रुक जाओ न मंगला!
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दीपा ने उसे बताया कि कंचन अब उनके मध्य नहीं है। एक बस दुर्घटना में वह बिछुड़ गई। उनके दोनों बेटे विदेश में पड़ रहे हैं। वह तो पूजा का रिश्ता तय करने यहां आई थी कि उसकी मंगला पर नज़र पड़ गई। उसने यह भी बताया कि गिरीश ने कंचन के रहते ही देहरादून में घर भी बना लिया था। अब तो वह लोगों से बहुत कम मिलता है। गुमसुम रहता है और... और भी बहुत कुछ। वे दोनों देर रात तक बतियाती रहीं। फिर वह दीपा के साथ ही गिरीश से मिलने चल दी। उसे देख कर एक बार तो गिरीश की आंखें चमक उठीं। फिर सब सामान्य हो गया। दो दिन देहरादून रहने के बाद मंगला मेरठ वापस लौट आई थी।
मंगला ने चौंक कर देखा, सामने वाली सीट पर बैठी एक स्त्री का बच्चा रोने लगा था। मंगला वर्तमान में लौट आई थी। अभी देहरादून दूर था। उसने फिर से आंखें बंद कर लीं।
पूजा के विवाह में वह दीपा की सहेली की हैसियत से शामिल हुई और जी भरकर उपहार उसने पूजा को दिए। पूजा की विदाई के बाद गिरीश एक दम अकेला हो गया था जो स्वाभाविक था। पूजा मेरठ में ही ब्याही गई थी सो मंगला आंटी से मिलने अक्सर ही आ जाती। कभी गिरीश के अनुरोध पर वह पूजा को साथ लेकर देहरादून भी चली जाती। इस प्रकार पूजा से उसकी घनिष्टता बढ़ती गई। अब मंगला और गिरीश की बात अक्सर फोन पर भी होने लगी। धीरे-धीरे गिरीश और मंगला नियमित मिलने लगे। कभी-कभी दो-चार दिन के लिए कहीं बाहर भी चले जाते। एक दिन मंगला ने सहज ही बात छेड़ी,
‘मैं सोच रही थी कि क्या हम इस रोज-रोज की भाग-दौड़ को समाप्त नहीं कर सकते?’
‘क्या कहना चाहती हो?’ गिरीश ने सिगरेट की राख झाड़ते हुए मंगला को देखा।
‘यह रोज-रोज का होटलों का खर्च, फिर लोगों की निगाहों में झांकता संदेह... यह सब अच्छा नहीं लगता। अगर कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो एक-दूसरे के काम भी नहीं आ सकेंगे। आप ही बताइये, यह जीवन भी कोई जीवन है?’
‘हूँ...! बात तो ठीक है तुम्हारी, पर... देखो! कुछ करता हूँ।’ लेकिन कुछ नहीं हुआ। सब उसी तरह चलता रहा। यह अलग बात थी कि गिरीश के बच्चे भी सब समझने लगे थे। बस पिता के सामने बोल नहीं सकते थे। लेकिन हुआ तो वही जिसका मंगला को भय था।
गाड़ी रुकी तो मंगला झट से बैग उठाकर नीचे उतर आई। दीपा उसे अस्पताल के दरवाजे पर ही मिल गई, अलबत्ता पूजा गिरीश के पास बैठी थी। वह मंगला को देखकर बहुत खुश हुई। दूसरे दिन दोनों बेटे भी आ गये, परन्तु सेवा तो मंगला, दीपा और पूजा ने ही की। बेटे तो बस अपने आप में ही मस्त रहते थे। खैर, सेवा रंग लाई और फिर दो दिन बाद गिरीश को अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई। छुट्टी मिलते ही बेटे वापस लौट जाने को उतावले होने लगे। बेटी के ससुराल से रोज़ ही फोन पर फोन आ रहे थे। प्रश्न यह था कि गिरीश के पास कौन रहे। दीपा को भी अपने घर जाना था। सब अपना-अपना सामान समेट रहे थे। बस मंगला और दीपा ही ने कोई हलचल नहीं दिखाई। इसी समय गिरीश ने पानी मांगा। नौकरानी आती, इससे पहले ही मंगला पानी का गिलास लिए लपक गई।
‘बुआ! आप भी चली जाएं तो पापा की देखभाल तो आंटी अच्छी तरह कर सकती हैं।’ छोटे का स्वर व्यंग्यपूर्ण था।
‘छोटे भैया! आप कभी तो सोच-समझ कर बोला करें।’ पूजा चिढ़ गई थी। ‘वैसे आपने राय तो अच्छी दी है।’ फिर वह मंगला की तरफ मुड़ी, ‘आंटी, आप कब तक हमारी आंटी बनी रहेंगी? मां ही बन जाइए ना! अब लौट कर मत जाइये।’
‘पूजा! तुम्हें पता है, तुम क्या कह रही हो?’ बड़ा बिफर गया।
‘हां, बड़े भैया! मुझे पता है कि मैं क्या कह रही हूँ और उसका मतलब क्या है। बस आप तो अपनी नाक यू.एस.ए. में संभालिये। परमात्मा न करे, पापा को फिर से तकलीफ हो। कौन होगा पापा के पास? वह तो उस दिन आया सामने थी तो पापा बच गये वरना... और वे जो आप दोनों की विलायती मेमें है न, वे तो पापा को देखने भी नहीं आईं, क्यों? है कुछ जवाब आपके पास?’
दोनों भाई निरुत्तर एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे। मंगला साड़ी का किनारा उंगलियों पर लपेटती पांव के अंगूठे से सीमेंट का पक्का फर्श खुरच रही थी। गिरीश की आंखें मंगला के चेहरे पर चिपकी हुई थीं, मानो उत्तर मांग रही हों, अथवा आग्रह कर रही हों, ‘मत जाओ मंगला!’
‘मंगला! तोड़ दो अब यह मौन की शृंखला। कब तक घुटोगी? कब तक सहोगी? सच ही तो कह रही है पूजा। तुम्हारे अलावा गिरीश की देखभाल और कौन कर सकता है?’ दीपा ने उसे झिंझोड़ ही तो डाला था पकड़कर। मंगला की आंखें गिरीश की ओर उठीं। वहां तो पहले से ही याचना थी। मौन निगाहें कह रही थीं, ‘रुक जाओ नए मंगला! रुक जाओ। अब न जाओ लौट कर।’
(समाप्त)



