डोनाल्ड ट्रम्प की कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग के सबक

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कथित ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीतिक रणनीति, विशेष रूप से टैरिफ और क्षेत्रीय दावों के माध्यम से उनके मित्र देश रह रह कर परेशान हो उठते हैं। जबकि अमरीका के शत्रु देश उनको आंख दिखाकर अपनी मनवाने से भी नहीं चूकते, खासकर चीन, रूस और ईरान जैसे दबंग देश। इससे जहां वैश्विक कूटनीति चौराहे पर खड़ी प्रतीत होती है, वहीं उनकी ढुलमुल नीति व्यापार को गहराई से प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि यूरोपीय देश, जापान, भारत आदि अंदर से बेचैन हैं। सच कहूं तो राष्ट्रपति ट्रम्प का यह अव्यवहारिक व मतलबपरस्त रुख आर्कटिक सुरक्षा, नाटो एकता और बहुपक्षीय व्यापार नियमों को खुली चुनौती दे रहा है। 
सबसे पहले इसी कसौटी पर यूरोप व नाटो देशों से जुड़े ग्रीनलैंड विवाद को समझते हैं, जहां ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को अमरीका में मिलाने की मांग क्या रख दी, उनके इस अटपटी सोच से उनके मित्र भी बौखलाहट दिखाने लगे। जिससे परेशान अमरीका ने सहयोगी से विरोधी बन रहे आठ यूरोपीय देशों (डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी आदि) पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जो जून 2026 तक 25 प्रतिशत हो सकता है। यही वजह है कि यूरोपीय नेता जैसे स्वीडन के पीएम उल्फ क्रिस्टर्सन और नीदरलैंड्स के विदेश मंत्री डेविड वैन वील ने सहयोग की बजाये संवाद पर जोर देते हुए इसे स्पष्ट ‘ब्लैकमेल’ करार दिया। वहीं, नाटो प्रमुख मार्क रुटे ने ट्रम्प से बातचीत की पुष्टि की, लेकिन आर्कटिक क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका जताई।  जहां तक चीन-अमरीका व्यापार युद्ध की बात को इस ब्लैकमेलिंग वाली कसौटी पर कसें तो प्रतीत होता है कि साल 2025 में ट्रम्प द्वारा चीन पर 104 प्रतिशत टैरिफ लगाने को चीन (बीजिंग) ने खुलकर ‘ब्लैकमेलिंग’ बताया और अंत तक लड़ने का वादा किया। चीनी पीएम ली कियांग ने इसे संरक्षणवाद का उदाहरण माना, और प्रतिक्रिया स्वरूप यूरोपीय संघ के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही। इससे वैश्विक शेयर बाजारों में मंदी की आशंका बढ़ी, क्योंकि अमरीका ने 70 देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लागू किए।
वहीं ट्रम्प की ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति का वैश्विक प्रभाव भी साफ दिख रहा है, क्योंकि उनकी इस रणनीति से नाटो जैसे गठबंधनों में दरार डाल पड़ने लगी है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता के संकेत भी मिलने लगे हैं, क्योंकि 1 फरवरी 2026 की डेडलाइन नज़दीक है। यूरोप ने आपात बैठक बुलाई, जबकि भारत जैसे देश भी 26 प्रतिशत से 50 प्रतिशत टैरिफ का सामना कर रहे हैं। इससे इनकी बेचैनी समझी जा सकती है। कुल मिलाकर ट्रम्प की ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति सिर्फ अमरीका-प्रथम नीति को प्राथमिकता देती है, लेकिन इससे बहुपक्षीय संस्थाओं के कमजोर होते चले जाने की आशंका भी निराधार नहीं है। 
देखा जाए तो अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की नीतियां नाटो पर दबाव बढ़ा रही हैं, खासकर ग्रीनलैंड विवाद और रक्षा खर्च मांग के माध्यम से। इसके वैश्विक दुष्प्रभाव या असर को समझते हुए ही अमरीका ने पश्चिमी गोलार्द्ध में खुद को मजबूत करने के लिए वेनेज़ुएला सम्प्रभुता तहस नहस कांड जैसा दुस्साहस दिखाया। इससे रूस, चीन, भारत, ईरान की फटी पड़ी पैबंद भी सामने आ गई। यह सबकुछ इसलिए किया गया ताकि ‘अमरीका फर्स्ट’ दृष्टिकोण को और अधिक मजबूत किया जा सके। अमरीका की यह खुली पहल उसके नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन की एकता को दो टूक चुनौती दे रही है लेकिन कुछ नाटो सदस्यों ने जिस तरह से अपना रक्षा बजट बढ़ाया है, उससे ट्रम्प का मनोबल बड़ा है। जहां तक ग्रीनलैंड संबंधी तनाव की बात है तो ट्रम्प की ग्रीनलैंड अधिग्रहण जैसी अव्यवहारिक मांग का विरोध होने के बाद अमरीका ने डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी जैसे नाटो सदस्यों पर भी 10 प्रतिशत टैरिफ लगाए, जो 25 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं। जबकि यूरोपीय देशों ने आर्कटिक में सैन्य तैनाती बढ़ाई, जबकि ट्रम्प ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया। इस पर नाटो प्रमुख मार्क रुटे ने ट्रम्प से बातचीत की लेकिन विशेषज्ञ इसे गठबंधन के ‘सबसे काले घंटे’ की संभावना मानते हैं। 
जहां तक नाटो देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने संबंधी अमरीकी दबाव की बात है तो ट्रम्प ने सदस्य देशों से जीडीपी का 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने की मांग की, जो पहले 2 प्रतिशत के वेल्स वादे से दुगुने से भी ऊपर है। उनके दावे के अनुसार इस दबाव से खर्च बढ़ाए लेकिन यूरोप को अमरीकी सुरक्षा ‘ब्लैंक चेक’ बंद करने की चेतावनी दी। इससे यूरोपीय नेता नाराज़ हैं, जो नाटो विस्तार (जैसे यूक्रेन) रोकने का संकेत भी देता है। जहां तक ट्रम्प के ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति के संभावित प्रभाव की बात है तो इस बात में कोई दो राय नहीं कि उनकी ये नीतियां नाटो में दरार पैदा कर सकती हैं, और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को कमजोर करेंगी। 
यही वजह है कि अमरीकी संसद में नाटो से निकासी के विधेयक आए हैं, हालांकि तत्काल विदड्रॉल नहीं हुआ। कुल मिलाकर लेन-देन वाली कूटनीति गठबंधन की विश्वसनीयता को खतरे में डाल रही है। जबकि अमरीकी सोच है कि यूरोप की गफलत में फंसकर रूस और एशिया की चकरघिन्नी में फंसकर चीन से खुली दुश्मनी लेने से बेहतर है कि खुद को पश्चिमी गोलार्द्ध यानी उत्तर अमरीका व दक्षिण अमरीका के देशों के बीच महफूज रखो और यहां पर यूरोपीय/एशियाई देशों की दाल नहीं गल सके, इस हेतु वेनेज़ुएला जैसी अप्रत्याशित कार्रवाई करते रहो। (एजेंसी)

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