भारतीय कृषि बाज़ार में हस्तक्षेप चाहता है अमरीका
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 27 प्रतिशत जवाबी शुल्क बढ़ाकर भारत को बड़ा झटका दिया है। ट्रम्प ने दूसरे कार्यकाल में मोदी ही नहीं दुनिया को जता दिया है कि उनके लिए ‘अमरीका प्रथम’ अर्थात देशहित से अहम् और कुछ नहीं है। अब यदि कोई रियायत मिलती भी है तो ट्रम्प कृषि उत्पाद का बाज़ार खोलने के बाद ही कुछ छूट दे सकते हैं। ट्रम्प भारत के कृषि क्षेत्र में टैरिफ कम कराना चाहते हैं। ताकि अमरीका के लिए खेती, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों के लिए भारतीय बाज़ार खुल जाए। वर्तमान में भारत अमरीका पर 52 प्रतिशत टैरिफ लगाता है। दरअसल भारत की 70 करोड़ से भी अधिक आबादी कृशि, दूध और मछली व अन्य समुद्री उत्पादन पर आश्रित है। इन उत्पादों से जुड़े लोग आत्मनिर्भर रहते हुए अपनी आजीविका चलाते हैं।
भारत की 70 प्रतिशत अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृशि और उससे जुड़े उत्पाद हैं। अब अमरीका इस परिप्रेक्ष्य में भारत पर व्यापक दबाव बनाकर द्विपक्षीय बातचीत करने का दबाव बना रहा है। अमरीका चाहता है कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाज़ार तो खुले ही उत्पादों पर शुल्क भी कम करे। यदि भारत कोई समझौता करता है तो ब्रिटेन और यूरोपीय संघ भी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के लिए दबाव बनाएंगे। यूरोपीय संघ चीज व अन्य दुग्ध उत्पादों पर शुल्क कटौती की इच्छा जता चुका है। अमरीका के वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक और अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से बातचीत में इन मुद्दों को द्विपक्षीय वार्ता में शामिल करने की बात कही है। किन्तु भारत के लिए कृषि में बाहरी दखल एक संवेदनशील मसला है, क्योंकि हमारे किसान विदेशी पूंजीपतियों से प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2024 में अमरीका का कृषि निर्यात 176 अरब डॉलर था, जो उसके कुल व्यापारिक निर्यात का लगभग 10 प्रतिशत हैं। बड़े पैमाने पर मशीनीकृत खेती और भारी सरकारी सब्सिडी के साथ अमरीका और अन्य विकसित देश भारत को अपने निर्यात का विस्तार करने के लिए आकर्षक बाज़ार के रूप में देखते हैं जबकि भारत अपने कृषि क्षेत्र को मध्यम से उच्च शुल्क की कल्याणकारी योजनाओं के द्वारा संरक्षित किए हुए हैं ताकि अपने किसानों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके। कृषि क्षेत्र को मुक्त बाज़ार बनाने का मतलब है कि आयात प्रतिबंधों और शुल्कों को कम करना। कृषि को बाहरी सब्सिडी वाले विदेशी आयातों के लिए खोलने का अर्थ होगा, सस्ते खाद्य उत्पादों का भारत में आना, यह खुलापन भारतीय किसानों की आय और आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
ऐसा ही दबाव भारत पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने जेनेवा में 2022 में हुई बैठक में बनाया था। यहां तक कि अमरीका और अन्य यूरोपीय देशों ने भारतीय किसानों को दी जाने वाली कृषि अनुवृत्ति (सब्सिडी) का ज़बरदस्त विरोध किया था। ये देश चाहते हैं कि किसानों को जो सालाना छह हजार रुपए की आर्थिक मदद और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने की सुविधा दी जा रही है, भारत उसे तत्काल बंद करे। यही नहीं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश भर के 81 करोड़ लोगों को जो मुफ्त अनाज दिया जा रहा है, उस पर भी आपत्ति जताई थी। देश की करीब 67 फीसदी आबादी को मुफ्त अनाज मिलता है। इस कल्याणकारी योजना पर 1 लाख 40 हज़ार करोड़ रुपए का खर्च सब्सिडी के रूप में प्रति वर्ष होता है, परन्तु भारत ने अपने किसान और गरीब आबादी के हितों से समझौता करने से साफ इंकार कर दिया था। इसे डब्ल्यूटीओ के तय नियमों का खुला उल्लंघन करार दिया गया था, क्योंकि नियमानुसार अनाजों के उत्पादन मूल्य पर 10 प्रतिशत से ज्यादा सब्सिडी नहीं दी जा सकती है। जबकि भारत इससे कई गुना ज्यादा सब्सिडी देता है। दरअसल इन देशों का मानना है कि सब्सिडी की वजह से ही भारतीय किसान चावल, गन्ना, कपास और गेहूं का भरपूर उत्पादन करने में सक्षम हुए हैं। इसी का परिणाम है कि भारत गेहूं व चावल के निर्यात में अग्रणी देश बन गया है। बांग्लादेश, ॒श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, फिलीपींस और नेपाल के अलाव 68 देश भारत से गेहूं आयात करते हैं। भारत दुनिया के कुल 150 देशों को चावल का निर्यात करता है। अमरीका को भारत की यह समृद्धि फूटी आंख नहीं सुहा रही है। किसी भी देष की प्रतिबद्धता विदेशी हितों से कहीं ज्यादा देश के किसान, गरीब व वंचित तबकों की खाद्य उत्पादन और सुरक्षा के प्रति ही होनी चाहिए। लिहाजा नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के समय से ही किसानों के हित में खड़े दिखाई दिए हैं। अतएव 2014 में इसी जेनेवा में डब्ल्यूटीओ के हुए सम्मेलन में नरेंद्र मोदी ने भागीदारी करते हुए॒ ‘समुचित व्यापार अनुबंध’ पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
अमरीका जैसे विकसित देश भारत में किसानों को यूरिया, खाद और बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी का भी विरोध कर रहे हैं। ये देश भारत के मछली पालन और उसके मांस के निर्यात में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी से भी परेशान हैं। मछली पालकों को आर्थिक मदद मिलने से इसके उत्पादन में इजाफा हुआ है और मछली पालक वैश्विक बाजार में मांस-निर्यात की प्रतिस्पर्धा में विकसित देशों के मुकाबले में बराबरी करने लगे हैं। यही कारण है कि अमरीका भारतीय मछुआरों को मिलने वाली सब्सिडी को प्रतिबंधित करना चाहता है।