कहानी-प्रतिशोध

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

सुबोध अपनी आंखें खोला और सामने माया को देखकर बोल पड़ा- ‘माया! तुम यहां। तुम्हें देखने के लिए मेरी आंखें तरस गयी। तुम यही सोचती होगी कि मैंने तुम्हें प्यार में धोखा दिया है। मैं समय और परिस्थिति के आगे विवश था। बिना तुम्हें बताये मैं अपनी बीमार मां को देखने चला गया। मेरी मां की तबियत बहुत खराब थी। मेरा जाना ज़रूरी था। वहां जाते ही मां अपनी अंतिम इच्छा का वास्ता देकर मुझ पर अपनी पसंद की लड़की से शादी करने का दवाब बनाने लगी। मां ने किसी लड़की को अपनी बहू बनाने  का वचन दे दिया था। 
मैंने मां को बहुत समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह मेरी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी। उधर उस लड़की ने भी मुझसे शादी नहीं होने पर आत्महत्या कर लेने का निश्चय कर चुकी थी। इधर मां की इच्छा और उधर उस लड़की की ज़िंदगी बचाने के लिए अपने प्यार की कुर्बानी दे दी। शादी के कुछ दिनों बाद मां गुजर गयी और मेरी पत्नी इस बच्ची को जन्म देते ही इस संसार से चल बसी। उसके बाद मेरा जीवन नीरस हो गया। मैं तुम्हें खोजने का बहुत प्रयास किया लेकिन तुम्हारा कुछ पता नहीं चल पाया। उस शहर को छोड़कर जा चुकी थी। मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं। मुझे जो सजा देना चाहो दे सकती हो। मैं तुमसे माफी मांगने लायक भी नहीं हूं। मेरे मर जाने के बाद इस बच्ची को ख्याल रखना। कसूर मैंने किया है, इसमें इस मासूम बच्ची का कोई दोष नहीं। तुमसे मुलाकात हो गयी। अब मैं चैन से मर सकूंगा।’
उसके इतना कहते ही वह उसके मुंह पर हाथ रखते हुए बोली- ‘ऐसा मत कहो। जीने की तमन्ना नहीं थी, लेकिन तुम्हारी बातें सुनकर जीने इच्छा जाग उठी है। तुम्हारी बातों में सच्चाई है। तुमने किसी की ज़िंदगी बचाने के लिए अपने प्यार को कुर्बान कर दिया। तुम गुनाहगार नहीं, बल्कि महान हो। मैं बिना सच को जाने प्रतिशोध की अग्नि में जल रही थी। मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी। इस बच्ची को मां की कमी नही होने दूंगी। मुझे जीने का सहारा मिल गया है।’ और वह उस बच्ची को अपने सीने से लगा लीं। वह अपनी जिंदगी की नयी शुरूआत करने के लिए सुबोध के साथ इस शहर से दूर चली गयी। आज वह डॉक्टर बन मानवता की सेवा में लग गयी। जिस माया को इंसानों से नफरत और घृणा थी, उसी माया में मानो दया-करूणा का भाव उमड़ आया। उसमे मानवता ही मानवता दिख रही है। समय और परिस्थिति ने उसको क्या से क्या बना दिया? 
तभी माया उनका ध्यान भंग करते हुए बोली- ‘डाक्टर! आप यहां।’
‘हां, इस शहर से गुजर रहा था तो तुम्हारे नर्सिंग होम का बोर्ड देखकर रूक गया कि क्या यह वही माया है, जिसे मरीजों को तड़पाने में मजा आता था? जिसमें कभी कठोरता और निर्दयता थी। आज उसी माया में दया-करूणा का भाव उमड़ आया। तुम्हारे इस बदले रूप को देखकर मेरा मन प्रसन्नता से खिल उठा। ऐसे ही मरीजों की सेवा करती रहो।’ डा. महेश उत्साहित स्वर में बोले। 
‘यदि आपने सच का आइना नहीं दिखाया होता तो यह माया लोगों की नज़रों में घृणा की पात्र बन जाती। मैं रास्ता भटक गयी थी। आपने ही सही रास्ता दिखाया। मेरे जीवन को आपने संवार दिया। आज माया जो भी है, वह आपकी बदौलत अन्यथा मेरी जिंदगी क्या हो जाती मैं स्वयं भी नहीं जानती? मेरी ज़िंदगी में दर्द के अलावा था ही क्या? अपने प्यार को खोकर कितनी कठोर बन गयी थी। ज़िंदगी में नैतिकता और मानवता का पाठ आपने ही पढ़ाया। आज मेरी ज़िंदगी खुशियों से सराबोर हो गयी है।’ यह कहते हुए उसकी आंखों में आंसू आ गये। 
‘तुम्हारी आंखों में आंसू?’ डा. महेश बोले। 
‘ये खुशी के आंसू हैं। घर चलिये। सुबोध और बच्चों से मिल लीजिए।’ वह अपने आंसू पोंछते हुए बोली। 
‘माया! तुम ऐसी ही मुस्कराती रहो। ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, उससे डटकर मुकाबला करना। हिम्मत मत हारना। ज़िंदगी में प्यार की खुशबू ऐसे ही फैलाती रहो, जिसकी खुशबू से हर कोई सराबोर हो जाए। यही ईश्वर से मेरी कामना है। अभी चलता हूं। फिर कभी तुम्हारे घर पर चलूंगा।’ डा. महेश की आंखों में खुशी के आंसू छलक आये। वे अपने आंसू पोछते हुए नर्सिंग होम से बाहर निकल गये। 
माया अपलक नेत्रों से उन्हें जाते हुए देख रही थी।

(समाप्त)
 

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