आर.एस.एस.के सौ वर्ष किस तरह की विचारधारा वाला है यह संगठन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसके बारे में यह कहा जाता है कि यह राजनीति में कदम रखने की इच्छा रखने वालों के लिए एक पाठशाला है। जहां तक स्वतंत्रता संग्राम की बात है तो उसमें जहां एक ओर बलिदानियों और अपना सर्वस्व अर्पण करने वालों की अमर कहानियां हैं, देश की आज़ादी के लिए सब कुछ न्योछावर करने की प्रेरणा है, वहां ऐसे संगठनों का निर्माण भी है जिनका उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करना रहा है।
आज़ादी की लड़ाई में सभी धर्मों और वर्गों के लोग भाग ले रहे थे और लक्ष्य यही था कि जैसे भी हो, भारत आज़ाद हो। ऐसे में दो सहपाठी भी रहे थे, उन्हें लगभग एक जैसा ही विचार आया। एक थे केशव बलिराम हेडगेवार और दूसरे थे एन एस हार्डिकर। वे स्वतंत्रता सेनानी तो थे ही, लेकिन इसके साथ ही उनकी सोच में आया कि आज़ाद होने के बाद देश को एकसूत्र में बांधकर रखने के लिये भी कोई व्यवस्था होनी चाहिए। इसे लेकर हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शुरुआत महाराष्ट्र में नागपुर से की और हार्डिकर ने हिंदुस्तान सेवा दल का गठन धारवाड़, कर्नाटक से किया। दोनों ही कांग्रेसी थे लेकिन हेडगेवार पर सावरकर और हार्डिकर पर गांधी तथा नेहरू का प्रभाव था। दोनों एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण होते हुए देखना चाहते थे जिसका चरित्र भारतीयता का प्रतीक हो। आरएसएस के मूल में हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की कल्पना थी और सेवा दल कांग्रेस का अनुगामी बनाए धर्म को लेकर उसका कोई पूर्वाग्रह नहीं था।
आरएसएस के लिए एक ऐसे देश का निर्माण करना उसका लक्ष्य था जिसमें अखंड भारत की कल्पना को साकार किया जा सके। गोरक्षा अनिवार्य है और इसके लिए सर्वस्व बलिदान किया जा सकता है। गाय हिंदुओं के लिए पूज्य हमेशा से रही है। इसे माता स्वरूप मानकर रक्षण करने को हिंदू धर्म की विशेषता कहा गया। गाय का पालन पोषण तथा इसकी रक्षा करना हर हिंदू का कर्त्तव्य भी है और दायित्व भी।
संघ परिवार में हिंदू महासभा, बजरंग दल, विद्या भारती, राष्ट्र सेविका समिति और विद्यार्थी परिषद जैसे संगठन सम्मिलित हो गए। उद्देश्य यही कि भारत की कल्पना एक हिंदू राष्ट्र के रूप में की जाए और हिंदुत्व का प्रचार प्रसार करने के लिए जो भी आवश्यक हो, वह किया जाना चाहिए। संघ की शाखाओं में जाना अनिवार्य और निर्धारित वर्दी पहननी तथा रक्षा के प्रतीक के रूप में लाठी रखनी होगी। राष्ट्र वंदना और देश की रक्षा का प्रण इसका आवश्यक अंग हैं, चरित्र निर्माण के लिए सभी प्रकार के व्यसनों से दूर रहने की शिक्षा ताकि मन, वचन और कर्म से जीवन में शुद्धता रहे ताकि समाज में व्याप्त कुरीतियों से लड़ा जा सके।
सन् 1923 में नागपुर में हुए हिंदू मुस्लिम दंगों को आरएसएस की नींव कहा जा सकता है। यह सोच बनी कि यदि हिंदू कमज़ोर होगा तो वह किसी से भी हार सकता है, उसे कोई भी दबा सकता है, कुचल सकता है और दास बना सकता है। महर्षि अरविंदों और वीर सावरकर का प्रभाव सबसे अधिक पड़ा। माना गया कि मुट्ठी भर अंग्रेज़ भारत पर शासन कर सकते हैं तो इसका एक ही अर्थ है कि हिंदू कमज़ोर है, शक्तिशाली बनकर ही अंग्रेज़ों से मुक्त हुआ जा सकता है, अब क्योंकि मुसलमान उनके लिए आक्त्रांता थे, इसलिए उनका भरोसा नहीं किया जा सकता। आरएसएस ने गांधी जी द्वारा मुसलमानों के साथ सहयोग और सहमति का विरोध करने की नीति अपनाई। उसके नेतृत्व को लगता था कि एक बार अंग्रेज़ के साथ सहयोग किया जा सकता है, लेकिन मुसलमानों के साथ बिलकुल नहीं। तर्क यह था कि अंग्रेज़ भारत में बसने के इरादे से नहीं बल्कि यहां से धन संपत्ति लूटकर अपने देश ले जाने के लिए आए थे जबकि मुसलमान आये तो लुटेरों की तरह थे, लेकिन यहां बसने का इरादा कर लिया और इसके लिए लोगों को सहमति या जबरन मुसलमान बनाना और हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को ढहाकर मस्जिद निर्माण करना शुरू कर दिया। यह कुछ ऐसी भावना थी जिसने आरएसएस द्वारा अंग्रेज़ों का साथ देने में भी कोई बुराई नहीं समझी। अनेक ऐसे अवसर आए जब यह सुनिश्चित किया गया कि गणेश पूजा या लक्ष्मी पूजा के लिए जो शोभा यात्रा निकाला जाए वह मस्जिद के सामने ढोल ताशे बजाए जाते। यह मुसलमानों के सामने याशक्ति प्रदर्शन था।
जब भारत का संविधान लागू हुआ तो उससे भी आरएसएस की असहमति थी। इसका कारण यह कहा गया कि इसमें मनु का न उल्लेख है और न ही मनुस्मृति के अनुसार इसे बनाया गया। इसलिए यह हिंदू राष्ट्र की कल्पना के विपरीत है। हालांकि बाद में यही संविधान आरएसएस को भी स्वीकार करना पड़ा क्योंकि तब तक सभी धर्मों को बराबरी देने की बात ज़ोर पकड़ने लगी थी।
आरएसएस चाहे कुछ भी हो, देश विरोधी नहीं है। आरएसएस ऐसा संगठन है जिसकी मदद के बिना भारत में आपदा प्रबंधन और राहत कार्यों का संचालन करना आसान नहीं है। जिस सेवा भावना के साथ आरएसएस के लोग सहायता करते हैं उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। यह उनके कठोर अनुशासन और व्यवहार का परिणाम है कि विरोधी भी उनकी प्रशंसा करते हैं।