आप लाइन में हैं...
आप लाइन में हैं... इसका मतलब है कि आप मौजूद हैं, आप गिने जा रहे हैं-भले ही यह आपको न पता हो कि यह गिनती किसलिए हो रही है! कभी-कभी तो लगता है कि भारत वर्ष में जनगणना नहीं, ‘लाइनगणना’ होती है। जितनी लंबी लाइन, उतना मजबूत लोकतंत्र!
आप लाइन में हैं-इसका मतलब है कि आप जीवित हैं! आप भले ही उस लाइन में वो आपको या आप अपने आपको जीने लायक न समझते हों, लेकिन आपको भरोसा दिला दें कि आप लाइन में हैं-तभी तो देश का लोकतंत्र जीवित है! जब आम आदमी ‘आउट ऑफ लाइन’ होता है, तभी वह भीड़ में कुचला जाता है। इसलिए लोकतंत्र का यह नैतिक दायित्व बनता है कि सरकार की नीतियां देश को लाइन जीवी बनाने में सहायक हो, इसलिए तो जब सरकार का मन चाहे आधी रात को भी तुगलकी फरमान की तरह आपके गिरेबान को पकड़कर आपको खींचते हुए कह सकती है-‘आ जाओ बेटा, लग जाओ लाइन में...’
अब तो लाइन एक पहचान बन चुकी है। आम भारतीय की पहचान!
आपका आधार कार्ड गुम हो सकता है, पैन कार्ड लिंक न हुआ हो-लेकिन आपकी लाइन...वही आपकी सबसे बड़ी पहचान है!
हमने पूरी जिंदगी लाइन के साथ क्या नहीं किया! कहीं लाइन में लगे, कहीं लगाये गए, कहीं लाइन मारी, कहीं दूसरों की काटी, कहीं अपनी लाइन बैठाई, कहीं दूसरों की छोटी की, कहीं लाइन हाज़िर हुए-वैसे बता दें वो कुछ बिरले ही हैं जो अपनी लाइन बड़ी करने में व्यस्त रहते हैं।
जिंदगी की फिलॉसफी भी यही है-ज़िंदगी छोटी होती जाती है और ख्वाहिशों की लाइन लंबी होती जाती है।
सरकारी दफ्तरों में लाइन एक धर्म है। और आपको बार-बार यह प्रमाण देना पड़ता है कि आप धार्मिक हैं।
कभी राशन कार्ड के लिए लाइन, कभी आधार अपडेट के लिए।
लाइन में खड़े लोग सोचते हैं-देश तभी आगे बढ़ेगा जब लाइन आगे बढ़ेगी।
लेकिन यह लाइन है-बस लंबी होती जाती है... कभी आगे नहीं बढ़ती!
चाहे गरीब हो या अमीर-सब किसी न किसी लाइन में लगे हुए हैं।
गरीब राशन की लाइन में, तो अमीर आईफोन के नवीनतम संस्करण की पहली बिक्री में हिस्सा लेने की लाइन में। बैंक में नकद निकालने की लाइन में आप बुजुर्गों को यौवन से भरपूर और नौजवानों को बुजुर्गों जितना थका हुआ देख सकते हैं। राजनीति में लाइन लगाना, कट करना, सेट करना, हाज़िर करना-सब एक कला है।
जो कुछ लाइन के साथ किया जा सकता है, वही सबकुछ करना ही तो राजनीति है!
लाइन तोड़ना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है- हमें शहंशाह ने सिखाया है कि लाइन वहीं से शुरू होनी चाहिए जहां हम खड़े होते हैं!
देश की ‘सुविधा शुल्क’ प्रणाली ही तो आपको लाइनों के खतरों से बचाने के लिए ईजाद की गई है!
कई लोग लाइनों के बीच ही जीते हैं- ये इनकी लाइफ लाइनें है...बिजली के बिल की लाइन, अस्पताल की ओ.पी.डी. की लाइन, हॉलिडे टिकट की लाइन और अंतत: श्मशान की लकड़ी के लिए भी लाइन!
जीवन की रेस में आपको दौड़ना है-बस लाइन में लग जाइए...इंतजार कीजिए कि कभी सीटी बजे और आप दौड़ें। खैर, आप खुश रहिए-कम से कम लाइन में तो हैं।
उनसे बेहतर हैं, जो कभी इस रेस के लिए लाइन में लग ही नहीं पाए।
पता चला, उनकी हिस्से की रेस कोई और ही पूरी कर गया।
वो मंजिल तक पहुंच भी चुका और आप हैं कि रेस का टिकट हाथ में लिए बस इंतजार कर रहे हैं कि कब बुलावा आए!
ये लाइनें हैं-कोई किसी के पीछे खड़ा है, कोई उम्मीद में, कोई मजबूरी में-
और कुछ तो बस इसलिए, क्योंकि...‘लाइन है-तो लगना तो पड़ेगा!’
आप लाइन में है मतलब आप सिस्टम में है, सिस्टम में फिट हो ही गए हैं, तो कृपया अपनी शिकायतों का पुलंदा बाहर कूड़ेदान में ही फेंक आयें, क्योंकि बाहर शिकायत पेटिका तक पहुंचने के लिए भी एक अलग लाइन लगी है। यहां हर लाइन में खड़े आदमी को यही लगता है कि अगला मोड़ उसकी बारी का है...लेकिन मोड़ है ही मुड़ने के लिए,बस आपकी मर्जी से नहीं! आप साइलेंट मोड़ पर बस लगे रहे! लाइन आपके धैर्य की परीक्षा है। आप धक्कों का असली मजा चख सकते हैं! आप विचारक और चिन्तक बन सकते हैं, सुधारवादी बन सकते हैं...अपने आदर्शवाद की आतंकी बारिश कर सकते हैं ! लाइन में खड़े-खड़े देश सुधारने के प्लान बना लेते हैं! लेकिन जरा खिड़की के पीछे बैठे खूंसट बाबु को कानों कान खबर नहीं हो...वरना बत्ती गुल, काउंटर बंद हो जाएगा, ‘आज का टाइम ओवर हो गया जी!’ अब समझिए-लोकतंत्र, धैर्य और पसीने का यह संगम ही असली भारत है! और हम सब उसी लंबी लाइन में हैं, जहां मंजिल नहीं... बस सभी खड़े हैं राहों में। (सुमन सागर)



