क्या वैष्णवी बन सकेंगी दूसरी सानिया मिज़र्ा ?

भारतीय महिला टेनिस के इस सत्र में वैष्णवी अदकर ने तहलका मचाया हुआ है। वह फरवरी में बेंग्लुरु में खेले गये डब्लू 100 आईटीएफ टूर्नामैंट के फाइनल में पहुंचीं। फरवरी 2009 के बाद इस स्तर की प्रतियोगिता के एकल फाइनल में पहुंचने वाली वह पहली भारतीय महिला हैं। ज़ाहिर है उनसे पहले यह कारनामा लीजेंड सानिया मिज़र्ा ने किया था। इस लिहाज़ से देखें तो 21-वर्षीय वैष्णवी से अंतर्राष्ट्रीय सर्किट पर सफलता की काफी उम्मीदें लगायी जा सकती हैं। इसलिए बिल्ली जीन किंग कप (एशिया ओशिनिया ग्रुप 1) में उनके प्रदर्शन को दिलचस्पी से देखा जायेगा, जिसमें वह पहली बार हिस्सा लेंगी। यह प्रतियोगिता नई दिल्ली के डीएलटीए कोर्ट्स में खेली जायेगी। आईटीएफ प्रतियोगिताओं में वैष्णवी के प्रभावी प्रदर्शनों ने उनकी एकल रैंकिंग ट्रेंड को एकदम सही दिशा प्रदान की है- टॉप 400 में शामिल होने को शुरुआत माना जा रहा है।
जुलाई 2025 में वैष्णवी ने जर्मनी में खेले गये वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स में कांस्य पदक जीता था। फिर अक्तूबर में उन्होंने फेनेस्टा नेशनल खिताब जीता। इस सीजन में उन्होंने अपना बेस अपने गृह नगर पुणे से बदलकर बेंग्लुरु में रोहन बोपन्ना टेनिस अकादमी (आरबीटीए) किया। इस परिवर्तन से उनके खेल में काफी सुधार आया है। अब उनके पास मंझे हुए कोच एम. बालाचंद्रन हैं और ट्रेवलिंग फिजियो भी। वैष्णवी बताती हैं, ‘बेंग्लुरु में डब्लू 100 के दौरान मुझे अपनी क्षमता का एहसास हुआ, जबकि इससे पहले मुझे हमेशा ही अपनी काबलियत पर शक था और मैं अपने ऊपर विश्वास नहीं करती थी। बेस बदलने से भी मदद मिली; क्योंकि मुझे अनुभवी व्यक्तियों जैसे बालू सर व रोहन से गाइडेंस मिल रही है। दृष्टिकोण में बदलाव से बहुत फर्क पड़ रहा है।’ 
एक प्रोफेशनल के रूप में रोहन ने इन स्थितियों का अनुभव किया है और वह जानते हैं कि आप क्या महसूस कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं। इस कारण वैष्णवी कोर्ट पर अब बेहतर महसूस कर रही हैं और जिन चीज़ों को वह सीख रही हैं, उन्हें कोर्ट पर लागू करने के लिए उनमें विश्वास आ गया है, खासकर अपने से अधिक रैंक की खिलाड़ियों के खिलाफ खेलते हुए। उनका आत्मविश्वास बढ़ गया है। बालाचंद्रन इस बात से सहमत हैं कि वैष्णवी के खेल में सुधार आया है। वह बताते हैं, ‘उसने ज़बरदस्त प्रगति की है। उनका शॉट चयन बेहतर हुआ है। उनकी टाइमिंग शानदार है और अपने साइज़ के बावजूद वह ग्राउंडस्ट्रोक्स में जो पॉवर लाती हैं वह ़गज़ब है लेकिन हर गेंद को एक स्पीड पर नहीं खेला जा सकता और हमने इसी पर ही काम किया है। इसके बाद फिजिकल व टैक्टिकल हिस्सा आता है, जिस पर अभी काफी काम करना शेष है।’ 
वास्तव में यहां से रास्ता कठिन ही होने जा रहा है। वैष्णवी की परीक्षा अब अंतर्राष्ट्रीय सर्किट पर होगी। वह जानती हैं कि क्या चुनौतियां उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि भारत में प्रतिभाएं नियमित उभरती रहती हैं, जूनियर स्तर पर और शुरुआती सीनियर रैंक में भी। लेकिन समय पर आर्थिक सहयोग व इलीट-कोचिंग न मिलने की वजह से सपने समय से पहले ही टूट जाते हैं। सानिया ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो कमाल किया, उससे भविष्य के भारतीय सितारों को चमकने का अवसर अवश्य मिला है, लेकिन उनकी सफलता को दोहराया नहीं जा सका है; क्योंकि ठोस घरेलू संरचना का अभाव है, जो प्रतिभा को जल्द पहचानकर निखार सके। नतीजतन जब कड़ी मेहनत के बाद भी नतीजे सामने नहीं आते हैं, तो दोनों पैरेंट्स व खिलाड़ियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। वैष्णवी का कहना है, ‘भारतीयों के लिए सबसे बड़ा संघर्ष आर्थिक है; क्योंकि टेनिस बहुत महंगा खेल है। विदेश यात्रा ही जेब को खाली कर देती है। फिर बहुत सी अन्य चीज़ों का प्रबंधन करना होता है। अगर कोई आपकी मदद न कर रहा हो तो सारी कोशिशें गुड़ गोबर हो जाती हैं। यही वजह है कि बहुत से खिलाड़ी खिलने से पहले मुरझा जाते हैं, क्योंकि एक समय के बाद कड़ी मेहनत के बाद भी संघर्ष जारी ही रहता है।’
वैष्णवी की छोटी बहन अस्मि भी प्रतिभाशाली जूनियर खिलाड़ी है। इसलिए उनके पैरेंट्स को बहुत कुछ सोचना पड़ रहा है। व्यापारी पिता निहार अदकर जोश के साथ अपनी बेटियों के करियर को फॉलो कर रहे हैं और मां गौरी अपनी बेटियों के साथ ट्रेवल करती हैं। निहार बताते हैं, ‘मेरे लिए बहुत कठिन है; क्योंकि मेरी दोनों बेटियां खेल रही हैं। बजट की योजना बहुत सोच समझकर बनानी पड़ रही है। आरंभ का दौर अति कठिन होता है; क्योंकि प्राइज मनी नहीं होती। सीनियर लेवल पर प्राइज मनी आती है, लेकिन यात्रा, एयर टिकट्स आदि खर्च के कारण वह पर्याप्त नहीं होती है। फिर ऐसा समय आता है कि आपको अधिक करने की ज़रूरत होती है। आप बेटियों के सामने नतीजों की बात नहीं कर सकते और साथ ही उन्हें यह समझना भी ज़रूरी होता है कि क्या प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन सकारात्मक बात यह है कि अब प्रायोजकों से अधिक सहयोग मिल रहा है।’       -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 
 

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