बच्चे पढ़ाई से जी क्यों चुराते हैं ?
शिक्षा का हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण योगदान है। वैसे भी आजकल के जमाने में आगे बढ़ने के लिए शिक्षित होना बेहद ज़रूरी है। शिक्षा के महत्त्व को देखते हुए आजकल सभी माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे-से-अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की कोशिश करते हैं।
यह दु:ख का विषय है कि अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने एवं स्कूल में मोटी फीस जमा कराने के बावजूद कुछ बच्चे पढ़ने में अक्सर आनाकानी करते हैं।
इस ‘न’ पढ़ने के पीछे क्या वजह हो सकती है, आइए उन कारणों को ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं।
कुछ घरों में देखा गया है कि माता-पिता बच्चों के सामने ही लड़ने-झगड़ने बैठ जाते हैं। इस प्रकार की तनावपूर्ण स्थिति बच्चों के मानसिक विकास में बाधा तो पहुंचाती ही है, साथ ही उनकी पढ़ाई-लिखाई में भी व्यवधान उत्पन्न करती है अत: अभिभावकों को यह कोशिश करनी चाहिए कि वे बच्चों के सामने इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न न होने दें।
कई बार उचित मार्गदर्शन की कमी की वजह से भी बच्चे पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। बच्चों को पढ़ाई में उचित मार्गदर्शन मिल रहा है कि नहीं, यह जांचने के लिए मां-बाप को अपने बच्चे से शिक्षा-संबंधी वार्तालाप अवश्य करना चाहिए। साथ ही अभिभावकों को चाहिए कि वे समय-समय पर स्कूल जाकर अपने बच्चे की पढ़ाई के विषय में उसके अध्यापकों से जानकारी लेते रहें।
प्राय: देखा गया है कि बच्चे जिस विषय में कमजोर होते हैं, उसे ही सबसे बड़ा हौवा समझते हैं। परिणामस्वरूप अन्य विषयों की अपेक्षा वे उस विषय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते, इसलिए अगर आपका बच्चा किसी विषय में कमजोर है तो उसकी इस कमजोरी को स्थायी न बनने दें अन्यथा आगे चलकर वही विषय उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जायेगी।
अक्सर देखा गया है कि जो बच्चे स्वभाव से जिद्दी होते हैं, वे पढ़ाई के समय अक्सर आनाकानी करते हैं। अब आप सोनू का ही उदाहरण ले लीजिए। सोनू अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र है, इसलिए वे उसकी हर छोटी-मोटी फरमाइश को पूरा कर देते थे। धीरे-धीरे सोनू की इन्हीं आदतों ने उसे जिद्दी बना दिया। अब हाल यह है कि जब भी उसके माता-पिता उसको पढ़ने के लिए कहते हैं, तभी वह अपनी फरमाइशों का पिटारा लेकर बैठ जाता है अत: अभिभावकों को चाहिए कि वे एक सीमा तक ही अपने बच्चे को लाड़-प्यार करें, इससे अधिक नहीं।
इस तरह पढ़ाई-लिखाई से संबंधित ऐसी अनेक समस्याएं होती हैं, जिन्हें हम अक्सर छोटा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं और बाद में यही गलतियां आगे चलकर विकट रूप धारण कर लेती हैं। परिणामस्वरूप बच्चे पढ़ाई को या तो बीच में ही छोड़ देते हैं या फिर अपने एक-दो साल खराब कर लेते हैं, अत: अभिभावकों को शुरू से ही अपने बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखनी चाहिए एवं ज़रूरत पड़ने पर उनका उचित मार्गदर्शन करना चाहिए। (उर्वशी)

