अनाज को खराब होने से बचाने की ज़रूरत

पंजाब में अन्न की प्रत्येक वर्ष होने वाली खराबी निरन्तर चिन्ता का विषय बनी है, किन्तु सरकारों की ओर से इस समस्या से आंखें मूंदे रखना स्थिति को अधिक दुर्दशा की ओर ले जाने वाली बात हो जाती है। केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की ओर से जारी इस संबंधी रिपोर्ट इस तथ्य को खुले तौर पर ज़ाहिर करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में प्रत्येक वर्ष औसत रूप से साढ़े 12 लाख मीट्रिक टन अनाज किसी न किसी तरह से खराब हो जाता है। इसके लिए अनेक कारण उत्तदायी पाये गये हैं तथापि वर्तमान में अन्न-भण्डारण के तरीके और अन्न पदार्थों की आवाजाही मुख्य वजहें मानी जाती हैं। बारदाने की कमी भी अन्न पदार्थों की खराबी का कारण मानी जाती है। बारदाने की कमी के कारण गेहूं और धान के ढेर खुले में पड़े धूप और वर्षा के कारण खराब होते रहते हैं। इस सम्पूर्ण मामले में एक सर्वाधिक त्रासद पक्ष यह भी है कि यह अनाज खराब हो जाने की स्थिति में पशुओं के खाने के योग्य भी नहीं रहता।
इसी रिपोर्ट के एक अन्य आंकड़े के अनुसार पंजाब में प्रत्येक वर्ष जितने गेहूं और धान अथवा चावल की खराबी होती है, उतने से देश के हिमाचल जैसे एक प्रदेश की कुल अनाज की मांग की पूर्ति की जा सकती है। प्रदेश में प्रत्येक वर्ष गेहूं की कुल पैदावार 150 लाख मीट्रिक टन और धान की कुल पैदावार 175 लाख टन होती है। इसमें से 6.82 लाख मीट्रिक टन गेहूं और 5.48 लाख मीट्रिक टन धान का खराब हो जाना कोई सही बात नहीं है। यह स्थिति तब और भी गम्भीर हो जाती है जब यह पता चलता है कि देश में आज अन्न की आत्म-निर्भरता के बावजूद कई राज्यों में अनाज की कमी के कारण भुखमरी जैसी स्थिति अवसर पैदा होती रहती है। पंजाब के कुल गेहूं उत्पादन में से 130 लाख मीट्रिक टन केन्द्र ने खरीद करना होता है, किन्तु इस खरीद के पथ पर अक्सर अनेक अड़चनें आती रहती हैं। सरकारी खरीद एजेंसियों का अनाज खरीद का ढांचा वही चिरकालीन पुराना है। इस कारण गेहूं की खरीद की सम्भावनाएं लगातार बढ़ती रहती हैं।
पंजाब में धान की अपेक्षा गेहूं की फसल की सम्भावनाएं अक्सर बनी रहती हैं। विपरीत मौसम और आंधी-वर्षा के कारण प्रत्येक वर्ष खेतों में अथवा मंडियों में गेहूं की फसल बड़ी मात्रा में बर्बाद हो जाती है। मंडियों से गेहूं की ढुलाई, बारदाने की समस्या और भण्डारण की अव्यवस्था भी अन्न की बर्बादी का बड़ा कारण बनती है। असमय हुई वर्षा से गेहूं के दाने में नमी भी एक बड़ी समस्या होती है जो इसकी खराबी का कारण बनती है। नमी वाला गेहूं खराब भी शीघ्र होने लगता है। इस कारण किसान को दोहरी मार सहन करनी पड़ती है। प्राकृतिक आपदा की मार हो या अन्न भण्डारण की समस्याओं के कारण उपजा संकट हो, इनकी हानि और पीड़ा किसान को ही सहन करनी पड़ती है। सरकारें समय-समय पर किसान का हाथ थामने की अवश्य कोशिश करती हैं, किन्तु यह सब सिर्फ आंसू पोंछने तक ही सीमित रहता है।
पंजाब में गेहूं और धान के अतिरिक्त मक्का और सब्ज़ियों की फसल भी बड़ी मात्रा में खराब होती है। चालू वर्ष में भी प्रदेश में मटर की फसल को बड़ा नुक्सान पहुंचा है। दालों एवं अन्य पारम्परिक फसलों के उत्पादन को होने वाली क्षति की स्थिति भी कमो-बेश ऐसी ही है। पंजाब की मौजूदा सरकार ने बेशक अन्न की खराबी एवं बर्बादी को रोकने और नये गोदाम आदि बनाने हेतु सहमति जताई है, किन्तु प्रदेश की ताज़ा गेहूं की फसल की नियति अभी भी पहले जैसी है। प्रदेश सरकार ने इस हेतु केन्द्र की सरकार से भी सहयोग मांगा है, किन्तु गेहूं और धान की सम्भावित नई फसल को अभी भी खराबी की मार झेलनी ही पड़ेगी। प्रदेश में गोदामों के अतिरिक्त भण्डारण गृह बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। हम समझते हैं कि थोड़े-से अतिरिक्त प्रयासों से प्रदेश में गेहूं, धान एवं अन्य अन्न पदार्थों की बड़े स्तर पर खराबी को रोका जा सकता है। इस हेतु केन्द्र और प्रदेश सरकार के समन्वित प्रयासों से मंज़िल की ओर बढ़ा जा सकता है। इस प्रकार से बचाया गया अन्न देश के अन्न कमी वाले राज्यों में भेजा जा सकता है।

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