तेज़ी से सूख रहे देश के प्रमुख जलाशय 

केंद्रीय जल आयोग की नवीनतम रिपोर्ट बताती है कि देश के सभी प्रमुख जलाशय तेज़ी से सूख रहे हैं और उनमें आधा भी पानी नहीं बचा है। गर्मी के तीन महीने अभी बाकी हैं और मानसून के कमज़ोर रहने के आशंका के बीच इस आसन्न जल संकट से निबटने के लिये सरकार क्या कर रही है और उसे क्या करना चाहिये, यह सवाल इसलिये भी आवश्यक है, क्योंकि तेल संकट का प्रबंध तो वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कर लेगी, लेकिन इस राष्ट्रीय जल संकट से कैसे निबटेगी?,
ऐसा इस बार ही हो रहा हो, ऐसा नहीं है। देश के तमाम जलाशयों का जलस्तर इस दौरान घटता है। केंद्रीय जल आयोग के ताज़ा आंकड़ों में यह घटा दिख रहा है तो आश्चर्य की क्या बात? क्या यह सांत्वनाकारी बात नहीं कि अभी पानी का स्टोरेज औसत और पिछले साल से बेहतर है? पिछली बार इस समय देश के तमाम जलाशयों का जलस्तर इससे भी कम था। पर इसके बावजूद केंद्रीय जल आयोग ने जब पिछले हफ्ते यह बताया कि देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण कुल क्षमता के 45 फीसदी से भी कम हो गई है, देश के 8 प्रमुख जलाशय तो ऐसे हैं जहां पानी सामान्य का 50 प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, तो इस पर इतनी चीख पुकार क्यों?
फरवरी की शुरुआत में देश के प्रमुख जलाशयों में उनकी जल भंडारण क्षमता का 66 प्रतिशत से अधिक पानी था। 45 फीसदी से नीचे आने का अर्थ यह हुआ कि मात्र दो महीनों में लगभग 22 फीसदी की गिरावट आ गई। दरअसल गिरावट की यह तेज़ी ही चिंता का विषय है। खासतौर से जब भीषण गर्मी के तीन महीने अभी शेष हैं और मौसम विभाग के अनुसार मानसून के कमज़ोर रहने की आशंका है। आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण भारत में जलाशयों का स्तर मात्र 33 प्रतिशत ही रह गया है, उधर लगभग सभी नदियों के प्रवाह क्षेत्र में पानी की मात्रा घटती जा रही है। कई नदी क्षेत्र 30-60 प्रतिशत के बीच हैं। गंगा, गोदावरी, नर्मदा जैसे बड़े क्षेत्र आधी क्षमता के आसपास हैं तो कृष्णा मात्र 31 प्रतिशत और कई तटीय क्षेत्र 25-35 फीसदी के स्तर पर सिमट चुके हैं। पूर्वी तटीय नदियों में सिर्फ  25 प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा, तो पश्चिमी तटीय नदियों में 35 प्रतिशत पानी ही बचा है।
मानसून से पहले देश के जलाशयों और नदी क्षेत्रों का तेजी से गिरता जलस्तर केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि एक उभरते हुए संरचनात्मक जल संकट का संकेत है। इसका दुष्प्रभाव पेयजल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कृषि, ऊर्जा उत्पादन और पारिस्थितिकी तंत्र- सभी पर व्यापक प्रभाव डालेगा। 2001 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1816 घन मीटर थी, जो 2011 में घटकर 1545 और ताज़ा आंकलन के तहत यही हाल रहा तो 2031 तक 1300 घन मीटर रह जाएगी। वर्तमान स्थिति और इस पेशेनगोई के मद्देनज़र देश के नीति नियामकों को देखना होगा कि इस बहुआयामी संकट के मूल में क्या है? गिरावट पूरे देश में समान रूप से हो रही है, लेकिन दक्षिण और पश्चिम भारत में इसका असर ज्यादा तेज है। कर्नाटक, तमिलनाडु में स्थिति शोचनीय होने के साथ पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी जलस्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह दर्शाता है कि जल संकट अब केवल सूखे क्षेत्रों तक सीमित नहीं बल्कि यह एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले रहा है।
यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले महीनों में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में पेयजल संकट तो सामने आयेगा ही खरीफ  सीजन की तैयारी भी प्रभावित होगी जो कृषि संकट को जन्म देगी, जलविद्युत उत्पादन घटने से ऊर्जा संकट भी पैदा होगा। इसके अलावा पारिस्थितिक संतुलन भी प्रभावित होगा, नदियों का प्रवाह घटेगा, जैव विविधता पर असर पड़ेगा। जलाशय प्राकृतिक जल संग्रहण हैं, उचित जल संरक्षण के अभाव में ये सूख रहे हैं। कारणों को समझते हुये इसके निवारण का उपाय करना होगा, वह भी अतिशीघ्र वरना अगले कुछ महीनों में ही इस जल संकट का व्यापक प्रभाव दिखाई देगा और तब उस उसके लिये किये जाने वाले उपाय प्यास लगने पर कुआं खोदने जैसी स्थिति पैदा करेंगे। यह ठीक है कि जनवरी-फरवरी 2026 में आपेक्षित वर्षा नहीं हुई, इस जल संकट की यह भी एक वजह है। वर्षा चक्र का यह असंतुलन जलाशयों की पुनर्भरण क्षमता को प्रभावित करता है, परन्तु यह केवल आंशिक कारण है। 
इसका सारा ठीकरा केवल मौसम पर फोड़ना ठीक नहीं, हमारा जल प्रबंधन भी इसके लिए कम ज़िम्मेदार नहीं। अत्यधिक जल दोहन को रोकने के लिये हमारे उपाय बिल्कुल अप्रभावी हैं। सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए जलाशयों से पानी तो लगातार निकाला जा रहा है जबकि पुनर्भरण की व्यवस्था बेहद कमज़ोर है। जहां तक नदियों के प्रवाह क्षीण होने, उनके क्षेत्रों (बेसिनों) का क्षरण तथा उसमें कम पानी होने की वजह का सवाल है, उसके लिये ज़िम्मेदार हैं उनके कैचमेंट एरिया में वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव और अनियोजित निर्माण। इन सबने प्राकृतिक जल संचयन क्षमता को कम कर दिया है, इसके अलावा जलाशय या आर्द्रभूमि तथा जलस्रोतों का अतिक्रमण हमारी शाश्वत राष्ट्रीय समस्या है। समूचे देश में कोई शहर, गांव इससे नहीं बचा है। विकास के नाम पर झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों को या तो पाट दिया गया या उन्हें कंक्रीट संरचनाओं में बदल दिया गया। 
 वर्तमान स्थिति एक स्पष्ट चेतावनी है कि भारत जल संकट के उस मोड़ पर खड़ा है, जहां लापरवाही भविष्य को संकटग्रस्त बना सकती है। यह केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं बल्कि समाज, उद्योग और नागरिकों की भी साझा ज़िम्मेदारी है। 
वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाने के तहत हर शहर और गांव में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग लागू करना होगा, तो भवन निर्माण नियमों में भी जल के सीमित उपयोग पर सख्ती दिखानी होगी। जलाशयों और जलस्रोतों के संरक्षण, उनका अतिक्रमण हटाने, झीलों और तालाबों के पुनर्जीवन के लिए फिलहाल के उपाय सीमित दिखते हैं। नदी बेसिन प्रबंधन हेतु कैचमेंट क्षेत्रों में वृक्षारोपण, मिट्टी संरक्षण और भूजल पुनर्भरण योजनाएं तेज़ करने की ज़रूरत है। ज्यादा पानी इस्तेमाल करने वाली फसलों को कैसे रोका जाए, देखना होगा। जलापूर्ति बढ़ाने के बजाय ‘मांग’ को नियंत्रित करने पर अधिक ज़ोर देने की ज़रूरत है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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