बीत गई एक युग की चहकती और गुदगुदाती आशा भोंसले

फेमिनिज्म रोजमर्रा की बोलचाल का शब्द भी न बना था जब आशा भोसले महिलाओं के हक में आवाज़ उठा रही थीं, अपने गीतों से। उनके गीत साहसिक थे, बिना अनुमति की आग्रह किये हुए। वे भावनात्मक थे, बिना किसी शिकायत के। उन्होंने महिलाओं को महसूस करना सिखाया... आज़ादी व ईमानदारी से पूर्ण होने के लिए प्रेरित किया। मसलन, ‘पिया तू अब तो आजा’ गीत को ही लें। कागज़ पर यह कैबरे गीत प्रतीत होता है। लेकिन इसे आप गौर से सुनिये। इसमें महिला अपनी इच्छाएं व्यक्त कर रही है, उन्हें छुपा नहीं रही है, उनके खोजे जाने की प्रतीक्षा नहीं कर रही है। इसमें विश्वास है, चंचलता है, नियंत्रण है। उसे देखा नहीं जा रहा है। उसे सुना जा रहा है। इसी तरह ‘ये मेरा दिल’ में महिला पैसिव नहीं है, वह उस लम्हे को नियंत्रित किये हुए है। आशा की आवाज़ सुनिश्चित करती है कि आप उसे महसूस करें। फिर ‘दम मारो दम’ को कौन भूल सकता है? वह सिर्फ गीत नहीं था, संगीत में सजा हुआ विद्रोह था। उसने महिलाओं को बताया कि उम्मीदों के बाहर अस्तित्व का क्या अर्थ है, भले ही वह कुछ लम्हों के लिए ही हो। अब इतनी प्रभावी गंभीरता से महिलाओं के हक में कौन आवाज़ बुलंद करेगा?
मुकेश, मुहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे, लता मंगेशकर के बाद भारतीय सिनेमा की अंतिम महान व लीजेंडरी गायिका आशा भोंसले ने भी संगीत को यतीम करते हुए हमेशा के लिए हमें अलविदा कह दिया, लेकिन रहती दुनिया तक रेकॉर्डों में कैद उनकी मंत्रमुग्ध करने वाली आवाज़ हमें प्रेरित करती रहेगी। आशा को 11 अप्रैल 2026 को दिल व सांस की समस्याओं का अनुभव हुआ था। उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन उन्हें बचाया न जा सका और 12 अप्रैल 2026 की सुबह उनके निधन की दुखद खबर की पुष्टि उनके बेटे आनंद ने की। वह 92 वर्ष की थीं। उनका अंतिम संस्कार 13 अप्रैल 2026 को मुंबई में सम्पन्न हुआ। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि आशा भोंसले भारतीय सिनेमा की सबसे सफल व विख्यात गायिका थीं और उनके मुकाबले पर सिर्फ उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ही थीं। आशा का जन्म 8 सितम्बर 1933 में संगीतमय मंगेशकर परिवार में हुआ था और एक प्रोफेशनल के तौर पर उन्होंने मात्र 9 वर्ष की आयु में गाना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपना पहला फिल्मी गीत 1943 में रिकॉर्ड किया था और 50 के दशक के आरंभ तक वह एक स्थापित गायिका बनने में सफल हो गईं, विशेषकर ओपी नय्यर के सहयोग से, जिन्होंने लता के साथ कभी किसी गीत की रिकॉर्डिंग नहीं की।     
आशा व नय्यर की पहली मुलाकात 1952 में ‘छम छमा छम’ गीत की रिकॉर्डिंग पर हुई थी। उस समय तक आशा अपनी बड़ी बहन लता के साये में रहती थीं। नय्यर ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह अपना व्यक्तिगत रास्ता स्वयं बना सकती हैं। नय्यर के मार्गदर्शन में आशा ने अपनी स्वतंत्र व आकर्षक शैली विकसित की। कैबरे-शैली गायन में भी उन्होंने महारत हासिल की और उसमें प्रेम का भाव वह लेकर आयीं। नय्यर के संगीत निर्देशन में जो उन्होंने मुहम्मद रफी के साथ युगल गीत गाये वह सभी अपने समय में चार्टबस्टर थे। ‘कश्मीर की कली’ व ‘तुमसा नहीं देखा’ के गीत तो आज तक लोगों की ज़बान पर हैं। ‘नया दौर’ का युगल गीत ‘उड़ें जब जब जुल्फें तेरी’ को कौन भूल सकता है, जिसमें तीनों नय्यर, रफी व आशा ने कमाल कर दिया था। रफी के साथ आशा के युगल गीत उतने ही सफल थे जीतने लता-रफी के युगल गीत थे, लेकिन लम्बे प्रोफेशनल साथ के बावजूद 1972 में नय्यर व आशा कड़वी यादों के साथ एक-दूसरे से अलग हो गये और फिर दोनों ने कभी भी साथ काम नहीं किया। दोनों का साथ अंतिम गीत ‘चैन से हम को कभी आप ने जीने न दिया’ था। इस गीत के लिए आशा को 1974 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ महिला गायिका का अवार्ड मिला था। नय्यर ने आशा की तरफ से यह अवार्ड स्वीकार किया, लेकिन उसे बाद में आशा को देने की बजाये रास्ते में ही फेंक दिया। अनुमान यह है कि दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता कायम हो गया था। 
नय्यर से अलग होने के बाद आशा का आरडी बर्मन उर्फ पंचम के साथ गहरा पर्सनल व प्रोफेशनल रिश्ता रहा। 1971 में पंचम का अपनी पत्नी रीता पटेल से तलाक हो गया था, जो कभी उनकी फैन भी थीं। तलाक के बाद पंचम ने दूसरी शादी आशा भोंसले से 1980 में की, लेकिन पंचम जब अपने जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक कठिनाई में आये तो दोनों साथ नहीं थे। कैबरे-शैली गायन में आशा ने इतनी महारत हासिल कर ली थी कि वह इसी किस्म के गानों के लिए टाइपकास्ट हो गईं थीं, लेकिन हकीकत यह है कि वह हर किस्म के गीत गाने में निपुण थी, जिसे उन्होंने साबित भी किया। ‘उमराव जान’ में ़गज़ल गायकी को एक अलग ही मकाम पर ले गईं थीं, जिसकी ़गज़ल ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उन्हें दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार फिल्म ‘इज़्ज़त’ के गीत ‘मेरा कुछ सामान’ के लिए मिला था। इसके अतिरिक्त वह सात बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ महिला प्लेबैक गायिका अवार्ड की भी विजेता रहीं। 
आशा को चार बीएफजेए अवार्ड्स और 18 महाराष्ट्र स्टेट फिल्म अवार्ड्स भी मिले। वह दो बार ग्रैमी के लिए भी नामंकित हुईं। 2000 में उन्हें दादासाहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2008 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण दिया, जोकि देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है, भारत रतन के बाद। गिनीज़ बुक ऑ़फ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने 2011 में स्वीकार किया कि संगीत इतिहास में सबसे अधिक रिकॉर्ड होने वाली कलाकार आशा हैं। आशा को बंगा भूषण (2018) व महाराष्ट्र भूषण (2021) से भी सम्मानित किया गया। आशा आज के संगीत लैंडस्केप से सहमत नहीं थीं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, ‘मैं सच बोलूं तो मैं आज के गाने सुनती ही नहीं हूं। मैं भीमसेन जोशी को सुनती हूं, क्लासिकल गीतों व ़गज़लों को सुनती हूं, जिनसे मुझे कुछ सीखने व खुद को बेहतर करने का अवसर मिलता है। आज तो मुझे अच्छे बोल वाले गीत सुनने को मिलते ही नहीं हैं, हां, कभी-कभार राहत अली खान व सुनिधि चौहान का कोई अच्छा गीत सुनने को मिल जाता है, लेकिन मैं ज्यादातर पुराने गाने ही सुनना पसंद करती हूं।’ 
बहरहाल, आशा का जीवन काफी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। वह जब मात्र 16 साल की थीं तो अपने परिवार के विरुद्ध जाकर उन्होंने 31 वर्षीय गणपतराव भोंसले के साथ भागकर विवाह कर लिया। लेकिन सुसराल में आशा के साथ अच्छा बर्ताव नहीं हुआ, तीन बच्चों को जन्म देने के बाद वह 1960 में अपने पति से अलग हो गईं। बाद में आशा ने पंचम से शादी की, जिसका पंचम की मां ने ज़बरदस्त विरोध किया। आशा के अंतिम वर्षों में उनकी पोती ज़नाई भोंसले उनके साथ रहती थीं। अगर आशा के लगभग 8 दशक के करियर को चंद शब्दों में समेटा जाये, तो उनका जादू सिर्फ साहस तक सीमित न था, वह इश्क के कमज़ोर पलों में भी था। ‘मेरा कुछ सामान’ दिल टूटने का वास्तविक एहसास कराता है, जैसे आप उस डायरी को पढ़ रहे हों जिसे देखने की भी आपको इजाज़त नहीं। यह गीत चिल्लाते नहीं हैं। आपके दिल में ठहर जाते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 
 

# बीत गई एक युग की चहकती और गुदगुदाती आशा भोंसले