यूनुस की चीन यात्रा : भारत को सतर्क रहने की ज़रूरत

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति एक गत्यात्मक प्रक्रिया है। यह कभी स्थिर नहीं रहती है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रत्येक फलक पर वर्तमान में परिवर्तन हो रहे हैं। इससे दक्षिण एशिया भी अछूता नहीं है। भारतीय उप-महाद्वीप सम्प्रति संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है। चाहे वह पाकिस्तान के बलूच प्रांत में अलगाववाद हो या नेपाल में राजतंत्र के लिए संघर्ष हो अथवा म्यांमार में लोकतंत्र के लिए विप्लव या फिर बांग्लादेश में अस्थिरता, इन सबने भारत की विदेश नीति को व्यापक तौर पर प्रभावित किया है। 
भारत के प्रधानमंत्री मोदी के वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही भारतीय विदेश नीति ‘पड़ोस प्रथम’ की नीति का अनुपालन कर रही है। भारतीय विदेश नीति सहमति, संवाद, सम्मान एवं सहयोग पर अवलम्बित है, परन्तु दुर्भाग्यवश दक्षिण एशिया में विशेष तौर पर बांग्लादेश में जो माहौल है, उसने भारतीय कूटनीतिज्ञों को विगत 9 माह से उलझा कर रखा है। एक स्थिर पड़ोस किसी भी राष्ट्र की समोन्नति के लिए अनिवार्य है। बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति भारत के भू-राजनीति एवं भू-सामरिकी के लिए नवीनतम चुनौतियां प्रस्तुत कर रही है। हाल ही में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा ने दिल्ली की चिंता को बढ़ा दिया है। यह संभव है कि इससे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में एक नए शक्ति संतुलन पर आधारित एक नया भू-राजनीतिक वातावरण आकार लेगा। प्रश्न यह उठता है कि दक्षिण एशिया का यह परिदृश्य इतनी तेज़ी से क्यों परिवर्तित हो रहा है। इससे बचने के लिए भारतीय विदेश नीति के थिंक टैंक को क्या उपाय करना होगा?
वस्तुत: बांग्लादेश में 5 अगस्त, 2024 को शेख हसीना शासन के पतन के बाद भारी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल देखी गई। 16 वर्षों की सत्ता के अंत ने जुलाई क्रांति को जन्म दिया जिसमें भारी जनहानि हुई और देश की राजनीतिक दिशा बदल गई, हालांकि व्यापक आशाओं के बावजूद बांग्लादेश अब कानून और व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। इस दौरान 1500 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई और हज़ारों घायल हुए। सत्ता से हसीना को बेदखल करने के बाद मोहम्मद यूनुस ने सत्ता सम्भाली। यूनुस के सत्ता में आने के बाद कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ। वहां अल्पसंख्यक समुदाय को निशान बनाया गया तो कभी हसीना समर्थकों के विरुद्ध ऑपरेशन डेविल हंट जैसे हथकंडे अपनाये गए।  
महत्वपूर्ण यह भी रहा कि जिस पाकिस्तान के अत्याचारों से बचने के लिए भाषा के आधार 1971 में एक स्वतंत्र देश के रूप में बांग्लादेश अस्तित्व में आया था, उसी पाकिस्तान के साथ वहां की अंतरिम सरकार गलबहियां करती नज़र आ रही है। अंतरिम सरकार के प्रमुख यूनुस का इस्लामाबाद के प्रति झुकाव नई दिल्ली के लिए बेहद चिंताजनक है। वस्तुत: बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास पर नज़र डाली जाए तो विदित होता है कि बी.एन.पी. का झुकाव इस्लामाबाद के प्रति रहा है, परन्तु जुलाई क्रांति के पहले लगभग दो दशकों तक शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सत्ता में रही। चूंकि सत्ताच्युत होने के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली, इस कारण अंतरिम सरकार की कुटिल दृष्टि भारत की ओर है। भले ही पाकिस्तान के प्रति अपने सम्बन्धों को लेकर मोहम्मद यूनुस मुखर हों, लेकिन विगत एक माह में बदलते वैश्विक परिवेश ने उन्हें भारत से वार्ता करने के विषय में सोचने के लिए विवश किया है। यही कारण है कि मोहम्मद यूनुस और उनका प्रशासन विगत कुछ दिनों से अनवरत प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के लिए आतुर रहा है, परन्तु भारत की तरफ  से अब तक कोई सार्थक जवाब नहीं मिलने के कारण यह अधर में लटक गया है। उधर मोहम्मद यूनुस ने चार दिन की चीन की यात्रा की है। बांग्लादेश की तरफ  से यह कहा जा रहा है कि चूंकि भारत से समय मांगा गया था, लेकिन उचित जवाब नहीं मिलने के कारण मोहम्मद यूनुस को चीन की यात्रा करनी पड़ी है जबकि सच्चाई यह है कि मोहम्मद यूनुस ने ‘बोआओ फोरम फॉर एशिया’ कार्यक्रम में भाग लेने हेतु पूर्व में ही चीनी यात्रा का निर्णय ले लिया था। जो कुछ भी हो, यह यात्रा भारतीय दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है।  
चीन की चार दिवसीय यात्रा पर 26 मार्च को हैनान पहुंचने के बाद यूनुस ने ‘बोआओ फोरम फॉर एशिया’ वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लिया था। इसके बाद यूनुस 27 मार्च को बीजिंग पहुंचे जहां चीनी उप-विदेश मंत्री सुन वेइदोंग ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। वास्तव में मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा का मकसद ‘बोआओ फोरम फॉर एशिया’ वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेना नहीं था वरन इसका उद्देश्य शी जिनपिंग से मुलाकात थी। यद्यपि चीन के लिए बांग्लादेश आर्थिक दृष्टि (कुल व्यापार लगभग 17 बिलियन डॉलर का है) से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है, किन्तु भू-रणनीति के लिहाज से काफी अहम है। कदाचित यही कारण रहा कि चीन ने बांग्लादेश में इतनी दिलचस्पी दिखाई है। इस यात्रा में दोनों देशों के मध्य एक समझौता और 8 समझौता ज्ञापन (एम. ओ. यू.) हुए। इनमें से मोंगला पोर्ट एवं चटगांव में चीनी आर्थिक एवं औद्योगिक क्षेत्र (सी.ई.आई.जेड) विकसित करने के लिए चीनी कम्पनियों के काम करने पर सहमति बनी। साथ ही तीस्ता नदी को लेकर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एण्ड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट पर सहमति बनी है। इसी यात्रा के दौरान बांग्लादेश ने चीन से 2028 तक मुफ्त व्यापार करने की छूट हासिल कर ली है। अगर इस यात्रा के उद्देश्यों की पड़ताल की जाए तो विदित होता है कि चीन ने भू-राजनीति एवं भू-रणनीति के दृष्टिगत बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ अपने सम्बन्धों को बेहतर करने का यत्न किया है। मोंगला पोर्ट को लेकर चीन की दिलचस्पी कदाचित इस कारण है क्योंकि यहां से कोलकाता पोर्ट की निगरानी करना सरल हो जाएगा। तीस्ता के जरिए चीन सिलीगुरी गलियारे के निकट आ जाएगा। यह भारतीय दृष्टिकोण से चिंताजनक है। 
भारत को बांग्लादेश के प्रति फिलहाल दो तरह की नीतियों को अपनाने की ज़रूरत है। पहली, बांग्लादेश में चुनाव होने की प्रतीक्षा करे और यह कामना करे कि वहां एक मज़बूत लोकतांत्रिक और अपने अनुकूल सरकार का गठन हो और दूसरी, चीन के बांग्लादेश में बढ़ते हस्तक्षेप के दृष्टिगत अपने राष्ट्रीय हित एवं संप्रभुता को ध्यान में रखकर सिलीगुरी गलियारे के साथ ही अपने भौगोलिक स्थिति का विस्तार करे। जब तक भारत अपनी नीति में यथार्थवादी सिद्धांत का समन्वय नहीं करेगा, तब तक उसे इस प्रकार की स्थिति से रूबरू होना पड़ता रहेगा। भारतीय थिंक टैंक को भू-राजनीति को देखते हुए कठोर निर्णय लेने के लिए उद्यमशील होना पड़ेगा वरना वह दिन दूर नहीं जब हमें श्रीलंका, मालदीव एवं पाकिस्तान की भांति बांग्लादेश में भी चीन की उपस्थिति का आभास हो। (युवराज)

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