भारत को ‘जी-7’ की सदस्यता क्यों नहीं ?
फ्रांस के एवियन लेस बैंस में आयोजित हुए तीन दिवसीय ‘जी-7 सम्मेलन’ का 52 वां संस्करण संपन्न हुआ। सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे, लेकिन सदस्य देश बनकर नहीं, बल्कि मात्र मेहमान के रूप में। वह भी फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के निमंत्रण पर। कितना अजीब लग रहा है यह सब। जहां कुछेक करोड़ जनसंख्या वाले देश जी-7 के सदस्य हों और विश्व में सर्वाधिक आबादी वाला देश गैर-सदस्य बन कर पहुंचता हो। भारत को सदस्य बनाने में अड़चन क्या हैं। रोड़ा कौन अटका रहा है और सदस्यहीनता का सूखा कब होगा खत्म? इसका इंतज़ार भारतवासी लंबे समय से कर रहे हैं।
भारत के अलावा सात और गैर-सदस्य देशों को बुलाया गया। सम्मेलन के दौरान महत्वपूर्ण बैठकों, समझौतों और वैश्विक स्तरीय मंथनों से भी दूर रखा जबकि इन सभी बैठकों में भारत प्रतिभाग की हैसियत रखता है। पिछले करीब दो दशकों के भारत के भरसक प्रयासों के बावजूद सदस्य नामित नहीं किया गया जबकि जी-7 में ऐसे सदस्य देश हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था के मुकाबले कहीं नहीं टिकते।
सवाल उठता है कि जिस देश का लोकतंत्र सबसे विशाल हो और जनसंख्या के लिहाज से करीब 140 से 145 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करता हो, उस देश को ऐसे वैश्विक मंचों से दूर रखना और महत्वपूर्ण बैठकों से अलग रखने का मतलब क्या है। इसलिए बिना देर किए भारत को जी-7 में शामिल करने पर विचार किया चाहिए। बार-बार भारत को जी-7 के आयोजन में मात्र मेहमान के तौर बुलाना किसी की समझ में नहीं आता। ऐसा एक बार से नहीं, पिछले समय से ऐसा लगातार किया जा रहा है। 2026 से पूर्व भी भारत के प्रधानमंत्री 7 बार जी-7 सम्मेलन में मेहमान के रूप में भाग लेते रहे। ये सिलसिला अब थमना चाहिए। भारतवासी लंबे समय से यही सोच रहे हैं कि वह वक्त कब आएगा जब हमारा देश भी जी-7 सम्मेलन में अधिकारिक सदस्य बनकर शामिल होगा। भारत को स्थायी सदस्य क्यों नहीं चुना जाता है। ये सवाल दिन-प्रतिदिन गम्भीर होता जा रहा है।
भारत तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और पिछले कुछ वर्षों से विश्व में अपना डंका बजा रहा है। क्या भारत इटली, कनाडा और जर्मनी से पीछे हैं, उत्तर ही कतई नहीं? जब ये मध्यम देश इस महत्वपूर्ण सम्मेलन का हिस्सा बन सकते हैं तो भारत क्यों नहीं? जी-7 में अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी शामिल हैं। भारत को भी इसमें शामिल करने का फ्रांस भी पक्षधर है, लेकिन एक देश के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा, वह है अमरीका। उसे इस बात की आशंका है कि अगर भारत जी-7 में शामिल हो गया तो उसकी अहमियत कम हो जाएगी।
उल्लेखनीय है कि साल 1975 में जब इस सम्मेलन की शुरुआत हुई थी, तब कुल 6 ही देश शामिल थे। 1976 में कनाडा के रूप में एक और देश जुड़ा। उसके बाद यह जी-7 हुआ। वर्ष 1998 में रूस को शामिल करके सदस्य देशों की संख्या 8 हो गई। तब यह जी-8 हुआ। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू के बाद रूस को बाहर कर दिया गया। तब उसकी जगह भारत को शामिल किया जा सकता था, लेकिन अमरीकी विरोध के काण यह संभव नहीं हो सका। किसी भी वैश्विक मंच पर भारत का प्रभाव बड़े, यह अमरीका को बर्दाश्त नहीं।
भारत न सिर्फ सदस्य की हैसियत रखता है, बल्कि भविष्य में इस आयोजन की मेजबानी भी चाहता है। भारत सदैव संवाद, सहयोग और वैश्विक कल्याण का पक्षधर रहा है। ऐसे मंचों से भारत को दूर रखने का मतलब है दुनिया को दूरदर्शी और मार्ग-दर्शक विचारों से वंचित रखना है। जन कल्याण का स्वर्णिम अध्याय आज भारत लिख रहा है। जी-7 शिखर सम्मेलन का मुख्य मकसद संवाद, समाधान और विकास होता है और इस तीनों मंत्रों का अव्वल उपदेशक अब भारत बन चुका है। (युवराज)



