लोकसभा के पहले सत्र में होगा सत्तापक्ष व विपक्ष के सामर्थ्य का प्रदर्शन
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।
-बशीर बद्र
केन्द्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बन चुकी है। 18वीं लोकसभा का पहला सत्र 24 जून से 3 जुलाई तक हो रहा है। इस सत्र में नये चुने गए लोकसभा सदस्यों को शपथ दिलाई जाएगी। इस बार आम परम्परा के विपरीत किसी एक पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन की सरकार होने के बावजूद राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू की ओर से विश्वास प्रस्ताव लेने का कोई निर्देश नहीं दिया गया। शायद इसका एक अहम कारण यह रहा होगा कि राजग चुनावों से पहले बना हुआ था और उसकी सहयोगी पार्टियों द्वारा मिल कर चुनाव लड़े गए थे और उन्होंने प्रधानमंत्री के पक्ष में बाकायदा राष्ट्रपति को समर्थन देने का पत्र भी दिया था। दूसरी ओर ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा बहुमत होने या सरकार बनाने का दावा भी पेश नहीं किया गया था। 27 जून को लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को राष्ट्रपति सम्बोधित करेंगे तथा नई सरकार के अगले पांच वर्षों के सम्भावित कामकाज की रूप-रेखा पेश करेंगे, जिस पर सांसद बहस करेंगे। इस अवसर पर राष्ट्रपति के भाषण तथा धन्यवाद प्रस्ताव पर होने वाली बहस से सत्तापक्ष तथा विपक्ष के तेवरों तथा सामर्थ्य का भी पता लगेगा और इस बीच ‘इंडिया’ गठबंधन सरकार को भिन्न-भिन्न मुद्दों पर सवालों के कटघरे में खड़ा करने के यत्न भी करेगा, क्योंकि इस बार संख्या के हिसाब से विपक्ष के नेताओं को बोलने के लिए समय भी पहले से अधिक मिलेगा।
बेशक अभी कोई उम्मीद नहीं लगती कि राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर यदि मत-विभाजन हुआ तो सत्तापक्ष हार जाएगा, परन्तु इसमें तीन बातें अवश्य स्पष्ट होंगी। पहली तो यह कि सत्ता में भाजपा का साथ दे रही पार्टियां किस तेवर से भाजपा का बचाव करती हैं। दूसरी बात कि ‘इंडिया’ गठबंधन की पार्टियों में आपसी तालमेल तथा एकता की भी परख हो जाएगी जबकि इस बहस में यह भी साफ हो जाएगा कि गैर-राजग तथा गैर-‘इंडिया’ गठबंधन की पार्टियों का रवैया क्या है, किस पार्टी या किस निर्दलीय उम्मीदवार का किस पक्ष की ओर झुकाव होता है या वह पूर्ण रूप में निष्पक्ष भूमिका अदा करता है। वैसे यहां अकाली दल के एकमात्र सांसद बीबा हरसिमरत कौर बादल के झुकाव की ओर भी पंजाबियों तथा सिखों की पैनी नज़र रहेगी। यह सत्र इस बात का अनुमान देने में सहायक होगा कि मज़बूत विपक्ष सत्तापक्ष को अपनी मनमानी करने से रोकने में समर्थ रहेगा या नहीं? यह भी एक अहम मुद्दा है कि स्पीकर भाजपा का अपना बनता है या राजग की किसी अन्य पार्टी का? उल्लेखनीय है कि ‘इंडिया’ गठबंधन भाजपा के अतिरिक्त किसी भी अन्य पार्टी के स्पीकर के लिए सर्वसम्मति करने पर सहमत हो सकता है। यहां यह भी उल्लेखनीय होगा कि भाजपा की ओर से जीतने के बावजूद जो पहले रहे मंत्री इस बार मंत्री नहीं बनाए गए, उनका क्या रवैया है? हम समझते हैं कि लोकसभा का पहला सत्र रियाज़ ़खैराबादी के इस शे’अर की तर्जमानी करता दिखाई देगा :
ऐसी ले दे हुई आ कर कि इलाही तौबा,
हम समझते थे कि महशर में तमाशा होगा।
बहुमत पूर्ण करने की तैयारी?
इस कद्र हमसे झिझकने की ज़रूरत क्या है,
ज़िन्दगी भर का है अब साथ करीब आ जाओ।
-साहिर लुधियानवी
हवा में सरगोशियां हैं कि भाजपा 6 माह के भीतर स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है। यह भी स्पष्ट है कि राजग सरकार के बावजूद भाजपा अपना एजेंडा ही चलाएगी। उसने साथियों की परवाह किये बिना सर्वोच्च ताकत वाली कैबिनेट की सुरक्षा कमेटी में शामिल होने वाले मंत्रियों के सभी मंत्रालय अपने पास ही रखे हैं। इस समय दोनों पक्ष अपनी-अपनी ताकत बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के सांसदों को तोड़ने के यत्नों में लगे हुए हैं। कांग्रेस दो निर्दलीय सांसदों को किसी समय भी कांग्रेस में शामिल कर सकती है, परन्तु इस मामले में पहला बयान तृणमूल कांग्रेस नेता साकेत गोखले का आया है। वह यह दावा कर रहे हैं कि भाजपा के तीन सांसद टीएमसी के सम्पर्क हैं, परन्तु नोट करने वाली बात यह है कि दल-बदल कानून के तहत यदि किसी पार्टी का दो-तिहाई हिस्सा नहीं टूटता तो दल-बदल करने वाले को इस्तीफा देकर पुन: चुनाव लड़ना पड़ता है। इसलिए इसकी सम्भावना बहुत कम है कि कोई नया-नया चुना गया सांसद सीट छोड़ कर पुन: चुनाव लड़ने का साहस करे। इसलिए चर्चा है कि भाजपा अपने ‘आप्रेशन बहुमत’ की शुरुआत छोटी पार्टियों की तोड़-फोड़ या निर्दलीय उम्मीदवारों को अपने साथ मिलाने से करेगी।
इस बीच पंजाब संबंधी एक नई चर्चा सुनाई दे रही है कि नये बने केन्द्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई है कि वह पंजाब से जीते आम आदमी पार्टी के तीन सांसदों में से दो या तीनों को ही भाजपा में शामिल करें, परन्तु उल्लेखनीय है कि बिट्टू जहां गृह मंत्री अमित शाह के करीबी हैं, वहीं उनकी मित्रता ‘आप’ के मुख्यमंत्री भगवंत मान से भी काफी गहरी बताई जाती है। चर्चा तो यह भी रही कि चाहे मान लोकसभा सदस्य रहते निजी रूप में भी अमित शाह को जानते थे, तथा अमित शाह तथा मान के बीच तालमेल भी श्री बिट्टू ने ही बैठाया था। खैर राजनीति में मित्रता एवं दुश्मनी कभी स्थायी नहीं होती। वैसे ‘आप’ के तीन सांसदों में से एक तो भाजपा में से ही आया है और एक कांग्रेस से। यह तो अब वक्त ही बताएगा कि यह चर्चा सिर्फ निराधार चर्चा ही है या इसमें कुछ वास्तविकता भी है, परन्तु यह साफ है कि टीएमसी नेता के कहने के अनुसार भाजपा छोड़ने वाले सांसदों के लिए यह कठिन होगा कि वे अपनी जीती हुई सीट छोड़ें जबकि यदि ‘आप’ के दो या तीन सांसद पार्टी छोड़ते हैं तो उनकी लोकसभा सदस्यता के लिए कोई खतरा दिखाई नहीं देता।
अकाली दल की हार—एक दृष्टिकोण यह भी
पतझड़ और बहारों में जब सीधी सीधी टक्कर हो,
फिर बेचारे तीसरे मौसम की है कुछ औ़कात कहां।
बेशक अकाली दल लोकसभा चुनावों में पिछली बार जीती दो सीटों में से एक बचाने में सफल रहा है, परन्तु उसके वोट प्रतिशत का बड़ा नुकसान हुआ है। इसके पीछे जहां दो ‘पंथक’ उम्मीदवारों का उभार और अन्य दर्जनों कारण हैं, वहीं एक प्रमुख एवं स्पष्ट कारण देश भर में इस बार नया बना वोट पैट्रन भी प्रतीत होता है। वास्तव में चाहे चुनाव अभियान शुरू होते समय ‘इंडिया’ गठबंधन का कोई रूप दिखाई नहीं दे रहा था, परन्तु जैसे ही 400 पार के नारे को ‘इंडिया’ गठबंधन ने भाजपा के कुछ नेताओं के बयानों के आधार पर इस वृत्तांत में बदला कि भाजपा देश का संविधान बदल देगी तथा चुनावों के पहले चरण में मतदान प्रतिशत काफी कम होने भी यह प्रभाव बनने लगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हराया भी जा सकता है। इस पर देश का मतदाता स्पष्ट रूप में दो भागों में बंट गया, मोदी पक्षीय या मोदी विरोधी। फिर यह कि ये अंतिम चुनाव होंगे, ने भाजपा का नुकसान तो किया ही, परन्तु इस कारण गैर-राजग या गैर-‘इंडिया’ गठबंधन की पार्टियां एक प्रकार से गैर-प्रसांगिक सी हो गईं। यहां तक कि इन पार्टियों का कुछ कॉडर भी मोदी के पक्ष में या विरोध की लड़ाई में शामिल हो गया। सबूत हमारे सामने है।
बसपा दोनों गठबंधनों से बाहर रहने वाली सबसे बड़ी पार्टी थी, जिसने 2019 में सिर्फ 38 सीटों पर चुनाव लड़ कर 10 सीटें जीतीं और 19.4 प्रतिशत वोट लिए, परन्तु अब 2024 में वह कोई कोई सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट प्रतिशत 9.39 रह गया। हालांकि उसने 2024 में 80 सीटों पर चुनाव लड़ा है। आंध्र प्रदेश की वाई.एस.आर. कांग्रेस ने 2019 में 22 सीटें जीती थीं और 49.9 प्रतिशत वोट लिए थे। इस बार वह चार सीटों पर सिमट गई और वोट प्रतिशत भी 39.61 पर आ गया है। ओडिशा में बीजू जनता दल ने 2019 में 43.3 प्रतिशत मतों से 12 सीटें जीती थीं, परन्तु 2024 में एक भी सीट नहीं जीती और वोट प्रतिशत 37.53 रह गया। इसके विपरीत वह इन चुनावों के साथ ही हुए ओडिशा विधानसभा चुनाव में 51 सीटें भी जीता और वहां वोट प्रतिशत भी 40.22 फीसदी प्राप्त किया जबकि 78 विधानसभा सीटें जीतने वाली भाजपा के वोट प्रतिशत 40.07 रहा। तेलंगाना की बी.आर.एस. पार्टी 2019 में 9 लोकसभा सीटें जीती थी और उसका वोट प्रतिशत 41.7 था, परन्तु 2024 में एक भी सीट नहीं जीती तथा उसका वोट प्रतिशत 16.68 ही रह गया।यही हाल पंजाब में अकाली दल का हुआ है। 2019 में उसने 10 सीटों पर चुनाव लड़ कर 27.8 प्रतिशत वोट लिए थे और दो सीटें जीती थीं, परन्तु 2024 में एक ही सीट जीती तथा वोट प्रतिशत 13.42 ही रह गया। ऐसा हाल ही हरियाणा में आईएनएलडी तथा जेजेपी का, असम में एआईयूडीएफ, मेघालय में यूडीपी, मिज़ोरम में मिज़ोरम नैशनल फ्रंट तथा सिक्किम में एसडीएफ पार्टी की भी होआ। शेष गैर-राजग तथा गैर-‘इंडिया’ गठबंधन की अधिकतर पार्टियों का भी यही हाल रहा। टीएमसी ने चाहे ‘इंडिया’ गुट के लिए सीटें नहीं छोड़ी, परन्तु वह स्वयं को लगातार ‘इंडिया’ गुट के साथ बताती रही। इसीलिए वह गैर-प्रासंगिक नहीं हुई।
इस बीच अकाली दल का एक नुकसान यह भी हुआ कि ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता बार-बार प्रचार करते रहे कि अकाली दल चुनाव के बाद भाजपा के साथ ही जाएगा। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा पक्षीय वोट तो ध्रुवीकरण होने के कारण भाजपा को तो पड़ गए, परन्तु अकाली दल समर्थक हिन्दू राष्ट्र विरोधी तथा अकाली दल पक्षीय परम्परागत दलित वोट भी अकाली दल की बजाय कांग्रेस को ओर झुक गया। यहां ‘आप’ की सरकार होने का प्रभाव भी अकाली दल पर पड़ा और निर्दलीय उम्मीदवारों के पंथक उभार ने भी अकाली दल को आघात पहुंचाया। आम आदमी पार्टी के अवसान का भी एक कारण यह माना जा रहा है कि कुछ लोग समझते हैं कि ‘आप’ भी अधिनायकवाद के पक्ष में तथा किसी सीमा तक हिन्दू राष्ट्र के पक्ष की पार्टी है।
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