स्वप्नजीवी लोगों की दुनिया

हम अपनी सपना देखने की क्षमता का निरंतर विस्तार करते जा रहे हैं। अपनी समस्याओं का निदान अब धरती से परे जाकर अंतरिक्ष और पूरे सौर मंडल के विभिन्न ग्रहों में तलाश रहे हैं। स्वप्नजीवी हैं, इसलिए धरती में बेहतर ज़िंदगी से सपने देखते हुए उनके पूरे न होने से परेशान हो गये थे, तो अब ये परेशानी क्या अंतरिक्ष तक टाल देना चाहते हैं? जी नहीं, यह अनर्गल सवाल नहीं है कि जिनका प्रलाप इस धरती पर नहीं अंतरिक्ष तक कर देना चाहते हैं। आज क्या बात कह रहे हो मियां? छक्कन ने भी इसे पूछा है। सदा दूर की कौड़ी लगाते हो क्या?
जी नहीं, दूर क कौड़ी नहीं। आपने सुना नहीं क्या? अपना देश अंतरिक्ष में भी सेना खड़ी कर रहा है। इसरो की कृपा से हमारी अंतरिक्ष खोज बहुत सफल और किफायती रही है। अमरीका और चीन के शोध अभियान से हम कहीं पीछे नहीं! बल्कि उनसे अधिक किफायती हैं। देख लो चांद के दक्षिणी भाग में चन्द्रयान तीन के द्वारा सबसे पहले कौन उतरा, भारत। रूस भी फिसड्डी रह गया। उसका चन्द्रयान तो उतर ही नहीं पाया।
अब चांद पर सम्पदा व्यवसायी अपनी बस्तियां बसाने की अग्रिम घोषणा कर रहे हैं। बुकिंग चालू होने जा रही है। सम्भवत : अतिक्रमण करके अवैध कब्ज़ों वाले दलाल भी अब चाक चौबन्द हो रहे हैं। अवैध काम करवाकर देने वाले दलाल अब चाक चौबन्द हो रहे हैं। देश में सख्ती बढ़ जाये तो वे अपने मुख्यालय विदेश में बनाने लगते हैं। डिजिटल हो जाने के बाद उनकी साइबर अपराधों की ठगी का हाल देख लो। पहले तो उन पर एफ.आई.आर. ही दर्ज नहीं होती। दर्ज हो जाए तो अपराधी गिरफ्त में नहीं आते। ठगी गयी रकम वापस नहीं होती। धंधा खूब चल निकला है। इसका अंतर्राष्ट्रीयकरण तो हो गया।
अब व्यवसायीकरण अंतरिक्ष तक पहुंच गया। चन्द्रयान चार के अभियान में चांद पर खनिज और ऊर्जा की चाह लेकर इसे अपने देश और विश्व के लिए ले आने की सोच रहे हैं, तो क्यों न अपने ठगी के धंधे को भी वहां पहुंचा दें। इसमें भी तो हमारे ठगों ने अभूतपूर्व तरक्की की है। अंतरिक्ष में सैर का सपना देकर हमने अपनी व्यवसाय क्षमता का विस्तार कर लिया। अंतरिक्ष में उपग्रह की स्थापना के बाद पर्यटन क्षेत्र से कमाई का विस्तार हो जायेगा। वैसे भी धरती पर हम पर्यटन और सेवा क्षेत्र से ही अधिक कमाई कर रहे हैं। खेती तो आज भी घाटे का सौदा है। युवा श्रमिक अब इसे भारत में जीने का ढंग नहीं मानते। अधिक कमाई के लिए शहरीकरण की ओर भाग रहे हैं।
लेकिन कौन-सा शहरीकरण, एक तो वह है जो हम डिजटलीकरण, कृत्रिम मेघा और रोबोटों की सहायता से पूंजी गहन व्यक्तियों में कर रहे हैं। इससे तरक्की के साथ रोज़गार की गुंजायश कम हो गयी है। सहकारी, लघु और कुटीर उद्योग भ्रष्ट तत्वों की वज़ह से पनप नहीं पाये। अब अंतर्राष्ट्रीय शोध अभियान का निजीकरण होने जा रहा है। दूसरे विचार में इसी की संभावना को अंतरिक्ष में तलाश लिया जाये। ग्रहों में मानव जीवन की तलाश शुरू हो गयी है। मंगल ग्रह से मानव जीवन होने के सकारात्मक संकेत मिले हैं। क्यों न इस शोध को पूर्ण करके ऐसी सभी असफलताओं को अंतरिक्ष और अन्य ग्रहों तक पहुंचा दिया जाये? जो सफलता हम धरती पर प्राप्त नहीं कर सके, हो सकता है उसे हम अंतरिक्ष में प्राप्त कर लें। दूसरे ग्रहों में मानव जीवन आरोपित करके प्राप्त कर लें। आखिर कहीं तो हमें सफलता मिलेगी।
छक्कन हमारी बातों पर हंसे। बोलें मियां, क्या शेर चिल्ली जैसी बातें कर रहे हो। अपनी धरती, अपनी दुनिया तुम से संभलती नहीं और अब अपनी बेकारी, अपनी महंगाई, अपना भ्रष्टाचार अंतरिक्ष और दूसरे ग्रहों तक पहुंचा इसका अंतर्राष्ट्रीयकरण नहीं ब्रह्मांडीयकरण कर रहे हो?
जी नहीं हम शेख चिल्ली नहीं। जब इस देश को सपनों, घोषणाओं और दावों पर जीने की आदत हो गई है, तो हम तो इस आदत की संतुष्टि अंतरिक्ष और दूसरे ग्रहों तक पहुंचा कर इसे विस्तार दे रहे हैं।
आपने वायवीय सपनों को विस्तार देकर इसका अंतर्राष्ट्रीयकरण किया। हम तो एक कदम आगे जाकर इसका ब्रह्मांडीयकरण कर रहे हैं।
-लो यह एक और शब्द गढ़ लिया। ब्रह्मांडीयकरण
तुम्हारे सपनों की क्या कोई सीमा नहीं। अब तो इनके पूरा कर देने की गारंटी भी देने लगे। बाप न मारी मेंढकी बेटा तीरंदाज़। 
आज मुहावरों और जुमलों में बातें होती हैं। मिथ्या आंकड़ों से इसकी पुष्टि हो जाती है। लोग वायवीय सपने पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। दुनिया भर के सर्वेक्षणों में अपने आपको संतुष्ट जीव हो जाना पाते हैं। 
-यहां तो हम सपने ओढ़ते हैं, बिछाते हैं और यही हमारा जीवन है। इसलिए इनको ब्रह्मांड तक पहुंचा दिया तो क्या गुनाह किया?
हमने देश के उस निरीह यौवन को देखते हुए कहा था जो बरसों रोज़गार दिलाअ दफ्तरों की खिड़कियों के बाहर खड़ा रहा, आजकल उसकी कतारें रियायती राशन की दुकानों के बाहर लगती हैं। उसकी टकटकी राजनैतिक दलों के उन चुनावी एजेंडों की तरफ लगी रहती है, जिनमें उसके लिए बढ़-चढ़कर अनुकम्पा की नित्य नयी घोषणाएं होती हैं।
हम तो देश की तरक्की के इस विरोधाभास पर हैरान भी नहीं हो पाते। एक ओर एक दशक में दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों में पांचवें नम्बर पर हम आ गये। तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के मनसूबे हैं। आज़ादी का शतक पार करेंगे, तो पूरी तरह विकसित देश हो जायेंगे। अपने सांस्कृतिक गौरव के बल पर दुनिया के गुरुदेव, तो कहलाने की लगे, हो सकता है सबको पछाड़ सबसे बड़ी शक्ति बन जायें।
जी हां सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति, जिसके पास कई विश्वस्तरीय रिकार्ड हैं। दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश से सबसे अधिक रियायती राशन देने का रिकार्ड। दुनिया के महाभ्रष्ट लोगों में अपना दर्जा बना रखने का रिकार्ड। देश की आधी आबादी के निठल्ले होने की आदत डालने का रिकार्ड। अनुकम्पा संस्कृति को अनन्त काल तक चलाने का रिकार्ड। अब इतने रिकार्ड बनाकर तो कोई भी फिसड्डी देश गर्व से तन कर खड़ा हो जाए। हम तो इस दुनिया का भाल हैं। वैश्विक हो गये, अब तो ब्रह्मांड में अपनी धमक पहुंचाने के सपने हैं। इन उपलब्धियों पर एक उत्सव तो बनता है, बन्धुवर। 

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