एक गम्भीर वैश्विक समस्या है पर्यावरण प्रदूषण

विगत कई वर्षों से पर्यावरण प्रदूषण भारत समेत पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है जबकि समाज इसे लगातार दृष्टिविगत कर रहा है। प्रत्येक वर्ष सर्दी शुरू होते ही देश में वायु प्रदूषण का मुद्दा मुख्य धारा के मीडिया में छा जाता है, क्योंकि इन्हीं दिनों में दिल्ली  वायु प्रदूषण की भी राजधानी बन जाती है। उस समय सिर्फ दो बातों पर ही चर्चा होती है—पहली, दिल्ली का वायु प्रदूषण और दूसरी, इस समस्या के लिए पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने को ज़िम्मेदार ठहराना। भारत में हर वर्ष वायु प्रदूषण के कारण 80 लाख लोगों की मौत होती है जबकि करोड़ों लोग फेफड़ों या सांस की बीमारियों से जूझते हैं।
पर्यावरण प्रदूषण पर बात करते समय दिल्ली में वायु प्रदूषण और पंजाब में पराली जलाने का मुद्दा हमेशा उभरते रहते हैं, क्योंकि ये दोनों मुद्दे कुछ सीमा तक एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए भी हैं। दिल्ली के प्रदूषण के लिए अधिकतर स्वयंभू विशेषज्ञ सिर्फ पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में पराली जलाने को मुख्य कारण घोषित कर देते हैं, परन्तु उद्योगों के प्रदूषण फैलाने पर कभी किन्तु-परन्तु नहीं करते। दूसरी तरफ किसानों द्वारा पराली जलाने को उनकी मजबूरी बताते हुए उनकी वकालत करते हैं। वायु प्रदुषण सिर्फ पंजाब या दिल्ली की समस्या नहीं है बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया की समस्या है।
इस वैश्विक समस्या की जड़ मुनाफे पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में हैं। वायु प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं—उद्योग, परिवहन के साधन, कृषि, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और साम्राज्यवादी युद्ध। तकनीक के विकास के साथ बनी फैक्ट्रियां इंसानी जीवन और अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन उद्योगों को प्रदूषण-मुक्त या कम से कम प्रदूषण होने के तरीके तलाशने भी ज़रूरी हैं। उद्योगों से निकलने वाली दूषित हवा को साफ करके पर्यावरण में छोड़ा जा सकता है, लेकिन उद्योगपति इसे एक अतिरिक्त खर्च मानते हैं। मुनाफा कमाने के उद्देश्य से फैक्ट्रियों का दूषित पानी नदियों या बोर करके ज़मीन में डालना आम बात है। यातायात के असंख्य साधन भी वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था निजी वाहनों की खरीद को उत्साह देता है, क्योंकि इससे ऑटो उद्योग को बहुत ज़्यादा मुनाफा होता है, लेकिन प्रदूषण रोकने पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। सरकार द्वारा 2025 में संसद में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार देश में 26 करोड़ दो पहिया वाहन और 7 करोड़ चार पहिया वाहन हैं। पिछले दो दशक में वाहनों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। भारत में 2001 में 5.5 करोड़, 2013 में 12.7 करोड़ और 2020 में 32.63 करोड़ वाहन थे और हर साल इस कड़ी में जुड़ रहे 2 करोड़ नये वाहन प्रदूषण बढ़ रहा है। सरकारों को प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए शहरों में बसें, रेलगाड़ियां मेट्रो आदि जैसे सार्वजनिक यातायात के साधन बढ़ाने चाहिएं। 
चाहे पराली और गेहूं की नाड़ जलाने से साल में कुछ समय के लिए वायु प्रदूषण होता है, लेकिन इसकी तीव्रता बहुत ज़्यादा होती है। किसान पराली या नाड़ को जलाने के बजाय अन्य तरीकों से इनका निपटान कर सकते हैंए लेकिन अगली फसल बोने की जल्दी में वे इन्हें जलाने का सस्ता और आसान तरीका अपनाते हैं। उल्लेखनीय है कि देश के शीर्ष 10 प्रतिशत अमीर किसानों के पास कुल कृषि योग्य ज़मीन का 60 प्रतिशत हिस्सा है जबकि नीचे के 80 प्रतिशत किसानों के पास नाममात्र कृषि योग्य ज़मीन होने के कारण उनमें से अधिकतर पराली को सम्भाल लेते हैं। कृषि से अधिक कमाई करने वाले बड़े किसानों की ऐसी कोई मजबूरी नहीं कि पराली को जलाया जाए। पराली जलाना मानवता के खिलाफ एक जुर्म है, जिसके लिए किसी को कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। इसके अलावा कृषि में रासायनिक खाद का अधिक इस्तेमाल और कीटनाशकों का अंधाधुंध छिड़काव भी हवा और पानी को दूषित करके पूरे पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। 
जंगल हमारे पास वे सौगात हैं, जो हमारी अनेक ज़रूरतें पूरी करने के साथ-साथ जीवन देने वाली हवा को भी शुद्ध करने का काम करते हैं। सभ्यता के विकास में इंसानी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए चाहे एक सीमा तक जंगलों की कटाई ज़रूरी है, लेकिन इस कटाई की पूर्ति हर हाल में नए जंगल लगाकर साथ-साथ होनी चाहिए। जंगलों की अंधाधुंध कटाई भी प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। वायु प्रदूषण या पर्यावरण के विनाश के लिए पूरा समाज ज़िम्मेदार है। लोगों के जागरूक होने और सरकार द्वारा उचित कदम उठाए जाने से इस समस्या को बड़ी सीमा तक नियंत्रित  किया जा सकता है। इसलिए पराली जलाने पर पूरी तरह पाबंदी लगाने, पर्यावरण में ज़हरीली हवा और गंदा पानी छोड़ने वाले उद्योगों, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर कड़ी कार्रवाई करने के अलावा सार्वजनिक यातायात के साधन बढ़ाकर वायु प्रदूषण को रोकने का हर सम्भव प्रयास किया जाना चाहिए। पर्यावरण के विनाश को रोकने की लड़ाई पूंजीवादी व्यवस्था का पूरा विकल्प पेश करके ही जीती जा सकती है।
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