असली ज्ञान
मयूर शहर में एक सुंदर बगीचा था। उसमें बहुत सी तितलियां रहती थीं। उनमें एक लबली नाम की तितली थी। वह बहुत सुंदर थी। उसे अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड था। वह किसी से बात नहीं करती थी। बात करती भी तो वह अकड़ कर करती। इसलिए उसकी सहेलियां भी उससे बात करना पसंद नहीं करती थीं।
एक दिन लबली बगीचे में खिले फूलों को देखकर प्रसन्न हो रही थी। वह खुशी में कभी इधर कभी उधर उड़ती-मंडराती, कभी फूल पर बैठकर उसका रस पीने लगती तो कभी आसमान में उड़ जाती। इस बीच एक भौंरा आकर मधुर गुंजन करने लगा। उसका नाम था श्यामसुंदर। श्याम सीधे-सादे स्वभाव का था। श्याम ने सोचा क्यों न लबली से दोस्ती की जाये। क्योंकि यहां बहुत से फूल खिले हैं। बगीचा भी काफी बड़ा है। रोजाना आकर यहां फूलों पर बैठकर रसपान करेंगे। उसने तितली से पूछा तुम कहां रहती हो। तुम्हारा नाम क्या है?
लबली मुंह चिढ़ाती हुई बोली-‘क्यों क्या काम है, मैं इसी बगीचे में रहती हूं। मेरा नाम तो लबली है। तुम तो काले कलूटे हो मुझसे बात करने में तुमको शर्म नहीं आती।’
यह सुनकर श्याम सुंदर भौंरे को बहुत बुरा लगा। वह बोला-‘लबली तुम बहुत सुंदर हो, तुम्हें सुंदर होने की वजह से अच्छे ढंग से बात करनी चाहिए ताकि तुम्हारे सुंदर रुप की गरिमा रह सके। ईश्वर भी प्रसन्न रहे। ईश्वर ने दोनों को बनाया है। तुम्हें सुंदर और मुझे श्याम। इसलिए तुम्हें घमंड नहीं करना चाहिए। लबली भगवान श्रीकृष्ण भी श्याम रंग थे। उनकी बंशी की धुन सुनकर गोपियां और ग्वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे और गईयां और बछड़े उनकी मधुर बंशी की ध्वनि से पास आकर आनंदित हो जाते थे। इसलिए लबली तुम मुझे बदसूरत न समझो। मेरे भी मृदु गुंजन सुनने के लिए अच्छे-अच्छे बड़े-बड़े लोग तरसते रहते हैं। हर किसी में कुछ न कुछ गुण अवश्य होता है इसलिए रुप को नहीं उसके गुणों को देखकर उसकी पहचान करनी चाहिए। मैं तो तुमसे दोस्ती करने आया था। ताकि हम दोनों एक-दूसरे के संकट में काम आ सकें। इतना कहकर श्यामसुंदर चला गया।’
कुछ दिन बीतने के बाद गर्मी का मौसम आया। तेज़ आंधी चलने लगी। धूप भी बहुत तेज़ हो गयी। बगीचे के फूल भी सूख गये। लबली चिंतित रहने लगी। उसे एक दिन बुखार आ गया। उसका शरीर भी फीका पड़ गया। एक पौधे के नीचे पड़ी-पड़ी रो-रोकर सांसें भर रही थीं। उसके पास कोई नहीं था। उसे अकेलापन बहुत बुरा लग रहा था। तब तक उड़ता-उड़ता भौंरा श्यामसुंदर फिर आ गया। उसने लबली को देखा तो बाला-‘अरे लबली यह तुमने कैसी हालत बना रखी है? तुम्हारे पास तो कोई सहेली भी नहीं है।’
लबली बोली-‘श्याम तुमने उस दिन ठीक ही कहा था कि सुंदर रुप होकर घमण्ड नहीं करना चाहिए। मैंने घमण्ड किया था इसलिए मुझे अकेलेपन की सजा मिली है। मुझसे कोई मिलने नहीं आता। सभी सहेली देख-देखकर हंसती हुई चली जाती है कहती हैं कि अच्छा हुआ लबली बीमार हो गयी है। बहुत अकड़कर बात करती थी। अब मैं कसम खाती हूं कि सबके साथ अच्छा व्यवहार करुंगी और सबके साथ मिलकर रहूंगी।’
श्यामसुंदर भौंरे ने कहा-‘यह बात है कि असली ज्ञान स्वयं के अनुभव से ही होता है।’ और फिर श्याम और लबली उसी बगीचे में हिल-मिलकर रहने लगे। लबली की सहेलियां भी अब उसके साथ हंस-हंसकर बातें करने लगी और फिर सभी मिल-जुलकर रहने लगी। (सुमन सागर)



