सरकार की निराशा

केन्द्र सरकार द्वारा संवैधानिक संशोधन के लिए लोकसभा में पेश किए गए तीन विधेयकों के पारित न होने से सरकार को निराशा का सामना करना पड़ा है। किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए पेश किए गए विधेयक के पक्ष में संसद के दो तिहाई सांसदों का सहमत होना ज़रूरी होता है। जो लोकसभा में जुटाने में सरकार असमर्थ रही है। इन विधेयकों को जल्दबाज़ी में पेश किया गया था, सरकार ने यह मुद्दा उस समय उठाया जब देश के बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव सिर पर हैं। इन विधेयकों के लिए सरकार ने जो तैयारी की थी, उसमें अन्य पार्टियों को शामिल नहीं किया गया था और न ही पहले अलग-अलग स्तर पर इस संबंध में कोई विस्तारपूर्वक चर्चा ही की गई थी।
इनमें संविधान संशोधन विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और केन्द्र शासित प्रबन्ध संशोधन विधेयक 2026 शामिल थे। पहले दोनों का उद्देश्य लोकसभा के सांसदों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की प्रक्रिया को तेज़ करना था। 131वें संवैधानिक संशोधन विधेयक में लोकसभा के सदस्यों की संख्या 850 करना शामिल था, जिसके लिए नए परिसीमन की ज़रूरत थी। इस तरह सरकार का उद्देश्य 2029 के चुनावों से पहले महिलाओं के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी करना था। जहां तक महिलाओं के आरक्षण के कानून का संबंध है, उसे संसद द्वारा वर्ष 2023 में सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया था, परन्तु सरकार 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले नए क्षेत्रों का नया परिसीमन करना चाहती थी। 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाकर 2029 के चुनाव करवाना सरकार का उद्देश्य था। विपक्ष का यह कहना था कि आरक्षण का तो वह समर्थन करता है परन्तु इस ढंग-तरीके से जल्दबाज़ी से क्षेत्रों का नया परिसीमन करना चाहती है, वह उन्हें स्वीकार नहीं है, इस व्यवस्था का सरकार अपने ढंग से इस्तेमाल करना चाहती है। जहां तक नए परिसीमन का संबंध है, वह अब की जा रही जनगणना के बाद आने वाले आंकड़ों के आधार पर ही की जाए तभी बेहतर होगा। तब तक सरकार सभी संबंधित पार्टियों के साथ चर्चा करके आम सहमति भी बना सकती है। वर्ष 2011 में की गई जनगणना को अब आधार बना कर नया परिसीमन नहीं किया जा सकता। इस संबंध में सरकार अपनी दलीलों और अपीलों के बाद भी विपक्ष को सहमत नहीं कर सकी और सदन में मौजूद 528 सांसदों में 298 सांसद ही अपने पक्ष में ला सकी, जबकि दो तिहाई बहुमत के लिए उसे 352 वोटों की ज़रूरत थी। विपक्ष ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि फिलहाल लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ाने के बिना ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत कोटा आरक्षित कर दिया जाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सदन में वोट से पहले भावुक अपीलें की थीं, जिनका प्रभाव नहीं पड़ा।
विधेयक पारित नहीं होने के बाद देश में राजनीतिक लड़ाई और भी तीव्र हो गई है। भाजपा के नेताओं ने विपक्षी पार्टियों पर महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध खड़े होने का आरोप लगाया है और कहा है कि वे पूरे देश में विपक्षी पार्टियों को इसके लिए निशाने पर लेंगे। विपक्ष ने सरकार की इस जल्दबाज़ी में की गई कवायद को संवैधानिक व्यवस्थाओं और परम्पराओं के विरुद्ध बताया है, जबकि उसने फिर दोहराया है कि वह संसद में पहले 2023 में पारित किए गए लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने संबंधी कानून को लागू करने के पक्ष में हैं। सभी पार्टियों द्वारा इस नए राजनीतिक माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए क्या-क्या गतिविधियां की जाती हैं और लोगों के मन पर इस कवायद का क्या प्रभाव पड़ता है, यह आने वाले दिनों में देखने और विचार करने वाली बात होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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