आर्मी जून 2013 को अपने खस्ता हालत हो चुकने के चलते पहली बार सामने आयी और इसके मुखिया ने दुनिया से अपील की कि वो उसे हथियार दें, वरना असद की सेना हमें नेस्तनाबूद कर देंगी। हम निर्णायक रूप से महज एक महीने के अंदर हार जाएंगे।इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमरीका, इजराइल, जॉर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे, और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी। इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइल, गोला-बारूद सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया। बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए। दरअसल हुआ यह कि जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए आ रहे थे, बड़े पैमाने में उन्हें या तो पहले ही रास्ते में आईएसआईएस के लड़ाकों ने लूट लिया या फ्री सीरियन आर्मी के तमाम कमांडर गुपचुप रूप से आईएसआईएस से आ मिले और इस तरह दुनिया भर से आए हथियारों का 90 फीसदी बजाय सीरियन आर्मी के पास पहुंचने के आईएसआईएस के पास जा पहुंचे।  फ्री सीरियन आर्मी में गहरी निराशा थी, इसके मुख्य कमांडर पहले ही हार की आशंका और हताशा का बयान दे चुका था। नतीजतन बचे खुचे फ्री सीरियन आर्मी के सदस्यों ने आईएसआईएस से लड़ने का इरादा त्याग दिया और बहुतेरे उसी के साथ आ मिले। अगर कहा जाए उन दिनों तमाम आईएस लड़ाकों ने फ्रीडम फाइटर का नकाब ओढ़कर भी हथियार लूटे व अमरीकी कमांडरों से बेहतरीन ट्रेनिंग हासिल की तो भी गलत नहीं होगा; क्योंकि सीरिया में लड़ रहे संगठन फ्री आर्मी के पीछे अमरीका की ही ताकत, हथियार और रणनीति रही है।एक बार जब बड़े पैमाने पर आईएसआईएस के पास हथियारों का जखीरा हो गया तो फिर उसने खौफ  का ऐसा कहर बरपाया कि हजारों लोगों को मौत के घाट उतारते हुए इसने महज एक साल के भीतर सीरिया और इराक दोनों ही देशों के एक बड़े हिस्से में कब्जा कर लिया। उसके इस कब्जे में इन दोनों देशों के तमाम बड़े शहर भी शामिल थे। इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ  कूच कर रहा था। दूसरी तरफ इसने सीरिया के तमाम प्राचीन शहरों को अपने गोला बारूद से खंडहरों में बदल दिया था। जून 2014 से आईएसआईएस की लगातार विजयगाथा में हर रोज कोई न कोई नया पन्ना जुड़ता रहा। जल्द ही आईएसआईएस ने इराक और सीरिया के तकरीबन आधे से ज्यादा बड़े शहरों में कब्जा जमा लिया। सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर इजौर, हसाक्का, एलेप्पो, हॉम्स और यारमुक इलाके के तमाम शहरों पर इसने कब्जा कर लिया। इसी तरह इराक में भी रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा शहरों को तहस-नहस कर अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

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