फसली विभिन्नता के पक्ष से किन्नू का भविष्य


किन्नू पंजाब का प्रमुख फल है। पंजाब में फलों की काश्त निचले 80,000 हैक्टेयर रकबे में से किन्नू की काश्त लगभग 63-64 प्रतिशत रकबे पर की हुई है। इसकी काश्त निचला 49-50 हज़ार हैक्टेयर के लगभग रकबा है। किन्नू अपने पूर्ण रूप में मध्य जनवरी से मध्य फरवरी के समय के दौरान आता है, परन्तु ठेकेदार प्रणाली होने के कारण इसकी काफी मात्रा अब नवम्बर में ही तोड़ ली जाती है। तलबंडी साबो के निकट बुर्ज मानसा गांव के कुछ उत्पादकों ने दिसम्बर तक ही 1.5 लाख से 2 लाख रुपए प्रति एकड़ तक कमा लिए थे। वह अपने बागों का फल जूस के लिए शहरों के विक्रेताओं को बेचते थे। जिन किसानों ने अपने बाग ठेके पर दिए हुए हैं, उन्होंने भी काफी आमदनी प्राप्त की है। बठिण्डा से 20 किलोमीटर की दूरी पर बलजीत सिंह विर्क ने अपना तीन एकड़ बाग चार लाख रुपए में ठेके पर दिया है। इस वर्ष किन्नू उत्पादक बहुत खुश हैं। मूल्य बहुत लाभदायक है। परचून में बढ़िया आकार वाला फल 40 रुपए प्रति किलो बिक रहा है, जिसमें से उत्पादक को 20 रुपए प्रति किलो के मूल्य वसूल हो रहे हैं। दोयम और सोयम दर्जे का फल 20 से 25 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। उत्पादकों को 12 से 20 रुपए के बीच प्रति किलो का मूल्य वसूल हो रहा है। मुक्तसर ज़िले के अबुल खुराना गांव के कुछ बागवानों ने मरुस्थल पर भी किन्नू लगाया हुआ है, जो अच्छी कमाई कर रहे हैं। मुक्तसर ज़िले के कुछ किसानों ने कहा कि वह धान नहीं लगायेंगे अपितु वह धान की बजाय किन्नू लगाने को प्राथमिकता देंगे। यदि सरकार बूंद सिंचाई और सब्सिडी की राशि बढ़ा दे। इस वर्ष किन्नू उत्पादक सहित आलू और मटर बीजने वाले बहुत खुश हैं तथा वह फसली विभिन्नता संबंधी सोचने लगे हैं। पंजाब का किन्नू दिल्ली, बेंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद, बर्मा, भूटान, श्रीलंका, थाईलैंड तथा हांगकांग के देशों में उपभोक्ताओं की पसंद बना हुआ है। परन्तु किन्नू फल का तब ही मूल्य मिलता है और निर्यात के लिए मूल्य पड़ता है यदि इसको उस समय तोड़ा जाए जब इसका पूर्ण आकार, छिलके का रंग तथा आन्तरिक हिस्से की गुणवत्ता बन जाए। इसको पूरा पकने के बाद ही तोड़ा जाए। इसका स्तर बनाये रखने के लिए तोड़ने के लिए क्लीपर का इस्तेमाल करना चाहिए। फल को कभी भी हाथ से खींच कर नहीं तोड़ना चाहिए। इसको सुबह के समय ही तोड़ा जाए परन्तु फलों पर तरेल न पड़ी हो और मौसम में नमी न हो। तोड़ने के बाद फल को साफ पानी से धो कर छाया में रख देना चाहिए। फिर मंडीकरण से पहले इसका वर्गीकरण आकार के अनुसार करना चाहिए। फलों पर मोम भी चढ़ाई जाती है, ताकि दिखावट बढ़िया लगे और फल को ज्यादा समय के लिए रखा जा सके। मोम फल में पानी की मात्रा को बनाये रखती है, जिससे ढुलाई और मंडीकरण के दौरान उपभोक्ता को फल की गुणवत्ता भांपती है। किन्नू की लोकप्रियता ने माल्टा और संतरा पीछे छोड़ दिये हैं और नींबू जाति के सभी फलों से अधिक किन्नू उपभोक्ताओं के आकर्षण का केन्द्र बन गया। पंजाब में किन्नुओं की काश्त या तो कण्डी के क्षेत्र में (होशियारपुर ज़िले में) की जाती है या अबोहर, मुक्तसर, फाज़िल्का आदि क्षेत्रों में। राजस्थान के गंगानगर क्षेत्र में भी किन्नू की भरपूर काश्त है। कण्डी के क्षेत्र में पैदा हुए फल में जूस की मिठास की मात्रा ज्यादा होती है, छिलका पतला होता है, जबकि अबोहर, फाज़िल्का, (दक्षिण पश्चिम ज़िलों) आदि क्षेत्रों में पैदा हुए किन्नू का आकार बढ़िया होता है। पंजाब सरकार किन्नू की बिक्री और काश्त बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास कर रही है। बागवानी विभाग 27 जनवरी को अबोहर में नींबू जाति के फलों की प्रदर्शनी लगा रहा है, जिसमें किन्नू की प्रमुखता होगी। दक्षिण भारत के शहरों में भी किन्नू की मांग बढ़ रही है, क्योंकि वहां भेजे जा रहे हैं किन्नू की आकर्षक दिखावट बढ़िया है और जूस का स्तर अच्छा है। लाभदायक मंडीकरण के लिए फल को वर्गीकृत करके फाइबर बोर्ड या गत्तों के डिब्बों में पैक करके भेजना चाहिए। बागवानी विभाग पटियाला के डिप्टी डायरैक्टर डा. स्वर्ण सिंह मान कहते हैं कि किन्नू के पौधों पर फल बहुत लगता है। लगभग 400-500 किन्नू प्रति पौधा भी देखे जाते हैं। जब तक पेड़ पांच वर्ष का न हो जाए, कुछ फल तोड़ देना चाहिए। इसको बरसात के मौसम तथा मौसम बहार में भी लगाया जा सकता है परन्तु अगस्त-सितम्बर में लगाना बेहतर होगा क्योंकि पौधा मरेगा नहीं। बढ़िया नर्सरी से पौधे लिए जाने चाहिए। पौधे काश्त करने के समय रूढ़ी खाद का प्रयोग अवश्य करना चाहिए तथा दीमक से पौधे को बचाने के लिए क्लोरोपायरोफास डाल देनी चाहिए। किन्नू में विटामिन सी की मात्रा माल्टा और संतरा से ज्यादा है और इसमें दूसरे फलों के मुकाबले 2.5 गुणा कैल्शियम भी ज्यादा होता है जो हड्डियों को मजबूत करता है। किन्नू के पौधों में लिमोनिल बहुत है जो कैंसर को रोकने में सहायक होता है। आज किन्नू पंजाब के राजा फल के तौर पर जाना जाता है। इस पर फसली विभिन्नता लाने की उम्मीदें लगी हुई हैं। किन्नू हाइब्रिड फल है, जिसका विकास अमरीका के कैल्फिर्निया में रिवरसाइड में किंग और विलो नारंगियों के क्रॉस से हुआ। देश के विभाजन से पहले यह फल पंजाब में वर्ष 1935 में रिलीज़ किया गया। इस समय पाकिस्तान किन्नू के उत्पादन में आगे है परन्तु किन्नू का विकास पाकिस्तान में नहीं हुआ। 

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