बैंकॉक सम्मेलन के प्रभाव

इस समय दुनिया में जिस तरह का माहौल बनाया जा चुका है, जिस तरह लम्बे समय तक चले दो युद्धों में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं, जिस तरह अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक तरह से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार युद्ध शुरू कर दिया है, जिस तरह चीन और पाकिस्तान ने साथ मिल कर भारत को कई तरह की चुनौतियां दे रखी हैं, जिस तरह भारत के कुछ पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में कड़वाहट आई हुई है, उस समय थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में बिम्सटेक देशों का सम्मेलन महत्त्वपूर्ण है। यह संस्था बंगाल की खाड़ी से संबंधित देशों की है। इसकी स्थापना 1997 में की गई थी। मौजूदा समय में इसमें भारत, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, थाइलैंड, नेपाल और श्रीलंका आदि शामिल हैं।
 इसका कार्यालय बांग्लादेश की राजधानी ढाका में है। यह कार्यालय लगातार इन सभी देशों के सम्पर्क में रहता है। कुछ वर्षों के अंतराल में  इन देशों के प्रमुखों के सम्मेलन लगातार होते रहते हैं। अभी-अभी बैंकॉक में इसका 6वां शिखर सम्मेलन हुआ है, जिसमें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के अतिरिक्त थाइलैंड की प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस, श्रीलंका के प्रधानमंत्री हरीनी अमरासूरिया, म्यांमार के सैन्य नेता जनरल मिन आंग हलैंग और भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टेबगय शामिल हुए हैं। दो दिवसीय यह सम्मेलन इस कारण भी महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत के साथ इसके संबंध तनावपूर्ण हैं। श्रीलंका में भी भारी विद्रोह के बाद हुए चुनावों में नई सरकार बनी है। म्यांमार में सेना ने निर्वाचित सरकार को हटा कर अपना कब्ज़ा किया हुआ है। भारत इस क्षेत्र का बड़ा देश है। इस संगठन के लिए खर्च भी बड़ी सीमा तक लगभग 32 प्रतिशत भारत ही करता है, परन्तु इस सभी के बावजूद इस दो दिवसीय सम्मेलन को कई पक्षों से सृजनात्मक और नया माहौल बनाने वाला कहा जा सकता है। विगत अवधि में बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने चीन के साथ अपनी निकटता दिखाते हुए भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के संबंध में कहा था कि सिलीगुड़ी गलियारा जिसे ‘चिकन नैक’ भी कहा जाता है, भारत के लिए एक ऐसा स्थान है जहां से उसका उत्तर-पूर्वी हिस्सा अलग हो सकता है। भारत ने इस बयान पर कड़ा आपत्ति प्रकट की थी। बांग्लादेश के साथ भारत का तीस्ता नदी के पानी संबंधी भी विवाद चल रहा है। भारत की ओर से सीमा पार से आते बांग्लादेशी शरणार्थियों संबंधी भी आपत्ति प्रकट की जाती रही है। जब बांग्लादेश की नई सरकार पिछले अगस्त के महीने में वहां उठे विद्रोह के बाद बनी तो शेख हसीना के भारत में आने के बाद बांग्लादेश अब उसे वापिस भेजने की मांग कर रहा है। इस बैठक के दौरान अलग तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मोहम्मद यूनुस की इन मामलों के संबंध में बातचीत हुई है। भारत के प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश में रहते हिन्दुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ किए जा रहे व्यवहार पर भी आपत्ति प्रकट करते हुए मोहम्मद यूनुस को इस स्थिति को सम्भालने के लिए कहा। इस सम्मेलन के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय श्रीलंका की यात्रा को भी इसलिए अर्थपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नई सरकार, नए हालात में चीन की ओर अधिक झुकते हुए प्रतीत होती है जबकि इस देश का पड़ोसी होने के कारण भारत के साथ इसके संबंध सदियों से अच्छे बने आ रहे हैं। 
आज भारत के समक्ष अनेक चुनौतियां दरपेश हैं। इस समय बिम्सटेक देशों के सम्मेलन में हुआ विचार-विमर्श बंगाल की खाड़ी के साथ लगते सभी देशों के लिए अच्छे प्रभावों वाला सिद्ध हो सकता है क्योंकि इन सभी देशों के भारत के साथ हर तरह के संबंध किसी न किसी रूप में सदियों से ही अटूट बने रहे हैं, यदि ये देश आपसी मतभेद भुला कर विकास और स्थिरता के लिए आपसी सहयोग बढ़ाते हैं तो क्षेत्र के सभी देशों को इसका लाभ मिल सकता है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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