अप्रतिम वास्तुशिल्प का नमूना है रानी की वाव
सिंधु घाटी की सभ्यता (हड़प्पा) के प्राचीन अभिलेखों, पौराणिक ग्रन्थों में जल प्रबंधन की समृद्ध परम्परा का उल्लेख है। उसमें बावड़ियों (बावली), कन्नड़ में कल्याणी या पुष्करणी, मराठी में बारव, गुजराती में वाव, संस्कृत साहित्य में वापी, दीर्घा, वापिका, कर्कन्धु, शकन्धु का महत्वपूर्ण योगदान है। यहां वर्षा का पानी एकत्रा किया जाता था जो बाद के उन महीनों में जब वर्षा नहीं होती थी, बहुत काम आता था। भीषण गर्मी में सामान्य जन को इससे बहुत राहत मिलती थी। जल संरक्षण प्रणाली का आधार रही बावड़ियां दूर से देखने पर ये तलघर के रूप में बनी किसी बहुमंजिला हवेली जैसी दिखाई देती हैं जहां दालान, दीर्घाएं, मंदिर आदि भी होते थे क्योंकि ये स्थल सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र भी थे।
कुछ बावड़ी तो वास्तुकला का शानदार नमूना कही जा सकती हैं। यूं देश में असंख्य बावड़ी हैं लेकिन गुजरात के पाटण में रानी की वाव और गांधीनगर में अडालज की बावड़ी राजस्थान में भांडारेज (दौसा) की चांद बावड़ी व हिण्डौन सिटी की जच्चा की बावड़ी तथा दिल्ली की अग्रसेन बावली प्रसिद्ध हैं लेकिन भारत में केवल पाटण में स्थित रानी की वाव ही विश्व विरासत सूची में शामिल है।
वर्तमान में 100 रुपये के नोट पर छपी रानी का वाव गुजरात के पाटण (पूर्व नाम अन्हिलपुर) में स्थित सात मंजिला बावड़ी है। इसे रानी उदयमती ने 1063 में अपने पति राजा भीमदेव प्रथम की स्मृति में बनाया था। बलुआ पत्थर से बनी इस कलात्मक बावड़ी को बनाने में चार दशक लगे। भूगर्भीय बदलावों, बाढ़ और लुप्त हुई सरस्वती नदी के कारण यह बहुमूल्य धरोहर लंबे समय तक गाद की परतों तले दबी रही जिसे बाद में ढूंढा गया। चौड़े चबूतरे, मंडप और दीवारों पर तराशी अद्भुत मूर्तियों को निहारते हुए सीढ़ियों से गहरे पानी में उतरा जा सकता है। भूमिगत जल संरक्षित करने के उद्देश्य से बनाई गई इस बावड़ी के सबसे निचली सतह पर एक आयताकार कुआं बना हुआ है जो 9.5 गुना 9.4 मीटर चौड़ा है। भारतीय वास्तुकला और संस्कृति का अप्रतिम उदाहरण 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी इस सात मंजिला बावड़ी में 292 स्तंभ थे। भूकम्प तथा अन्य कारणों से हुए नुकसान के बाद अब 226 स्तंभ शेष हैं। इन स्तंभों पर घोड़े, हाथी, शेर की मूर्तियां हैं। मारू-गुर्जर शैली से बनी लगभग 500 मूर्तियों में प्रधान देवी देवता आले में स्थित है तो अप्सरा आदि उनके चारों ओर हैं।
सबसे ज्यादा मूर्तियां पार्वती माता की हैं। चौथी मंजिल के बीच से ठीक सामने गौर से देखने पर क्षीरसागर में शेषनाग पर लेटे भगवान विष्णु के दर्शन होते हैं तो विष्णु के दशावतार को भी यहां प्रदर्शित किया गया है। भारतीय दर्शन में विष्णु को संसार का पालनहार माना जाता है। यहां जिन अन्य मूर्तियों के साक्षात्कार होता है उनमें ब्रह्मा, सरस्वती, उमा महेश्वर, राक्षस का वध करती दुर्गा, महिषासुर मर्दिनी, गणपति गणेश जी के पेट पर कोबरा, धन के दवता कुबेर, कमल पर बैठी महालक्ष्मी, नरमुंड के माला पहने चामुंडा देवी व ध्यानमग्न गौरी राक्षस का दमन करते हनुमान, हिरण्यकश्यप का वध आदि प्रमुख हैं।
इनके अतिरिक्त अप्सरा, नागकन्या और योगिनी की मूर्तियां भी हैं तो बच्चों की देखभाल, सजते हुए नृत्य करते हुए, किताब पढ़ते हुए, पत्र लिखते हुए, सुंदर आभूषण पहने महिला मूर्तियां भी हैं जो श्रेष्ठ वास्तुशिल्प कला के साथ-साथ उस काल में महिलाओं के जीवन स्तर को प्रदर्शित करती है। चूड़ी, कान की बाली, गले की माला, कमरबंद, पायल, जैसे अनेक आभूषण एवं सुंदर वस्त्रा, करीने से सजे हुए बालों को पत्थर पर तराशना अद्भुत है तो कुछ मूर्तियों में पांव में जूते चप्पल भी हैं। एक सुंदर मूर्ति नायिका कर्पूर मंजरी की है जो स्नान करके बाहर निकली है तो उसके गीले बालों से मोती की तरफ पानी टपक रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि एक रानी द्वारा बनवाई गई यह बावड़ी विशेष रूप से नारी जाति को ही समर्पित है। इस वाव (बावड़ी) में सिद्धपुर तक 30 कि.मी. लंबी सुरंग थी। विशेष उल्लेखनीय है कि 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच उत्तर पश्चिम गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों पर सोलंकी वंश का शासन था। उस काल में आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रा में अनेक कीर्तिमान स्थापित हुए। स्वर्ण युग कहे जाने वाले उस दौर में बनाए गए अनेक स्मारकों में सोमनाथ, मोढ़ेरा का मंदिर, सहस्त्रा लिंग तालाब तथा रानी की वाव प्रसिद्ध है। रानी की वाव में अनेक स्थानों पर सुंदर डिजाइन वाली जालियां बनी हुई है। विशेष यह कि इन जालियों के डिजाइन का पाटण की विश्व प्रसिद्ध पटोला साड़ियों पर खूब उपयोग होता है। पाटन सिल्क की पटोला साड़ियों के लिए भी जाना जाता है। एक पटोला साड़ी को अनेक कलाकार मिलकर लगभग एक से डेढ़ महीने में तैयार करते हैं इसीलिए उसका दाम डेढ़ लाख रुपए से शुरू होता है। पाटण गुजरात के 33 ज़िलों में एक है। गुजरात की राजधानी गांधीनगर के निकट अडालज की वाव भी उत्कृष्ट वास्तुशिल्प का सुंदर उदाहरण है। गांधीनगर से 110 किमी की दूरी पर स्थित पाटण पहुंचने के लिए शानदार सड़क मार्ग है। रानी की वाव को संरक्षित रखने के प्रयास लगातार जारी हैं। इस स्थल के चारों ओर रंग बिरंगे फूलों की क्यारियां, हरे-भरे खूबसूरत मैदान हैं। यहां आसपास अनेक अन्य दर्शनीय स्थल हैं तो रुकने के लिए सुविधा सम्पन्न होटल भी सहज उपलब्ध हैं। (उर्वशी)





