वक्फ संपत्तियों के नियमन हेतु अहम है संशोधन विधेयक

1 अप्रैल 2025 को देश की लोकसभा में पेश हुए वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2025 में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और नियमन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत मिलता है। यह विधेयक जो वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन का प्रस्ताव करता है, लम्बे समय से चली आ रही मांगों और विवादों के जवाब में लाया गया है। इसका उद्देश्य वक्फ बोर्ड की शक्तियों को संतुलित करना, पारदर्शिता बढ़ाना और संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना है। यह लेख इस विधेयक के प्रमुख प्रावधानों, इसके पीछे के उद्देश्यों और इससे उत्पन्न होने वाली बहस पर प्रकाश डालता है।
वक्फ अधिनियम का विकास भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को नियंत्रित करने की एक सतत प्रक्रिया है जो 1913 से शुरू हुई जब ब्रिटिश शासन ने पहला औपचारिक कानून पेश किया, जिसमें वक्फ की परिभाषा दी गई, लेकिन यह सीमित और स्वैच्छिक था। इसके बाद 1923 में पंजीकरण और निगरानी के लिए वक्फ आयुक्त की नियुक्ति जैसे सुधार आए पर कार्यान्वयन कमजोर रहा। स्वतंत्रता के बाद 1954 में एक व्यापक कानून लाया गया, जिसमें केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्ड की स्थापना हुई, जिसने व्यवस्थित ढांचा दिया फिर 1995 में वक्फ बोर्ड को मजबूत शक्तियां, ट्रिब्यूनल और अतिक्रमण रोकने के नियम मिले, हालांकि इसकी असीमित शक्ति की आलोचना हुई। 2013 के संशोधन ने बोर्ड को और स्वायत्तता दी, पट्टे की अवधि बढ़ाई और अतिक्रमण पर सख्ती की लेकिन दुरुपयोग के आरोपों ने 2025 के नए संशोधन की नींव रखी।
वक्फ बोर्ड भारत में मुस्लिम समुदाय द्वारा धार्मिक, शैक्षिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियों का प्रबंधन करता है। देश में लगभग 8.7 लाख वक्फ संपत्तियां हैं, जो 9.4 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली हुई हैं, जिससे यह रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद तीसरा सबसे बड़ा संपत्ति मालिक बन जाता है। हालांकि इन संपत्तियों के प्रबंधन में भ्रष्टाचार, अतिक्रमण और पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दे बार-बार उठते रहे हैं। 2013 में यूपीए सरकार द्वारा किए गए संशोधनों ने वक्फ बोर्ड को व्यापक अधिकार दिए थे लेकिन इन शक्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें भी सामने आईं।वक्फ  (संशोधन) विधेयक, 2024 को पिछले साल अगस्त में पेश किया गया था और इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया था। जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में 14 संशोधनों को मंजूरी दी, जिसके आधार पर 2025 का यह नया विधेयक तैयार किया गया है। 
विधेयक में केंद्रीय वक्फ परिषद व राज्य वक्फ बोर्डों में कम से कम दो गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे समावेशिता बढ़ेगी और निर्णय प्रक्रिया में निष्पक्षता आएगी और वक्फ संपत्तियों के दावों का अनिवार्य सत्यापन होगा। कलेक्टर को सर्वेक्षण का अधिकार दिया गया है और सरकारी संपत्तियों को वक्फ के दायरे से बाहर रखा जाएगा।
बोर्ड में मुस्लिम महिलाओं को शामिल करने का प्रावधान है, जिसे समुदाय के भीतर लैंगिक समानता की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। सभी वक्फ संपत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, जिससे प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी। इसके साथ ही वक्फ बोर्ड का किसी भी संपत्ति को बिना सत्यापन के वक्फ घोषित करने का अधिकार समाप्त किया जा रहा है, जो पहले विवाद का कारण बना था।
केंद्र सरकार का कहना है कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और गरीब मुस्लिम समुदाय, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों को लाभ पहुंचाने के लिए है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, ‘हमारा मकसद वक्फ को आधुनिक और पारदर्शी बनाना है, न कि किसी के अधिकारों का हनन करना।’ सरकार ने सच्चर समिति और अन्य रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि यह कदम लम्बे समय से लंबित सुधारों को पूरा करेगा। वर्तमान व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी और अक्षमता के कारण वक्फ संपत्तियों का लाभ ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा। सच्चर समिति (2006) और अन्य रिपोर्टों में भी इन कमियों को रेखांकित किया गया था। यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं करता, बल्कि प्रशासनिक सुधार के जरिए संविधान के समानता और न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करता है। डिजिटलीकरण और केंद्रीय पोर्टल के जरिए वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन आधुनिक तकनीक के अनुरूप होगा, जिससे निगरानी आसान होगी। अनेक मुस्लिम संगठन और सुधारवादी समूह जो वक्फ बोर्ड में भ्रष्टाचार से परेशान हैं, इस विधेयक का समर्थन करते हैं। 
यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन से देश की अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकता है। इन संपत्तियों का उपयोग स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक केंद्रों के लिए होने से सामाजिक बुनियादी ढांचा मजबूत होगा, हालांकि अतिक्रमण हटाने और सत्यापन की प्रक्रिया से अल्पकालिक आर्थिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जो इन संपत्तियों पर निर्भर हैं। चूंकि वक्फ राज्य सूची का विषय है, अत: केंद्र का यह हस्तक्षेप राज्यों के अधिकारों पर सवाल उठा सकता है। कुछ राज्य सरकारें इसे अपने क्षेत्र में लागू करने का विरोध कर सकती हैं, जिससे केद्र-राज्य संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है।
वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2025 का समुदाय और देश पर प्रभाव बहुआयामी होगा। यह मुस्लिम समुदाय के लिए सुधार और चुनौतियों दोनों का कारण बन सकता है, जबकि देश में राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर बदलाव ला सकता है। यदि इसे संवेदनशीलता और संतुलन के साथ लागू किया जाता है, तो यह वक्फ व्यवस्था को मजबूत कर सकता है, लेकिन गलत प्रबंधन से सामाजिक अशांति भी बढ़ सकती है।
विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम इस विधेयक को संविधान के मूल ढांचे और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ मानते हैं। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे ‘वक्फ संपत्तियों को हड़पने की साज़िश’ करार दिया है। विपक्ष का तर्क है कि गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना और बोर्ड की शक्तियों में कटौती अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला है। वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2025 एक संवेदनशील मुद्दा है, जो धार्मिक स्वायत्तता और प्रशासनिक सुधार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। आज लोकसभा में होने वाली चर्चा से इसके भविष्य की दिशा तय होगी। यह विधेयक न केवल वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को प्रभावित करेगा, बल्कि भारत की सामाजिक और राजनीतिक गतिशीलता पर भी गहरा असर डालेगा।

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