महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समान भागीदारी कब ?
महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समान भागीदारी देने के उद्देश्य से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक कदम माना गया था, लेकिन यह सवाल स्वाभाविक है कि जब यह कानून संसद से पारित हो चुका था, तो इसका असर अभी तक ज़मीनी स्तर पर क्यों नहीं दिखा। दरअसल, इस अधिनियम के लागू होने में देरी का कारण इसकी संरचना और उससे जुड़ी शर्तें हैं। देश की संसद में 31वां संशोधन बिल लोकसभा में गिर गया जो कि बहुत ही निराशाजनक बात है। संसद के विशेष सत्र में लम्बी चली बहस में मतभेदों के आलावा कुछ समझ नहीं आया। ज्ञात रहे कि सरकार को इस संशोधन बिल को पास करवाने के लिए दो-तिहाई मतों की ज़रूरत थी, लेकिन पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े जो दो तिहाई से बहुत कम थे। इस बिल को पास करवाने की नरेंद्र मोदी सरकार की हर कोशिश नाकाम साबित हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील भी कुछ खास असर नहीं दिखा पाई। अब सवाल यह है कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण कब मिलेगा? जब सितम्बर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद से पास होकर उसका नोटिफिकेशन हो चुका है तो पहले आगामी चुनाव में इसे लागू कर दिया जाना चाहिए था और फिर संशोधन बिल लाते रहते। जब इसे अभी लागू ही नहीं किया तो संशोधन बिल लाने की क्या ज़रूरत पड़ी। महिलाओं के लिए आरक्षण 2034 से पहले संभव हो पाएगा या फिर बीच की कोई और राह अभी भी निकल सकती है? महिला आरक्षण बिल फिलहाल तो ठंडे बस्ते में चला गया है।
विपक्ष लगातार ओबीसी महिलाओं के अलग आरक्षण की मांग कर रहा है। वह आरोप लगा रहा है कि भाजपा महिला आरक्षण का श्रेय तो लेना चाहती है लेकिन ओबीसी महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक हिस्सेदारी देने से बच रही है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण पर फैसले में कहा है कि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता और ओबीसी कोटा के लिए समकालीन, भरोसेमंद तथ्यात्मक डेटा ज़रूरी है। यही तर्क राष्ट्रीय स्तर पर भी उठेगा। संसद चाहे तो संविधान में संशोधन कर लोकसभा व विधानसभाओं में ओबीसी वर्ग के लिए राजनीतिक आरक्षण और उसमें से ओबीसी महिलाओं का उप-कोटा तय कर सकती है। भले ही नई जातिगत जनगणना पूरी नहीं हुई हो। संविधान किसी विशेष डेटा स्रोत को अनिवार्य नहीं ठहराता। लेकिन किस जाति समूह को कितना हिस्सा मिलेगा, इसका आधार तय करने के लिए ठोस, नए और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य जातिगत आंकड़े ज़रूरी होंगे। वरना अदालतों में इसे मनमाना मानकर चुनौती दी जा सकती है। अब आगे महिलाओं को ही मुखर होकर आगे आना होगा। इन पार्टियों को समझाना पड़ेगा कि आधी आबादी को संसद से क्यों वचिंत रखना चाहते हैं।
अब बात करते हैं इसके बीच की बाधा की जिसमें परिसीमन की शर्त यानी कानून के अनुसार, संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तभी लागू होगा जब अगली जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। यानी सीटों की नई सीमाएं तय होने के बाद ही यह आरक्षण लागू होगा। चूंकि अगली जनगणना अभी होनी है और उसके बाद परिसीमन होगा। इसलिए कानून तुरंत प्रभाव से लागू नहीं हो सकता।
दूसरा कारण जनगणना में देरी। 2021 की जनगणना विभिन्न कारणों से टल गई थी। जब तक नई जनगणना नहीं होती, तब तक परिसीमन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकती। यह देरी सीधे तौर पर महिला आरक्षण के लागू होने में बाधा बन रही है। तीसरा कारण राजनीतिक संतुलन और आशंकाएं यानी परिसीमन के साथ ही राज्यों के बीच सीटों का संतुलन भी बदल सकता है, जिससे खासकर दक्षिण भारत के राज्यों में प्रतिनिधित्व घटने की आशंका जताई जा रही है। इस कारण यह मुद्दा केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि संघीय ढांचे और राजनीतिक संतुलन से भी जुड़ जाता है। चौथा कारण चरणबद्ध क्रियान्वयन की नीति। सरकार का तर्क है कि इतने बड़े संवैधानिक बदलाव को एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया के तहत लागू करना ज़रूरी है, ताकि किसी भी प्रकार का प्रशासनिक या राजनीतिक असंतुलन न पैदा हो। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का पारित होना नि:संदेह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तब मिलेगा जब इसे समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए। वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ प्रशासनिक प्रक्रिया को भी तेज़ करना आवश्यक है, अन्यथा यह कानून केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगा। (एजेंसी)



