तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
जैसे-जैसे अप्रैल की चिलचिलाती धूप तमिलनाडु पर बरस रही है, वैसे ही राजनीतिक पारा भी उतनी ही तेज़ी से चढ़ रहा है। 23 अप्रैल को राज्य चुनाव के लिए तैयार है। इसके हाल के समय के सबसे अप्रत्याशित विधानसभा चुनावों में से एक होने की संभावना है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) के बीच पारम्परिक द्विपक्षीय मुकाबले में एक करिश्माई नए खिलाड़ी अभिनेता से राजनेता बने जोसफ विजय और उनकी पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कड़गम’ (टीवीके)के आने से खलल पड़ गया है।
पांच वर्षों तक मुख्यमंत्री एम, के. स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक ने एक ऐसे गठबंधन के साथ तमिलनाडु पर शासन किया है जिसमें कांग्रेस, वामपंथी दल और छोटे सहयोगी शामिल हैं। सरकार ने अपना समर्थन मज़बूत करने के लिए लोकलुभावन योजनाओं पर काफी भरोसा किया है, जैसे महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, घर की मुखिया महिलाओं के लिए 1000 रुपये का मासिक भत्ता, स्कूली बच्चों के लिए नाश्ता कार्यक्रम, विस्तारित चिकित्सा बीमा और छात्रवृत्तियां। इन पहलों ने शुरू में सत्ताधारी पार्टी को एक मज़बूत बढ़त दी थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, सत्ता-विरोधी लहर साफ तौर पर महसूस की जा रही है। व्यापक भ्रष्टाचार, खराब कानून-व्यवस्थाए महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएं और शराब घोटाले जैसे घोटालों के आरोपों ने जनता का विश्वास कम कर दिया है।
एडापड्डी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुकने राजग के बैनर तले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और छोटे सहयोगियों के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाया है। ग्रामीण इलाकों और तमिलनाडु के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में पारंपरिक रूप से मज़बूतअन्नाद्रमुकअपने कार्यकर्ताओं की ताकत और सांगठनिक अनुशासन पर भरोसा कर रही है। उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ी है और चुनाव प्रचार में नई जान आ गयी है।
अन्नाद्रमुक की रणनीति साफ है—द्रमुक के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर का फायदा उठाना, ग्रामीण वोटों को एकजुट करना और भाजपा की राष्ट्रीय चुनाव प्रचार मशीनरी का लाभ उठाना। हाल के हफतों में पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता से संकेत मिलता है कि मुकाबला कड़ा होता जा रहा है और राजग एक ज़बरदस्त चुनौती बनकर उभर रहा है।
इस चुनाव में सबसे दिलचस्प बात जो सामने आई है, वह है तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक जोसेफ विजय का राजनीति में प्रवेश। उनकी पार्टी टीवीके ने चुनाव प्रचार में ज़बरदस्त जोश भर दिया है। उनकी रैलियों और रोडशो में भारी भीड़ उमड़ रही है। विजय की लोकप्रियता शहरी युवाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच सबसे ज़्यादा है। ये वे वर्ग हैं जो ऐतिहासिक रूप से द्रमुक और कांग्रेस की तरफ झुके रहे हैं। दशकों की बॉक्स-ऑफिस सफलता के ज़रिए विजय जो प्रशंसक वर्ग तैयार किया है, वह अब राजनीतिक उत्साह में बदल गया है।
फिर भी विजय के सामने अनेक चुनौतियां हैं। एम.जी. रामचंद्रन या जे. जयललिता के विपरीत, जिन्होंने करिश्माई व्यक्तित्व के साथ-साथ मज़बूत सांगठनिक ढांचा भी खड़ा किया था, विजय की राजनीतिक मशीनरी अभी तक परखी नहीं गई है। उनके सलाहकार ज़्यादातर अनुभवहीन हैं, बूथ-प्रबंधन कमज़ोर है और उम्मीदवारों के चयन पर भी सवाल उठे हैं। अपनी स्टार-पावर को एक अनुशासित चुनावी प्रदर्शन में बदलना कोई आसान काम नहीं है। तमिलनाडु के चुनाव अक्सर बूथ-स्तर पर लोगों को लामबंद करने और स्विंग वोटर्स (जो किसी भी तरफ झुक सकते हैं) पर बारीकी से ध्यान केंद्रित करने पर निर्भर करते हैं और ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां टीवीके अभी भी कमज़ोर स्थिति में है। इसके बावजूद विजय के उभार को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। द्रमुक के शहरी वोट-शेयर में सेंध लगाने की उनकी क्षमता, विशेष रूप से दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच, चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल सकती है। भले ही टीवीके ज़्यादा सीटें न जीत पाए, लेकिन वह अहम सीटों पर द्रमुक की जीत के अंतर को कम करके खेल बिगाड़ने वाला साबित हो सकती है।
तमिलनाडु की राजनीति में लम्बे समय से एक ‘तीसरी जगह’ मौजूद रही है। इस रिक्त स्थान ने विजय की पार्टी टीवीके के लिए एक अवसर पैदा कर दिया है। यदि वे इस फ्लोटिंग वोट का एक छोटा सा हिस्सा भी अपने पक्ष में कर पाते हैं, तो यह कड़े मुकाबले वाली सीटों पर चुनावी समीकरण को बदल सकता है। इस चुनाव को और भी ज़्यादा रोमांचक बनाने वाली बात यह है कि सभी सीटों पर जीत-हार का अंतर बहुत कम रहने की उम्मीद है। जैसे-जैसे 23 अप्रैल नज़दीक आ रही है, एक बात साफ़ होती जा रही है कि यह चुनाव अब सिर्फ द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच की सीधी लड़ाई नहीं रह गया है। यह एक त्रिकोणीय मुकाबला बन गया है, जहां हर सीट पर सख्त मुकाबला होगा। (संवाद)



