छोटी बातों के बड़े अर्थ
स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण आज के कॉलम में मैं पुराने नुस्खों के बारे में बात करके छुट्टी करूंगा। मेरी आज की बात मरीज़ की नब्ज़ चैक करने के इंसानी और मशीनी साधनों तक सीमित है। वे दिन गए जब गोंव के हकीम लेख राज उर्फ लेख को नब्ज़ दिखाकर जो कुछ दवा के रूप में मिलता था, खाकर खेतों की ओर चल पड़ते थे। इस आशा के साथ कि पकी हुइ फसल देखकर गर्व के किसान। आंधी-तूफान चलने लगता, घर आए तो जाने वाली बात होती थी। फसलें मौसम पर निर्भर करती थीं। अब तो इंसानी आविष्कार धरती का सीना चीर कर पानी निकाल लेते हैं। यहां तक कि बादलों की सिलाई करने से भी गुरेज़ नहीं करते।
और तो और अस्पतालों में मशीनों के नीचे लिटाकर पित्ते को पंक्चर लगाए जा रहे हैं। वो दिन गए जब हमारे पूर्वज फसल की कटाई के मौसम में मुंह में अफीम का मावा डाल कर हाथ में दरांती पकड़ लेते थे। फसल को घर लाने का समय जो था। आढ़ती बात ही नहीं सुनते थे। खेतों के मालिक अपनी ज़मीन और जायदाद साहूकारों के पास गिरवी रखने के लिए मजबूर होते थे। भला हो सर छोटू राम का जिन्होंने ब्रिटिश सरकार से बीस साल का कानून पारित करवा कर पैतृक मालिकों का पीछा छुड़वाया।
इस प्रसंग में मेरा एक सुनी-सुनाई बात सुनाने का मन बन गया। फसल की कटाई के दिन थे। लगभग सभी किसान खेतों में कटाई कर रहे थे और एक मस्त-मौला जट्ट अपने खेत के पेड़ की छाया में समतल किए खेत में लेटा हुआ सुस्ता रहा था। कोई भला आदमी उसे सलाह देने लगा कि खेत का काम करे। उसने सलाह देने वाले की बात मानने का लाभ पूछा। जवाब मिला कि समतल किए खेत में लेटने के बजाय उसे फसल से पैसे कमाए और उस कमाई से गांव के घर पर एक खुला चौबार बना कर उसमें बिजली वाले पंखे की खुली हवा का आनंद ले।
पेड़ की छाया आनंद लेने वाला जट्ट उठ कर बैठ गया और सलाह देने वाले को कहने लगा, मैं कोई नासमझ हूं जो खुली हवा के झोंके गंवा कर मशीन के पंखों की गर्म हवा के बस में हो जाऊं।
अब तो वर्तमान इंसान ने अपनी शब्दावली भी नई बना ली है। चिंता की जगह अंग्रेज़ी का शब्द टेंशन मुक्त होना इस्तेमाल करने लग पड़े हैं और हिसाब-किताब से बचने के लिए ‘कोई चक्कर नहीं’ इस्तेमाल करने लग पड़े हैं। ज़माना बदल रहा है।
अंतिका
—सियाणपां (1)—
जुत्ती सोटी बिना तुरी ना रात नूं,
करी ना टिच्चर मरासी ज़ात नूं।
फुल्लां उत्ते आई पुट्टिये ना वल्ल जी,
सभा विच्च बैठ टोकीये ना गल्ल जी।
वड्ढ खाणे अग्गों लंघीये ना उठ के,
जुत्तियां नाम मारीये जवान पुत्त दे।
—सियाणपां (2)—
चाह गई चिन्ता गई, मनवा बेपरवाह,
जिस को किच्छ ना चाहिए, सो ही शहनशाह।
हद्द में चले सो औलीया, अनहद्द चले सो पीर,
हद्द अनहद्द दोनों चले सो है शाह-फकीर।
मैं अकेला ही चला था जानिबे-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।



