विनाश का संदेश
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में विगत दिवस अमरीका तथा ईरान के बीच हुई लम्बी बातचीत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची। दोनों देशों द्वारा इसमें भाग लेने के लिए बड़े प्रतिनिधिमंडल आए थे। एक का नेतृत्व अमरीका के उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस कर रहे थे और ईरान की ओर से संसद के स्पीकर मुहम्मद गालिब़ाफ प्रतिनिधित्व कर रहे थे। तीन चरणों में हुई यह वार्ता 21 घंटे तक चली। सात सप्ताह के भीषण युद्ध के बाद ट्रम्प द्वारा दो सप्ताह के लिए 22 अप्रैल तक युद्ध-विराम करने की घोषणा की गई थी, परन्तु दूसरी ओर इज़रायल द्वारा लेबनान में हिज़्बुल्लाह लड़ाकों के खिलाफ लगातार बमबारी जारी रखी गई, जिस संबंध में ईरान ने अपना रोष भी व्यक्त किया था, परन्तु इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के अनुसार अस्थायी समझौते में लेबनान का ज़िक्र नहीं था। इस तरह यह वार्ता शुरू होने से पहले ही बड़े विवादों में घिर गई थी और यह भी प्रतीत होने लगा था कि शायद यह सफल न हो सके।
वार्ता विफल होने के दो ही मुख्य कारण रहे हैं। अमरीकी पक्ष ईरान पर अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करने के लिए दबाव बना रहा था, परन्तु ईरान ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। दूसरा मुख्य मुद्दा समुद्री जहाज़ों के लिए होर्मुज़ मार्ग खोलने का था, जिसे ईरान ने 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने पर पूरी तरह बंद कर दिया था और इस मार्ग पर बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस मार्ग को खुलवाने के लिए यूरोपियन देशों से मदद लेने की गुहार भी लगाई थी, परन्तु ऐसा करने से उन्होंने इन्कार कर दिया था, जिससे ट्रम्प की बौखलाहट और बढ़ गई थी। इस वार्ता के विफल होने एक बार फिर विश्व की चिन्ता बढ़ गई है। तेल के दाम आसमान छूने लगे हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महंगाई बढ़ने लगी है। नि:संदेह इस युद्ध में ईरान का बेहद नुकसान हो चुका है और हज़ारों लोग इस युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। अब बड़ी चिन्ता इस युद्ध के पुन: शुरू के साथ-साथ इसके और फैलने की सम्भावना भी बनी दिखाई देती है। ईरान ने प्रतिक्रियास्वरूप खाड़ी देशों में अमरीकी ठिकानों के साथ-साथ अन्य स्थानों पर भी लगातार मिसाइली हमले जारी रखे थे। खाड़ी देशों, जिनमें सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात तथा कुवैत शामिल हैं, विश्व भर को कच्चा तेल देते थे। ईरान भी व्यापक स्तर पर तेल का निर्यात करता है। इस युद्ध ने एक बार तो इन सभी देशों की आर्थिकता को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है, जिसकी ज़द में आज और भी बहुत-से देश आ गए हैं। भारत के लिए भी यह बेहद कठिन समय है। अमरीका ने भी अब होर्मुज़ की नाकाबंदी करने की घोषणा कर दी है। विश्व के बड़े देश अपने-अपने ढंग से इस स्थिति के बारे प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।
ट्रम्प ने यह भी आरोप लगाया है कि चीन ईरान को भारी मात्रा में हथियार दे रहा है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियन को फोन करके कहा है कि वह इस लड़ाई में मध्यस्थता करने के लिए तैयार है। इसी दौरान कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमरीका से 70 प्रतिशत तक रक्षा सामान कम खरीदने की घोषणा की है। एक ओर पाकिस्तान अमरीका तथा ईरान के बीच मध्यस्थता कर रहा है, दूसरी ओर उसने सऊदी अरब को 13 हज़ार सैनिक तथा 18 युद्धक विमान भेजने की घोषणा भी की है। लेबनान पर बमबारी जारी रखते हुए इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा है कि ईरान के खिलाफ युद्ध समाप्त नहीं हुआ। लगातार ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जिनसे स्थिति और भी जटिल बनती जा रही है, जो भारी विनाश का संदेश देती है। आज और ऐसे सम्भावित विनाश को रोकना विश्व के देशों के अहम फज़र् बनता है। इसलिए उन्हें और भी सक्रिय होने की ज़रूरत होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

