ट्रम्प और अन्तर्राष्ट्रीय भाईचारा

नए अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 20 जनवरी को शपथ ग्रहण की थी। इससे पहले चुनावों के दौरान और अब बाद में अढ़ाई महीने की अवधि में ही उन्होंने एक तरह से दुनिया के रंग-ढंग ही बदल दिए हैं। दशकों से चली आ रही अपने देश की अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों को शुरू से ही बदल दिया है। दुनिया भर की अपनी ज़िम्मेदारियों से किनारा कर लिया है। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मंच की चिन्ता नहीं की। संयुक्त राष्ट्र को टिच जाना है। उनकी दुनिया भर में करोड़ों ही ज़रूरतमंद लोगों और दर्जनों ही देशों में जन-कल्याण हेतु चलाई जा रही योजनाओं को टिच जान कर इन सभी को दी जा रही सहायता बंद करने की घोषणा कर दी है। विश्व के देशों की चिन्ता बनी वैश्विक तपिश के संबंध में उन्होंने बनाई जा रही योजनाओं से भी किनारा कर लिया है। 
अमरीका को पहले स्थान पर लाने या अमरीका को पुन: महान बनाने के लिए उन्होंने विश्व भर के देशों के ़ख़फा होने की परवाह नहीं की। यूरोपीयन यूनियन के साथ मिल कर चलने से भी एक तरह से आंखें फेर ली हैं। ट्रम्प स्वयं एक बहुत बड़े पूंजीपति और व्यापारी हैं। उन्होंने आपसी अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों को भी इस दृष्टि से ही देखना शुरू कर दिया है और इसके अनुसार ही नई नीतियों की घोषणा की गई है। ट्रम्प का कहना है कि वह जवाबी टैरिफ (टैक्स) लगाएंगे। यदि बाहरी देश अमरीकी वस्तुओं के आयात  पर बड़े टैरिफ लगाते हैं तो वह भी जवाबी टैक्स लगाने से नहीं हिचकिचाएंगे। अब तो उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। अपने पड़ोसी कनाडा और मैक्सिको के साथ ऐसी बातों के कारण ही पिछले महीने से उनके बीच तनाव चल रहा है। अपनी नई घोषणा में उन्होंने मौजूदा समय में इन दोनों देशों को तो बख्श दिया है, परन्तु उनके अतिरिक्त उन्होंने अपने मित्र या विरोधी देशों को व्यापारिक मामले में नहीं बख्शा। लगभग 60 देशों पर उन्होंने नए टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इनकी दर भिन्न-भिन्न है। अलग-अलग देशों पर उन्होंने विभिन्न तरह के टैक्स लगाने की घोषणा किस आधार पर की है, इस संबंध में अभी विस्तारपूर्वक जानकारी सामने नहीं आई। उदाहरणत:  भारत की ज्यादातर निर्यात होने वाली वस्तुओं पर उन्होंने पहले 26 प्रतिशत, फिर बाद में 27 प्रतिशत टैक्स लगाने की घोषणा की है और साथ यह भी कहा है कि भारत अमरीकी वस्तुओं पर उच्च आयात टैक्स वसूलता है। उनके अनुसार इस समय इनकी दर 52 प्रतिशत है, परन्तु अमरीका ने ‘मेहरबानी’ करके भारत की कई आयातित वस्तुओं पर इसके मुकाबले में 27 प्रतिशत ही टैक्स लगाया है। इसके मुकाबले में उन्होंने चीन पर 34 प्रतिशत, थाइलैंड जैसे अपने भागीदार देश पर 37 प्रतिशत, बंगलादेश पर 37 प्रतिशत और आर्थिक संकट में घिरे श्रीलंका पर 44 प्रतिशत और स्विट्ज़रलैंड जैसे निष्पक्ष नीति धारण करके बैठे देश पर 32 प्रतिशत आयात टैक्स लगाने की घोषणा की। यूरोपीयन यूनियन  जिसमें दर्जनों देश शामिल हैं, इनमें ज्यादातर देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीका के साथ सैनिक संधि नाटो द्वारा जुड़े रहे हैं। इन देशों पर उन्होंने अन्य के मुकाबले सिर्फ 20 प्रतिशत ही टैक्स लगाया है। जहां तक भारत का संबंध है, इसके लिए एक तो यह घोषणा इसलिए बड़ी चिन्ता का कारण बनी दिखाई दे रही है क्योंकि कारों और कारों के पुर्जों और रैडीमेड कपड़ों, टैलीकॉम के सामान के अतिरिक्त हीरे और आभूषण एवं रिफाइंड पैट्रोलियम की आयातित वस्तुओं पर एकाएक इतना बड़ा टैक्स लगाने से एक बार तो इनसे संबंधित कम्पनियों और संस्थानों पर बड़ी गाज गिरती दिखाई देती है, इनकी आर्थिकता पर अनिश्चितता के बादल दिखाई देने लगे हैं। 
भारत ने चीन और कई अन्य देशों की भांति ट्रम्प की ऐसी घोषणा पर शीघ्र अपनी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी पिछली लम्बी अवधि से ट्रम्प के साथ दोस्ती का दम भरते रहे हैं। फरवरी महीने में दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक आपसी व्यापार को दोगुना करने का संकल्प प्रकट किया था और इसे 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा था, परन्तु अब नए हालात में इस संकल्प का क्या बनेगा, इस संबंध में सुनिश्चित तौर पर कुछ कहना कठिन है। ट्रम्प की घोषणा से विश्व भर के अलग-अलग देशों पर किस तरह का और कितना प्रभाव पड़ेगा, इस संबंध में मौजूदा समय में कुछ नहीं कहा जा सकता, परन्तु इसके साथ यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा शुरू किए गए इस व्यापारिक युद्ध में अमरीका की आर्थिकता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। ज्यादातर अर्थ-शास्त्रियों ने यह आशंका प्रकट की है कि इससे बाहर से आयात कम होने से वहां महंगाई बढ़ेगी और इसका आर्थिकता पर भी दबाव बन सकता है। वैश्विक स्तर पर भी सभी देशों को अपनी व्यापारिक और अन्तर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान की नीतियों में अपनी समर्था और सोच के अनुसार बड़ा बदलाव करना पड़ेगा। यह आश्चर्यजनक बात नहीं होगी कि यदि भारत और चीन जिनके संबंध अभी तक भी तनावपूर्ण बने रहे हैं, भी अपने व्यापारिक आदान-प्रदान में और भारी वृद्धि करने की नीति को प्राथमिकता देने लगें परन्तु पहले ही आर्थिकता की ज़द में आए छोटे देशों की नि:संदेह ट्रम्प की नीतियों के कारण और भी समस्याएं बढ़ सकती हैं, परन्तु इस माहौल में यह बात भी स्पष्ट होती दिखाई देती है कि ट्रम्प की ऐसी नीतियों से अमरीका अन्तर्राष्ट्रीय भाईचारे से एक बार फिर से अलग-थलग ज़रूर हो जाएगा।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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